भारत का इमरजेंसी तेल स्टॉक कितने दिन चलेगा, 1 दिन का खर्च कितना, किन गुफाओं में है स्ट्रेटजिक ऑयल रिजर्व, जानें

Published by : Anant Narayan Shukla Updated At : 19 May 2026 11:11 AM

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भारत का स्ट्रेटजिक ऑयल रिजर्व. एआई द्वारा जेनरेट की गई तस्वीर.

India Strategic Oil Reserve: होर्मुज संकट का असर अब सीधे लोगों की जेब पर पड़ रहा है. पेट्रोल और डीजल की कीमतें अब बढ़नी शुरू हो गई हैं. ऐसे में भारत के स्ट्रेटजिक ऑयल रिजर्व चर्चा में हैं. जानिए भारत की चार- विशाखापत्तनम, मंगलुरु, पडूर और चांदीखोल की भूमिगत ऑयल केव्स कितनी अहम हैं.

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India Strategic Oil Reserve: पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ते अमेरिका-ईरान टकराव ने  पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है. खासतौर पर होर्मुज स्ट्रेट को लेकर हालात बेहद संवेदनशील हैं. दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है. भारत इस संकट से अछूता नहीं है. अमेरिका और चीन ऐसे देश हैं, जिनके पास क्रूड ऑयल का बंपर स्टॉक है. स्टॉक तो भारत के पास भी है, लेकिन केवल महज 2.5 महीने का. हालांकि, भारत जैसी 140 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले देश  के लिए पेट्रोल-डीजल की जरूरत भी बड़ी है. ऐसे में भारत अपने तेल रखता कहां है?  

इससे पहले कि हम आपको भारत के स्ट्रेटजिक ऑयल रिजर्व्स के बारे में बताएं, कुछ आंकड़े आप जान लीजिए. भारत को एक दिन में लगभग 55 लाख बैरल तेल की जरूरत होती है. एक बैरल में 158.99 लीटर यानी मोटा-माटी 159 लीटर तेल होता है. अब अंदाजा लगा लीजिए भारत को कितना रिजर्न बनाकर रखना होगा. भारत अपनी कुल जरूरत का 85-90 प्रतिशत क्रूड ऑयल लगभग 40 देशों से आयात करता है. उसमें से होर्मुज स्ट्रेट के संकरे समुद्री रास्ते से लगभग 30 प्रतिशत आता है. अब यहां लगी है नाकेबंदी तो तेल के रेट भी बढ़े. शुरुआत में भारतीय तेल कंपनियों ने घाटा सहा, लेकिन जब नहीं रहा गया, तो तेल के दाम बढ़ा दिए गए. पहले 3 रुपये और अब करीब 90 पैसे रेट बढ़ा है. 

क्या हैं भारत के Strategic Petroleum Reserves?

इसी तरह आपात परिस्थितियों से निपटने के लिए भारत ने कई विशाल भूमिगत तेल भंडारण केंद्र बनाए हैं. ये प्राकृतिक चट्टानों को काटकर तैयार की गई अंडरग्राउंड केव्स हैं, जहां लाखों टन कच्चा तेल सुरक्षित रखा जाता है. इनका मकसद युद्ध, वैश्विक संकट, सप्लाई बाधित होने या तेल की कीमतों में भारी उछाल जैसी परिस्थितियों में देश की ऊर्जा जरूरतों को बनाए रखना है. भारत के पास 3 फंक्शनल सहित 4 बड़ी अंडरग्राउंड ऑयल केव्स हैं. इनमें संयुक्त रूप से 5.33 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल की स्टोरेज क्षमता है. 

1. विशाखापत्तनम: भारत का पहला रणनीतिक तेल भंडार

विशाखापत्तनम में भारत का पहला रणनीतिक तेल भंडारण केंद्र बनाया गया था. पूर्वी तट पर स्थित इस विशाल भूमिगत संरचना में लगभग 1.33 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल रखा जा सकता है. इस फैसिलिटी को दो हिस्सों में बांटा गया है. एक हिस्सा रणनीतिक रिजर्व के लिए सुरक्षित है, जबकि दूसरा हिस्सा HPCL के नियमित संचालन में इस्तेमाल किया जाता है. इस मॉडल से आपात स्थिति के दौरान भी तेल सप्लाई और रिफाइनरी संचालन को लगातार जारी रखने में मदद मिलती है.

2. मंगलुरु: UAE के सहयोग वाला अहम केंद्र

मंगलुरु में स्थित रणनीतिक तेल भंडारण केंद्र की क्षमता लगभग 1.5 मिलियन मीट्रिक टन है. यह सुविधा अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा साझेदारी के लिए भी खास मानी जाती है. रिपोर्ट्स के मुताबिक यूएई की कंपनी ADNOC यहां पहले से अपना कच्चा तेल स्टोर करती रही है. इससे भारत और UAE के बीच ऊर्जा सहयोग और मजबूत हुआ है. मंगलुरु का यह केंद्र भारत की पश्चिमी तट की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है.

3. पडूर: पहले चरण का सबसे बड़ा तेल भंडारण स्थल

तमिलनाडु का तेजी विकसित हो रहे उपनगर पडूर में मौजूद रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व भारत के SPR प्रोजेक्ट के पहले चरण का सबसे बड़ा केंद्र है. यहां चार अलग-अलग कम्पार्टमेंट बनाए गए हैं और हर एक की क्षमता करीब 0.625 मिलियन मीट्रिक टन है. यानी कुल 2.5 एमएमटी की बड़ी स्टोरेज क्षमता के कारण पडूर को भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का प्रमुख हिस्सा माना जाता है.

4. चांदीखोल: भविष्य की सबसे बड़ी स्टोरेज परियोजना

ओड़िशा के चांदीखोल में एक नई रणनीतिक तेल भंडारण परियोजना पर काम चल रहा है. इस सुविधा को लगभग 4 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल रखने के हिसाब से डिजाइन किया गया है.

बाकी का स्टोरेज कहां है?

इन भंडारों से भारत की मात्र 9-10 दिन की जरूरत पूरी होती है. तो हमने शुरुआत में बताया था कि भारत के पास लगभग 2.5 महीने का स्टॉक है. यानी 74 दिन तक भारत को तेल न मिले तो काम चल सकता है. तो बाकी का कहां है? दरअसल, भारत की तेल कंपनियां भी इमरजेंसी स्टॉक बनाकर रखती हैं. इन्हीं के पास बड़ा भंडार है. यानी 64-65 दिन का तेल इन तेल कंपनियों के पास रखा है. हालांकि, यह आंकड़े 2019-20 के हैं.

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अन्य स्टोरेज बनाने पर भी ध्यान दे रहा भारत

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय संकट का असर यहां पेट्रोल, डीजल और LPG की कीमतों पर तेजी से दिखाई देता है. होर्मुज संकट के वैश्विक ऊर्जा सप्लाई को लेकर दबाव बढ़ा है.ऐसे हालात ने यह साफ कर दिया कि केवल तेल खरीदना ही काफी नहीं है, बल्कि लंबे समय तक सुरक्षित भंडारण की क्षमता भी उतनी ही जरूरी है. यही वजह है कि भारत अब अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को मजबूत करने पर तेजी से काम कर रहा है.

राजस्थान, मध्य प्रदेश में सरकार जमीन के ऊपर भी तेल भंडारण करने की योजना बना रही है. राजस्थान में सबसे ज्यादा 5.625 मीट्रिक टन क्षमता का स्टोरोज रखने का प्लान है. वहीं, मंगलुरु और मध्य प्रदेश के बीना में भी इसी तरह की तैयारी है. पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत इन प्रोजेक्ट्स को डेवलप किया जाएगा. इसके साथ ही फिलहाल भारत के पास जो तेल भंडार हैं, उनकी स्टोरेज क्षमता भी बढ़ाई जा सकती है. 

भारत की यूएई के साथ अहम डील

तेल समस्या के समाधान की इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया यूएई दौरे के दौरान ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े कई अहम समझौते हुए. इनमें LPG सप्लाई, रक्षा सहयोग और रणनीतिक तेल भंडारण से जुड़े समझौते शामिल हैं. सबसे महत्वपूर्ण समझौता यूएई की अबूधाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) के साथ हुआ, जिसके तहत कंपनी भारत के रणनीतिक तेल भंडार नेटवर्क में लगभग 30 मिलियन बैरल तक कच्चा तेल स्टोर कर सकेगी. यानी भारत का ऑयल रिजर्व और बढ़ेगा.

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Anant Narayan Shukla

लेखक के बारे में

By Anant Narayan Shukla

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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