नागालैंड के लोगों की थाली में सजता रहेगा कुत्ते का मीट, बैन के आदेश को हाई कोर्ट ने यह कहते हुए किया खारिज

साल 2020 में लाइसेंस प्राप्त तीन व्यापारियों पर बैन लगा दिया गया था, जिसके बाद वे कोर्ट की शरण में गये थे और कोर्ट ने राज्य सरकार के आदेश पर नवंबर 2020 में स्टे लगा दिया था.
गुवाहाटी हाई कोर्ट के कोहिमा बेंच ने अपने एक फैसले में राज्य सरकार के उस आदेश को खारिज कर दिया है, जिसमें कुत्ते के मीट की बिक्री और कर्मिशियल इंपोर्ट पर रोक लगायी गयी थी. कोर्ट ने कहा कि कुत्ते का मांस खाना नागालैंड के लोगों की आदत है और उनके भोजन में शामिल है. आज के आधुनिक युग में भी नागालैंड के लोग अपनी इस खाद्य परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं इसलिए कुत्ते के मीट की बिक्री को रोकना सही नहीं है.
गौरतलब है कि साल 2020 में लाइसेंस प्राप्त तीन व्यापारियों पर बैन लगा दिया गया था, जिसके बाद वे कोर्ट की शरण में गये थे और कोर्ट ने राज्य सरकार के आदेश पर नवंबर 2020 में स्टे लगा दिया था. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कुत्ते का मांस नागालैंड के लोगोंं के बीच एक स्वीकार्य भोज्य पदार्थ है इसलिए इसपर बैन उचित नहीं है. न्यायमूर्ति वैंकुंग ने कहा कि 2011 के खाद्य सुरक्षा और विनियम में जानवरों की परिभाषा के तहत कुत्तों का उल्लेख नहीं किया गया है. न्यायाधीश ने कहा कि इसे लेकर आश्चर्य भी नहीं है क्योंकि कुत्तों का मांस भारत में पूर्वोत्तर राज्य के कुछ ही हिस्सों में खाया जाता है.
गुवाहाटी हाई कोर्ट के कोहिमा बेंच ने कहा कि कुत्ते के मांस को मानव उपभोग के भोजन का मानक नहीं माना जाता है. यही वजह है कि इसे मानव उपभोग के लिए सुरक्षित जानवरों की श्रेणी में नहीं रखा गया है, इसकी वजह यह है कि यह सोचा ही नहीं जाता है कि कुत्ते का मांस खाया जा सकता है.
नागालैंड की जनजातियां कुत्ते के मांस को औषधि मानती हैं, उनके यहां कुत्ते का मांस खाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है. उनके बीच यह मान्यता है कि कुत्ते का मांस खाने से उन्हें अत्यधिक प्रोटीन मिलता है जो स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है. हालांकि इस बात के कोई पुख्ता प्रमाण नहीं हैं. कई संगठन इस बात को लेकर भी सरकार का विरोध कर रहे थे कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में अपनी पसंद का भोजन करने का सबको अधिकार है.
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By रजनीश आनंद
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रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.
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रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.
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