New Book: भारत की मेडिकल शिक्षा व्यवस्था एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है. नीट परीक्षा के इर्द-गिर्द खड़ी होती गई कोचिंग इंडस्ट्री की पकड़, बढ़ती मानसिक त्रासदी और गुणवत्ता बनाम विस्तार की बहस को एक नयी किताब ने केंद्र में ला दिया है. कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल(कैग) के पूर्व डायरेक्टर जनरल पी शेष कुमार की किताब “अंडर द स्कैल्पेल: रिवाइविंग इंडियाज मेडिकल एजुकेशन” ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) से नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी ) तक के सुधारों का आकलन करते हुए यह सवाल उठाया है कि क्या भारत डॉक्टर बना रहा है या सिर्फ डिग्रियां बांट रहा है.
पुस्तक में नीट परीक्षा को लेकर बच्चों से लेकर अभिभावकों के मन में चल रहे द्वंद्व, दबाव और उससे निपटने के तरीके पर भी किताब में विस्तार से चर्चा की गयी है. हालांकि किताब में विशेष फोकस नीट परीक्षा और उस पर हावी कोचिंग उद्योग पर है. लेखक का मानना है कि नीट ने प्रवेश प्रक्रिया में भ्रष्टाचार को कम किया और एक राष्ट्रीय मानक स्थापित किया, लेकिन इसके साथ ही यह परीक्षा एक “ग्लैडिएटर प्रतियोगिता” में बदल गई है. आज हालात यह हैं कि छात्र 13–14 साल की उम्र से ही मेडिकल की तैयारी में झोंक दिए जाते हैं. 12–14 घंटे की कोचिंग, लगातार मॉक टेस्ट और रैंक की होड़ ने पढ़ाई को शिक्षा से ज़्यादा एक कारोबारी मॉडल बना दिया है.
एमबीबीएस के बाद की दुविधा
लेखक के मुताबिक कोटा, जिसे देश की कोचिंग राजधानी कहा जाता है, इस संकट का प्रतीक बनकर उभरा है. वर्ष 2023 में ही कोटा में कम से कम 26 छात्रों की आत्महत्याएं दर्ज हुईं. किताब चेतावनी देती है कि ये आंकड़े अपवाद नहीं, बल्कि एक बड़े मानसिक स्वास्थ्य संकट की झलक हैं, जिसे नीति-निर्माता लगातार नजरअंदाज कर रहे हैं. नीट ने एक ऐसा तंत्र बना दिया है जिसमें स्कूल शिक्षा, परिवार और छात्र-तीनों कोचिंग सिस्टम के बंधक बन चुके हैं. एमबीबीएस के बाद यह संकट और गहरा हो जाता है.
हर साल एक लाख से अधिक एमबीबीएस स्नातक सिर्फ 74 हजार पीजी सीटों के लिए लड़ते हैं. इनमें से लगभग आधी सीटें निजी कॉलेजों में हैं, जहां लोकप्रिय स्पेशियलिटी के लिए फीस एक करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है. मध्यम और निम्न आय वर्ग के छात्रों के लिए यह योग्यता नहीं, बल्कि “फिरौती” जैसी स्थिति पैदा कर देता है. नीट-पीजी में एक छोटी सी गलती वर्षों की मेहनत को बेकार कर सकती है-जिसके बाद मजबूरी में ड्रॉप, विदेश पलायन या करियर छोड़ने तक की नौबत आ जाती है.
नियमों में ढील और गुणवत्ता का सवाल
सरकार मेडिकल सीटों के विस्तार, एमबीबीएस की सीटें 83 हजार से बढ़ाकर 1.18 लाख से अधिक और PG की सीटें 42 हजार से बढ़ाकर 74 हजार तक पहुंचाने की बात करती है, जो सरकार की उपलब्धि मानी जा सकती है, परंतु पुस्तक में यह सवाल उठाया गया है कि “क्या यह विस्तार गुणवत्ता के साथ हुआ है”? कई नये मेडिकल कॉलेजों में मरीजों की संख्या कम, फैकल्टी अधूरी और लैब सुविधाएं कमजोर है. सुपर-स्पेशियलिटी की स्थिति और भी गंभीर है. पूरे देश में डीएम/,एमसीएच की सीटें 2,500 से भी कम हैं, जबकि जिला अस्पतालों में लगभग 80 फीसदी विशेषज्ञ पद खाली हैं.
फैकल्टी की कमी से निपटने के लिए एनएमसी ने नियमों में ढील दी. विज़िटिंग फैकल्टी, बेड की संख्या में कटौती और इन्फ्रास्ट्रक्चर मानकों को आसान किया गया. इससे दूर दराज इलाकों में कॉलेज खोलना संभव हुआ, लेकिन लेखक चेतावनी देते हैं कि इससे “डेस्क-बेस्ड इंस्पेक्शन” और शॉर्टकट कल्चर को भी बढ़ावा मिला है, जिससे क्लीनिक ट्रेनिंग कमजोर पड़ सकती है.
फर्जी फैकल्टी और नकली मरीजों से मिले निजात
किताब में ” नेक्सट” (नेशनल एग्ज़िट टेस्ट) पर भी विस्तार से चर्चा है. एमबीबीएस एग्ज़िट, लाइसेंस और पीजी प्रवेश को एक परीक्षा में समेटने की योजना 2019 से कानून में है, लेकिन बार-बार टलने से छात्र अनिश्चितता में फंसे हुए हैं. इसे पिछली बैचों पर लागू करने की कोशिशों ने अदालतों का दरवाजा खटखटाया, जिससे भरोसा और कमजोर हुआ.
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि डिजिटल निगरानी, बायोमेट्रिक अटेंडेंस और सीसीटीवी के बावजूद “फर्जी फैकल्टी और नकली मरीजों” की समस्या खत्म नहीं हुई. 2021 से 2023 के बीच 40 से अधिक मेडिकल कॉलेजों पर कार्रवाई हुई और कई मामले सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. हालिया सीबीआई छापों ने यह भी दिखाया कि घोटाले एनएमसी की जांच से नहीं, बल्कि बाहरी एजेंसियों से उजागर हो रहे हैं.
नीट-केंद्रित कोचिंग संस्कृति, असमान सीट वितरण, ऊंची फीस और कमजोर नियमन-इन सबके बीच किताब एक साफ संदेश देती है कि सुधार सिर्फ संख्या बढ़ाने से नहीं होंगे. मानसिक स्वास्थ्य समर्थन, राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत काउंसलिंग, पीजी सीटों का संतुलित विस्तार और सख्त नियामक निगरानी अनिवार्य है. यदि भारत वैश्विक स्वास्थ्य शक्ति बनना चाहता है, तो मेडिकल शिक्षा को कोचिंग इंडस्ट्री के शिकंजे से मुक्त करना होगा. वरना, लेखक जैसा चेतावनी दे रहे हैं, उस विफलता की कीमत अंतत: मानव जीवन को ही चुकाना पड़ेगा.

