कौन था रैडक्लिफ? जिसने बिना देखे खिंच दी भारत-पाकिस्तान की सीमा
1947 में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के दौरान सीमा तय करने की जिम्मेदारी सर सिरिल रैडक्लिफ को दी गई थी, जो भारत आने से पहले कभी यहां नहीं आए थे. महज कुछ हफ्तों में उन्हें पंजाब और बंगाल की जटिल आबादी, भूगोल और प्रशासनिक ढांचे को समझकर सीमा तय करनी थी.
क्या आपको मालूम है, जिस व्यक्ति ने भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा तय की, वह भारत आने से पहले कभी भारत आया ही नहीं था. और तो और उन्हें भारत की जटिल राजनीति और भूगोल को समझने और करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाली बाउंड्री लाइन तय करने के लिए महज कुछ हफ्ते का समय दिया गया.
और सबसे हैरान करने वाली बात? 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हो गया, लेकिन कई लोगों को उसके दो दिन बाद तक यह भी मालूम नहीं था कि उनका गांव और घर किस देश में है.
तो क्या बिना बाउंड्री लाइन के ही पाकिस्तान देश बन गया?
- 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ और पाकिस्तान एक नया देश बना, लेकिन पंजाब और बंगाल के कई हिस्सों में एक बेहद अहम सवाल का जवाब अभी सामने नहीं आया था कि भारत और पाकिस्तान के बीच असली सीमा आखिर होगी कहां? इसके बावजूद लोगों ने घर छोड़ना शुरू कर दिया.
- हिंदू और सिख परिवारों से भरी ट्रेनें भारत की ओर जा रही थीं, जबकि बड़ी संख्या में मुस्लिम परिवार पाकिस्तान की तरफ निकल रहे थे. लोगों को कई बार यह तक पता नहीं होता था कि वे जिस सीमा को पार कर रहे हैं, वह आखिर कहां है.
- अफवाहों, डर और हिंसा के बीच लाखों लोग पलायन कर रहे थे कई ट्रेनों में यात्रियों के बजाय हिंसा के शिकार लोगों के शव पहुंच रहे थे. यानी आजादी के जश्न में बंटवारे का दर्द और डर का साया था.
- लेकिन जब पाकिस्तान के नए देश बनने की घोषणा हो चुकी थी, तो सवाल यह था कि नए देश की सीमा आखिर तय कहां हुई थी?
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कैसे किया जा रहा था भारत-पाकिस्तान की सीमा का बंटवारा?
- दरअसल, भारत और पाकिस्तान की सीमा तय करने के लिए दो Boundary Commission बनाए गए, एक पंजाब के लिए और दूसरा बंगाल के लिए, दोनों की अध्यक्षता सर सिरिल रैडक्लिफ को दी गई.
- आयोग को निर्देश था कि मुस्लिम और गैर-मुस्लिम आबादी वाले लगातार जुड़े बहुसंख्यक इलाकों को ध्यान में रखा जाए. लेकिन सिर्फ धर्म के आधार पर सीमा खींचना संभव नहीं था.
- पंजाब और बंगाल में आबादी इस तरह बंटी हुई थी कि एक इलाके में मुस्लिम बहुमत था, तो उसके ठीक बगल में हिंदू या सिख आबादी बहुमत में हो सकती थी.
- इसके अलावा सड़कें, रेलवे लाइन, नहरें, सिंचाई व्यवस्था और प्रशासनिक ढांचा भी आपस में जुड़े हुए थे.
- यानी नक्शे पर एक रेखा खींचना आसान था, लेकिन जमीन पर उस रेखा को लागू करना बेहद मुश्किल था.
- क्योंकि सीमा बंटवारे के साथ पानी और शहरों को भी बांटा जा रहा था.
- गांव और खेत बांटे जा रहे थे.
और इस काम की जिम्मेदारी एक ऐसे व्यक्ति के पास थी, जो भारत आने से पहले कभी भारत नहीं आया था.
सीमा बंटवारे के लिए रैडक्लिफ को ही क्यों चुना गया?
- रैडक्लिफ पेशे से वकील थे और भारत आने से पहले उन्होंने कभी भारत का दौरा नहीं किया था.
- ब्रिटिश अधिकारियों का मानना था कि भारत की राजनीति और स्थानीय नेताओं से ज्यादा परिचित न होने के कारण वह किसी एक पक्ष के प्रभाव में आए बिना फैसला कर पाएंगे.
- हालांकि उनकी सबसे बड़ी ताकत भारत का जमीनी अनुभव नहीं, बल्कि कानूनी समझ थी.
- और इस काम के लिए उनके पास बेहद कम, लगभग छह हफ्ते का समय था.
- मतलब एक ऐसे देश को समझना, जिसे आपने पहले कभी नहीं देखा, उसकी आबादी और भूगोल का अध्ययन करना और फिर ऐसी सीमा तय करना, जिससे करोड़ों लोगों की जिंदगी बदल जाएगी, वह भी कुछ हफ्तों में.
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क्या रैडक्लिफ अकेले फैसला कर रहे थे?
नहीं, दोनों Boundary Commission में चार-चार भारतीय जज भी शामिल थे। ये सदस्य कांग्रेस और मुस्लिम लीग की ओर से नामित थे.
रैडक्लिफ के पास नक्शे, जनसंख्या के आंकड़े, सरकारी रिकॉर्ड और अलग-अलग पक्षों की दलीलें थीं। जिसके आधार पर उन्हें फैसला करना था.
मतलब वो गांव-गांव जाकर जमीन का सर्वे नहीं कर रहे थे, बल्कि उपलब्ध दस्तावेजों और आयोग के सामने रखी गई दलीलों के आधार पर फैसला करना था और यहां सबसे बड़ा दबाव था,समय.
फैसला तैयार था तो उसे लागू करने में देरी क्यों?
- कई इतिहासकारों के अनुसार, रैडक्लिफ का काम अगस्त 1947 के शुरुआती दिनों तक काफी हद तक पूरा हो चुका था. लेकिन इसे तुरंत सार्वजनिक नहीं किया गया.
- Boundary Commission का फैसला आधिकारिक रूप से 17 अगस्त 1947 को जारी हुआ, यानी भारत और पाकिस्तान की आजादी के दो दिन बाद.
- इसका मतलब था कि 15 अगस्त को लोग आजादी का जश्न मना रहे थे, जबकि पंजाब और बंगाल के कई हिस्सों में लोगों को अभी तक यह आधिकारिक रूप से पता नहीं था कि उनका गांव या जमीन किस देश में जाने वाली है.
- सोचिए, आप अपने घर में हैं, लेकिन आपको नहीं पता कि कुछ दिनों बाद आपका घर भारत में होगा या पाकिस्तान में.
- फैसला सार्वजनिक करने में देरी के पीछे हिंसा और अफरातफरी को लेकर चिंता का तर्क दिया गया था.लेकिन इतिहासकार लूसी चेस्टर ने इसके पीछे राजनीतिक पहलू की ओर भी इशारा किया है.
- उनके अनुसार, ब्रिटिश सरकार शायद सीमा से पैदा होने वाली अव्यवस्था की जिम्मेदारी स्वतंत्रता के बाद सीधे अपने ऊपर नहीं लेना चाहती थी.
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By गौतम कुमार
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