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नागालैंड के लोगों की थाली में सजता रहेगा कुत्ते का मीट, बैन के आदेश को हाई कोर्ट ने यह कहते हुए किया खारिज

Updated at : 07 Jun 2023 12:35 PM (IST)
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नागालैंड के लोगों की थाली में सजता रहेगा कुत्ते का मीट, बैन के आदेश को हाई कोर्ट ने यह कहते हुए किया खारिज

साल 2020 में लाइसेंस प्राप्त तीन व्यापारियों पर बैन लगा दिया गया था, जिसके बाद वे कोर्ट की शरण में गये थे और कोर्ट ने राज्य सरकार के आदेश पर नवंबर 2020 में स्टे लगा दिया था.

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गुवाहाटी हाई कोर्ट के कोहिमा बेंच ने अपने एक फैसले में राज्य सरकार के उस आदेश को खारिज कर दिया है, जिसमें कुत्ते के मीट की बिक्री और कर्मिशियल इंपोर्ट पर रोक लगायी गयी थी. कोर्ट ने कहा कि कुत्ते का मांस खाना नागालैंड के लोगों की आदत है और उनके भोजन में शामिल है. आज के आधुनिक युग में भी नागालैंड के लोग अपनी इस खाद्य परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं इसलिए कुत्ते के मीट की बिक्री को रोकना सही नहीं है.

साल 2020 में लगाया गया था प्रतिबंध

गौरतलब है कि साल 2020 में लाइसेंस प्राप्त तीन व्यापारियों पर बैन लगा दिया गया था, जिसके बाद वे कोर्ट की शरण में गये थे और कोर्ट ने राज्य सरकार के आदेश पर नवंबर 2020 में स्टे लगा दिया था. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कुत्ते का मांस नागालैंड के लोगोंं के बीच एक स्वीकार्य भोज्य पदार्थ है इसलिए इसपर बैन उचित नहीं है. न्यायमूर्ति वैंकुंग ने कहा कि 2011 के खाद्य सुरक्षा और विनियम में जानवरों की परिभाषा के तहत कुत्तों का उल्लेख नहीं किया गया है. न्यायाधीश ने कहा कि इसे लेकर आश्चर्य भी नहीं है क्योंकि कुत्तों का मांस भारत में पूर्वोत्तर राज्य के कुछ ही हिस्सों में खाया जाता है.

मानव उपभोग के लिए सुरक्षित जानवरों की सूची में कुत्ते नहीं

गुवाहाटी हाई कोर्ट के कोहिमा बेंच ने कहा कि कुत्ते के मांस को मानव उपभोग के भोजन का मानक नहीं माना जाता है. यही वजह है कि इसे मानव उपभोग के लिए सुरक्षित जानवरों की श्रेणी में नहीं रखा गया है, इसकी वजह यह है कि यह सोचा ही नहीं जाता है कि कुत्ते का मांस खाया जा सकता है.

नागालैंड के लोग कुत्ते के मांस को दवाई मानते हैं

नागालैंड की जनजातियां कुत्ते के मांस को औषधि मानती हैं, उनके यहां कुत्ते का मांस खाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है. उनके बीच यह मान्यता है कि कुत्ते का मांस खाने से उन्हें अत्यधिक प्रोटीन मिलता है जो स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है. हालांकि इस बात के कोई पुख्ता प्रमाण नहीं हैं. कई संगठन इस बात को लेकर भी सरकार का विरोध कर रहे थे कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में अपनी पसंद का भोजन करने का सबको अधिकार है.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

राजनीति,सामाजिक, इतिहास, खेल और महिला संबंधी विषयों पर गहन लेखन किया है. तथ्यपरक रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक लेखन में रुचि. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक. IM4Change, झारखंड सरकार तथा सेव द चिल्ड्रन के फेलो के रूप में कार्य किया है. पत्रकारिता के प्रति जुनून है. प्रिंट एवं डिजिटल मीडिया में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव.

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