स्लोवाकिया दौरे के दौरान पीएम मोदी ने स्पीकर को गिफ्ट किया ठेकुआ, सुश्रुत संहिता और चरक संहिता
पीएम मोदी और ठेकुआ
PM Modi Thekua : पीएम मोदी अपनी विदेश यात्रा के दौरान भारतीय सभ्यता, संस्कृति और कला से जुड़े बेहतरीन नमूने राष्ट्राध्यक्षों और वहां के नेताओं को तोहफे में देते हैं. इस बार अपनी स्लोवाकिया दौरे के दौरान पीएम मोदी ने बिहार-झारखंड का प्रसिद्ध मिष्ठान ठेकुआ गिफ्ट किया है.
PM Modi Thekua : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी स्लोवाकिया दौरे के दौरान वहां के स्पीकर रिचर्ड राशी को तोहफे में बिहार-झारखंड का मशहूर मीठा ठेकुआ दिया. ठेकुआ बिहार और झारखंड का एक पारंपरिक मीठा नाश्ता है, जिसे गेहूं के आटे, गुड़ या चीनी, सौंफ और घी से बनाया जाता है. इसे खास तौर छठ पूजा के दौरान बनाया जाता है. अपने बेहतरीन स्वाद और अधिक दिनों तक खराब ना होने की वजह से यह बहुत खास माना जाता है. ठेकुआ भारतीय सांस्कृतिक परंपरा, त्योहारों के जश्न और इलाके की खाने की विरासत को दिखाता है.
सुश्रुत संहिता और चरक संहिता भी दिया गिफ्ट
पीएम मोदी ने स्लोवाकिया के स्पीकर रिचर्ड राशि को सुश्रुत संहिता और चरक संहिता भी उपहार स्वरूप दिया. सुश्रुत संहिता प्राचीन आयुर्वेदिक किताब है जिसे डॉक्टर सुश्रुत जिन्हें शल्य चिकित्सा का जनक माना जाता है, ने लिखा है. इस किताब में प्राचीन सर्जरी के बारे में बताया गया है. इसमें एडवांस्ड सर्जिकल टेक्नीक, इंस्ट्रूमेंट, एनाटॉमी और मेडिकल ट्रीटमेंट के बारे में बताया गया है, जिसमें राइनोप्लास्टी जैसे शुरुआती रिकंस्ट्रक्टिव प्रोसीजर भी शामिल हैं.
सर्जरी के अलावा, इसमें हेल्थकेयर के बड़े पहलू भी शामिल हैं जैसे इंटरनल मेडिसिन, टॉक्सिकोलॉजी, पीडियाट्रिक्स, न्यूट्रिशन और प्रिवेंटिव केयर, जो सेहत का एक पूरा नजरिया पेश करता है.
पीएम मोदी ने उन्हें चरक संहिता भी गिफ्ट की, जो आयुर्वेद की एक अहम किताब है. इसमें चिकित्सा से संबंधित जानकारियां दी गई हैं. यह किताब तर्क के आधार पर स्वास्थ्य, बीमारी, इंसानी शरीर क्रिया विज्ञान और सेहत की एक सिस्टमैटिक और विद्वत्तापूर्ण समझ पेश करता है.चरक संहिता भारत की समृद्ध वैज्ञानिक और बौद्धिक विरासत को दिखाती है और मेडिकल ज्ञान और दुनिया भर में विद्वानों की दिलचस्पी का एक महत्वपूर्ण स्रोत है.
प्रेसिडेंट पीटर पेलेग्रिनी को दिया थेवा मोटिफ कफलिंक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्लोवाकिया के प्रेसिडेंट पीटर पेलेग्रिनी को हाथ से बने थेवा मोटिफ कफलिंक उपहार स्वरूप दिया. ये कफलिंक प्रतापगढ़ की पारंपरिक ज्वेलरी क्राफ्ट को दिखाते हैं. इसे दुर्लभ थेवा टेक्नीक का इस्तेमाल करके बनाया जाता है. इनमें रंगीन ग्लास पर बारीक नक्काशी वाली सोने की शीट लगी होती हैं, जो प्रकृति से प्रेरित बारीक और सुंदर डिजाइन बनाती हैं.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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