Global Nursing Award के टाॅप 10 में जगह बनाने के बाद पुरस्कार से चूकीं शांति टेरेसा लकड़ा, कही ये बड़ी बात...

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 13 May 2023 1:40 PM

विज्ञापन

अवार्ड सेरेमनी का आयोजन कल रात लंदन में हुआ जिसमें यूके की मार्ग्रेट शेफर्ड विजेता बनीं. शांति टेरेसा लकड़ा को यह सम्मान भले ना मिल पाया हो, लेकिन इस अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार के मंच से उनके कार्यों की खूब प्रशंसा हुई. प्रभात खबर के साथ लंदन से शांति टेरेसा लकड़ा ने एक्सक्लूसिव बातचीत की.

विज्ञापन

नर्सिंग कैरियर की चर्चा होते ही हमारे जेहन में एक ऐसी ममतामयी महिला की तस्वीर उभरती है जिसके अंदर सेवा भाव कूट-कूट कर भरा हो. नर्सिंग कैरियर के इसी सेवा भाव को सम्मान देने के लिए प्रतिवर्ष लंदन में गार्जियंस ग्लोबल नर्सिंग अवार्ड (Aster Guardians Global Nursing Award 2023) दिया जाता है और झारखंड के लिए गौरव की बात यह है कि इस वर्ष टाॅप टेन में जगह बनाने वाली भारतीय महिला नर्स शांति टेरेसा लकड़ा का ननिहाल झारखंड में है.

अवार्ड सेरेमनी में मिली खूब प्रशंसा

अवार्ड सेरेमनी का आयोजन कल रात लंदन में हुआ जिसमें यूके की मार्ग्रेट शेफर्ड विजेता बनीं. शांति टेरेसा लकड़ा को यह सम्मान भले ना मिल पाया हो, लेकिन इस अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार के मंच से उनके कार्यों की खूब प्रशंसा हुई. प्रभात खबर के साथ लंदन से एक्सक्लूसिव बातचीत में शांति टेरेसा लकड़ा ने बताया कि यह उनके लिए गौरव का क्षण था. विजेता तो कोई एक ही बनता है, लेकिन आपके काम की सराहना होती है तो खुशी मिलती है.

undefined
2011 में मिला था पद्मश्री

पद्मश्री शांति टेरेसा लकड़ा ने बताया कि उन्हें 2010 में नेशनल फ्लोरेंस नाइटिंगेल नर्सिंग अवार्ड मिला है. इसके अलावा उन्हें 2011 में बेस्ट हेल्थ वर्कर का पुरस्कार और 2011 में ही पद्मश्री पुरस्कार भी मिला है. गार्जियंस ग्लोबल नर्सिंग पुस्कार के लिए टाॅप 10 में जगह बनाने के बाद उन्हें लंदन बुला लिया गया था. वे अभी 16 तारीख तक लंदन में ही हैं, उसके बाद स्वदेश लौटेंगी.

1972 में हुआ है शांति लकड़ा का जन्म

शांति टेरेसा लकड़ा ने बताया कि उनका जन्म एक मई 1972 को अंडमान में हुआ था और यहीं उनका पालन-पोषण भी हुआ है. उनके पिता ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के रहने वाले थे. वह इलाका झारखंड से सटा है, जबकि मां झारखंड की रहने वाली थीं. शांति लकड़ा छह भाई-बहन थे. अपनी बड़ी बहन से प्रेरणा लेकर शांति लकड़ा ने नर्सिंग के कैरियर को चुना. उससे पहले वे बड़ी से सीख कर मरीजों की सेवा करती थीं. 1996-97 में शांति टेरेसा लकड़ा ने मिड वाइफ का कोर्स किया, लेकिन उसके बाद वह अंडमान प्रशासन में क्लर्क का काम करने लगी. बाद में उनकी पोस्टिंग सुदूर इलाके में नर्स के रूप में हुई, उस वक्त उनके मन में व्याप्त सेवा भाव की वजह से उन्होंने नौकरी छोड़ दी और नर्सिंग के कैरियर को अपनाया.

undefined
आदिम जनजातियों के बीच 22 साल से कर रही हैं काम

शांति लकड़ा पिछले 22 साल से आदिम जनजातियों के बीच काम कर रही हैं और उन्हें जागरूक कर रही हैं. अपने कैरियर के अविस्मरणीय पलों को याद करते हुए शांति टेरेसा लकड़ा बताती हैं कि जिस साल सुनामी आया था, वह समय बहुत भयावह था. मेरा एक साल का बच्चा था, लेकिन वह मुझसे दूर था. पति, माता-पिता के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. उस वक्त सैकड़ों बीमारों की सेवा में मैं जुटी थी. इतने बीमार और जरूरतमंद लोग, लेकिन स्थिति इतनी खराब कि सभी दवा-दुकानें और यहां तक की रास्ते भी बह गये थे. संपर्क का जरिया नहीं बचा था. लोगों को जंगल के रास्ते जाकर दवाई और खाना लाना पड़ रहा था. शांति लकड़ा ने जरूरतमंदों की सेवा की. कई दिनों तक बिना एक ही कपड़े में बिना खाये- पीये. लोग उन्हें मेडिकल स्टाॅफ समझकर अपनी पीड़ा बताते थे और हरसंभव प्रयास करती थीं उनकी पीड़ा को कम करने का.

उरांव जनजाति से है शांति लकड़ा का संबंध

उरांव जनजाति की शांति लकड़ा ने बताया कि उनके पति रियल इस्टेट के कारोबार से जुड़े हैं और बेटा चेन्नई में फाॅर्मेसी का कोर्स कर रहा है. वे आजीवन अपने पेशे से जुड़कर लोगों की सेवा करना चाहती हैं. शांति टेरेसा लकड़ा का कहना है कि जब आप किसी जरूरतमंद मरीज की मदद करते हैं और जब वह ठीक होकर आपके प्रति आभार जताता है, तो इतनी खुशी मिलती है कि एेसा लगता है कि जीवन में इससे बड़ा कोई उपकार नहीं है. कोविड के दौरान भी शांति लकड़ा ने जारवा जनजाति के लोगों को वैक्सीनेट कराने के लिए बहुत काम किया. वे आदिम जनजातियों के साथ-साथ पूरे आदिवासी समुदाय के लिए काम करती हैं. वे फिलहाल पोर्ट ब्लेयर के जीबी पंत अस्पताल में काम करती हैं.

Also Read: नहीं सुधर रही रांची रिम्स की स्थिति, गलियारे में गर्मी की तपिश झेलकर इलाज कराने को विवश हुए मरीज
विज्ञापन
Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola