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New Education Policy 2020: नई शिक्षा नीति की हर बातें, विजन और भविष्य यहां पढ़ें

By Prabhat khabar Digital
Updated Date
मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया है.
मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया है.
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New Education Policy, NEP 2020: देश की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की नई नीति आखिरकार आ गई है. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को नयी शिक्षा नीति(एनईपी) को मंजूरी दे दी, जिसमें स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक कई बड़े बदलाव किये गए हैं. नई शिक्षा नीति में स्कूल शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक कई बड़े बदलाव किए गए हैं. साथ ही, शिक्षा क्षेत्र में खर्च को सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत करने तथा उच्च शिक्षा में साल 2035 तक सकल नामांकन दर 50 फीसदी पहुंचने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. पढ़ें नई शिक्षा नीति की मुख्य बातें..

34 साल बाद आया बदलाव

सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बताया कि 34 साल से शिक्षा नीति में परिवर्तन नहीं हुआ था, इसलिए यह बेहद महत्वपूर्ण है. कैबिनेट ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम पुन: शिक्षा मंत्रालय करने को भी मंजूरी दे दी. गौरतलब है कि वर्तमान शिक्षा नीति 1986 में तैयार की गयी थी. नयी शिक्षा नीति का विषय 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में शामिल था. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के शासनकाल में 1985 में शिक्षा मंत्रालय का नाम बदलकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय कर दिया गया था. इसके अगले वर्ष राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की गयी थी.

नई शिक्षा नीति में 10+2 फॉर्मेट को खत्म

नयी नीति में बचपन की देखभाल और शिक्षा पर जोर देते कहा गया है कि स्कूल पाठ्यक्रम के 10 + 2 ढांचे की जगह 5 + 3 + 3 + 4 की नयी पाठयक्रम संरचना लागू की जाएगी, जो क्रमशः 3-8, 8-11, 11-14, और 14-18 साल की उम्र के बच्चों के लिए होगी. इसमें 3-6 साल के बच्चों को स्कूली पाठ्यक्रम के तहत लाने का प्रावधान है, जिसे विश्व स्तर पर बच्चे के मानसिक विकास के लिए महत्वपूर्ण चरण के रूप में मान्यता दी गई है.

छठी कक्षा से ही व्यावसायिक शिक्षा शुरू

उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को पसंदीदा विषय चुनने के लिए कई विकल्‍प दिए जाएंगे. कला एवं विज्ञान के बीच, पाठ्यक्रम व पाठ्येतर गतिविधियों के बीच और व्यावसायिक एवं शैक्षणिक विषयों के बीच कोई भिन्‍नता नहीं होगी. नयी नीति के तहत स्कूलों में छठे ग्रेड से ही व्यावसायिक शिक्षा शुरू हो जाएगी और इसमें इंटर्नशिप शामिल होगी. एक नई एवं व्यापक स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा ‘एनसीएफएसई 2020-21' एनसीईआरटी द्वारा विकसित की जाएगी.

स्थानीय/क्षेत्रीय भाषा पर जोर

नयी नीति में कम से कम ग्रेड 5 तक और उससे आगे भी मातृभाषा/स्थानीय भाषा/क्षेत्रीय भाषा को ही शिक्षा का माध्यम रखने पर विशेष जोर दिया गया है. विद्यार्थियों को स्कूल के सभी स्तरों और उच्च शिक्षा में संस्कृत को एक विकल्प के रूप में चुनने का अवसर दिया जाएगा. त्रि-भाषा फॉर्मूला में भी यह विकल्‍प शामिल होगा. इसके मुताबिक, किसी भी विद्यार्थी पर कोई भी भाषा नहीं थोपी जाएगी. भारत की अन्य पारंपरिक भाषाएं और साहित्य भी विकल्प के रूप में उपलब्ध होंगे.

स्कूल से ही विदेशी भाषा की पढ़ाई

विद्यार्थियों को ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत' पहल के तहत 6-8 ग्रेड के दौरान किसी समय ‘भारत की भाषाओं' पर एक आनंददायक परियोजना/गतिविधि में भाग लेना होगा. करवल ने कहा कि कोरियाई, थाई, फ्रेंच, जर्मन, स्पैनिश, पुर्तगाली, रूसी भाषाओं को माध्यमिक स्तर पर पेश किया जायेगा. उन्होंने कहा कि स्कूल छोड़ चुके बच्चों को फिर से मुख्य धारा में शामिल करने के लिए स्कूल के बुनियादी ढांचे का विकास और नवीन शिक्षा केंद्रों की स्थापना की जाएगी.

शिक्षा पर ज्यादा खर्च करेगी सरकार

एनईपी 2020 के तहत स्कूल से दूर रह रहे लगभग 2 करोड़ बच्चों को मुख्य धारा में वापस लाया जाएगा. उच्च शिक्षा सचिव अमित खरे ने कहा, शिक्षा में कुल जीडीपी का अभी करीब 4.43 फीसदी खर्च हो रहा है, लेकिन उसे 6 फीसदी करने का लक्ष्य है और केंद्र एवं राज्य मिलकर इस लक्ष्य को हासिल करेंगे. उन्होंने कहा कि हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं के अलावा आठ क्षेत्रीय भाषाओं में भी ई-कोर्स होगा. वर्चुअल लैब के कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जायेगा. इसके साथ ही नेशनल एजुकेशन टेक्नॉलोजी फोरम बनाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एनआरएफ) की स्थापना होगी जिससे अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा मिलेगा.

मल्टीपल एंट्री और एग्जिट: उच्च शिक्षा में आएगा बदलाव

बुधवार को मंत्रिमंडल की बैठक के बाद उच्च शिक्षा सचिव अमित खरे और स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता सचिव अनिता करवल ने प्रेस वार्ता के दौरान एक प्रस्तुति दी जिसमें नई शिक्षा नीति के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है. इसमें (लॉ और मेडिकल शिक्षा को छोड़कर) उच्च शिक्षा के लिये सिंगल रेगुलेटर (एकल नियामक) रहेगा. इसके अलावा उच्च शिक्षा में 2035 तक 50 फीसदी सकल नामांकन दर पहुंचने का लक्ष्य है.

नई नीति में मल्टीपल एंट्री और एग्जिट (बहु स्तरीय प्रवेश एवं निकासी) व्यवस्था लागू की गयी है . खरे ने बताया कि आज की व्यवस्था में अगर चार साल इंजीनियरिंग पढ़ने या 6 सेमेस्टर पढ़ने के बाद किसी कारणवश आगे नहीं पढ़ पाते हैं तो कोई उपाय नहीं होता, लेकिन मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम में 1 साल के बाद सर्टिफिकेट, 2 साल के बाद डिप्लोमा और 3-4 साल के बाद डिग्री मिल जाएगी. यह छात्रों के हित में एक बड़ा फैसला है.

4 साल का डिग्री कार्यक्रम

वहीं, जो छात्र शोध में जाना चाहते हैं उनके लिए 4 साल का डिग्री कार्यक्रम होगा, जबकि जो लोग नौकरी में जाना चाहते हैं वो तीन साल का ही डिग्री प्रोग्राम करेंगे. नयी व्यवस्था में एमए और डिग्री कार्यक्रम के बाद एफफिल करने से छूट की भी एक व्यवस्था की गई है. करवल ने कहा, स्कूल के पाठ्यक्रम और अध्यापन-कला का लक्ष्‍य यह होगा कि 21वीं सदी के प्रमुख कौशल या व्‍यावहारिक जानकारियां विद्यार्थियों को दे कर उनका समग्र विकास किया जाए तथा आवश्यक ज्ञान प्राप्ति एवं अपरिहार्य चिंतन को बढ़ाने व अनुभव आधारित शिक्षण पर अधिक फोकस करने के लिए पाठ्यक्रम को कम किया जाए.

अब नया सिलेबस आयेगा

स्कूली शिक्षा सचिव अनिता करवल ने बताया कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या (सिलेबस) 2005 के 15 वर्ष हो गए हैं और अब नया पाठ्यचर्या आयेगा. इसी प्रकार से शिक्षक शिक्षा के पाठ्यक्रम के भी 11 साल हो गए हैं, इसमें भी सुधार होगा. उन्होंने कहा कि बोर्ड परीक्षा के भार को कम करने की नयी नीति में पहल की गई है. बोर्ड परीक्षा को दो भागों में बांटा जा सकता है जो वस्तुनिष्ठ और विषय आधारित हो सकता है. उन्होंने बताया कि शिक्षा का माध्यम पांचवी कक्षा तक मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा या घर की भाषा में हो. करवल ने कहा कि बच्चों के रिपोर्ट कार्ड के स्वरूप मे बदलाव करते हुए समग्र मूल्यांकन पर आधारित रिपोर्ट कार्ड की बात कही गई है.

ऑनलाइन शिक्षा को आगे बढ़ाने पर जोर

हर कक्षा में जीवन कौशल परखने पर जोर होगा ताकि जब बच्चा 12वीं कक्षा में निकलेगा तो उसके पास पूरा पोर्टफोलियो होगा. स्कूलों में शैक्षणिक धाराओं, पाठ्येतर गतिविधियों और व्यावसायिक शिक्षा के बीच ख़ास अंतर नहीं किया जाएगा. इसके अलावा पारदर्शी एवं ऑनलाइन शिक्षा को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है.

फीस की अधिकतम सीमा होगी तय

नई शिक्षा नीति में फीस जैसे विषय को भी प्रमुखता से रखा गया है. जिसमें यह तय किया गया है, कि कौन संस्थान किस कोर्स की कितनी फीस रख सकता है, इसका भी एक मानक तैयार किया जाएगा. साथ ही अधिकतम फीस कितनी हो सकती है, इसका दायरा तय होगा. खरे ने साफ किया कि फीस पर यह कैपिंग ( अधिकतम सीमा) उच्च शिक्षा और स्कूली शिक्षा दोनों के लिए होगी. इसके दायरे में निजी और सरकारी दोनों ही संस्थान शामिल होंगे. मौजूदा समय में बच्चों की पढ़ाई में फीस एक बड़ी बाधा बनी हुई है. ऐसे में नीति में कहा गया है कि वह ऐसी फीस का दायरा रखेंगे, जिससे हर कोई पढ़ सके.

सरकारी-निजी संस्थानों के लिए एक नियम...

सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी परीक्षा आयोजित करेगी. सरकारी और निजी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए एक ही नियम होंगे. अगले 15 वर्षों में चरणबद्ध तरीके से कॉलेजों को संबंद्धता दी जाएगी. इसके साथ ही कॉलेजों की ग्रेडिंग और उन्हें स्वायत्तता देने के लिए राज्य स्तर पर तंत्र बनेगा. तय समय में कॉलेजों को स्वायत्तता मिलेगी या उन्हें विश्वविद्यालय से संबद्ध कॉलेज के रूप में विकसित किया जाएगा.

राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल का विस्तार

एससी, एसटी, ओबीसी और अन्य विशिष्ट श्रेणियों से जुड़े हुए छात्रों की योग्यता को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाएगा. छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले छात्रों की प्रगति को समर्थन प्रदान करना, उसे बढ़ावा देना और उनकी प्रगति को ट्रैक करने के लिए राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल का विस्तार किया जाएगा. निजी उच्च शिक्षण संस्थानों को अपने यहां छात्रों को बड़ी संख्या में मुफ़्त शिक्षा और छात्रवृत्तियों की पेशकश करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा.

लंबे परामर्श के बाद सामने आयी नीति

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति ने पिछले वर्ष मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को नयी शिक्षा नीति का मसौदा सौंपा था जब निशंक ने मंत्रालय का कार्यभार संभाला था.

Posted By: Utpal kant

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