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किसान आंदोलन: दिल्ली बॉर्डर पर रह रहे गरीबों के लिए था वरदान, किसानों के लौटते ही सताने लगी भोजन की चिंता

Updated at : 12 Dec 2021 6:36 AM (IST)
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किसान आंदोलन: दिल्ली बॉर्डर पर रह रहे गरीबों के लिए था वरदान, किसानों के लौटते ही सताने लगी भोजन की चिंता

किसान घर लौटे, तो सरकार ने राहत की सांस ली. लेकिन, उन लोगों का क्या जिन्हें लंगर में अच्छा भोजन मिलता था. टेंट में सिर छुपाने की जगह मिल गयी थी. विस्तार से पढ़ें सिंघू, टिकरी और अन्य बॉर्डर के गरबों का दर्द...

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नयी दिल्ली: किसानों का आंदोलन समाप्त/स्थगति होने से केंद्र और राज्यों की सरकारों ने भले राहत की सांस ली हो, एक बड़ा तबका है, जिन्हें इस आंदोलन के खत्म होने का दुख है. किसानों के दिल्ली की सीमाओं को खाली करने का गम है. इसकी वजह है. अब इन्हें अच्छा भोजन नहीं मिलेगा. सर्दी, गर्मी और बारिश में फिर खुले आसमान के नीचे जीवन बिताना होगा.

शनिवार को दिल्ली-हरियाणा के सिंघू सीमा पर हजारों किसानों ने अपना विरोध प्रदर्शन समाप्त कर दिया और लंगर बंद कर दिया. इसके बाद से 13 वर्षीय आर्यन को अब दो जून की रोटी की चिंता सता रही है. आर्यन कोई अकेला नहीं, बल्कि उसकी तरह कई लोग हैं, जो किसानों द्वारा स्थापित सामुदायिक रसोई में भोजन करते थे और एक साल से अधिक के विरोध प्रदर्शन के दौरान उनके द्वारा लगाये गये तंबुओं में सोते थे.

ये बच्चे हमारे विरोध-प्रदर्शन का हिस्सा बन गये थे, क्योंकि वे यहां भोजन के लिए आया करते थे. उन्होंने मुझे मेरे पोतों की याद दिला दी थी. उन्हें यहां रखना अच्छा लगता था. अब ईश्वर उनकी रक्षा करेंगे.
सतवंत सिंह, मोहाली के किसान

आज सुबह झुग्गीवासियों सहित बड़ी संख्या में बच्चों और स्थानीय गरीबों ने किसानों के लंगर पर आखिरी बार नाश्ता किया. कुंडली की झुग्गियों में रहने वाला 13 वर्षीय आर्यन ने बताया, हम अपना नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का खाना यहीं लंगर में करते थे. आज लंगर में यह हमारा आखिरी नाश्ता है. अब, हमें या तो खुद खाना बनाना होगा या अन्य विकल्पों की तलाश करनी होगी.

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किसानों ने कहा कि उनके मन में भी ऐसे स्थानीय बच्चों के लिए भावनाएं पैदा हो गयीं थीं, जो विरोध स्थल पर आते थे और उन्हें अपने ही बेटों और पोते की याद दिलाते थे. मोहाली के सतवंत सिंह ने कहा, ‘ये बच्चे हमारे विरोध-प्रदर्शन का हिस्सा बन गये थे, क्योंकि वे यहां भोजन के लिए आया करते थे. उन्होंने मुझे मेरे पोतों की याद दिला दी थी. उन्हें यहां रखना अच्छा लगता था. अब ईश्वर उनकी रक्षा करेंगे.’

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मलिन बस्तियों के निवासी आमतौर पर इस क्षेत्र में कारखानों या गोदामों में काम करते हैं. किसानों द्वारा बनाये गये अस्थायी टेंटों में रहने वाले बेघर लोगों को अपने रहने की व्यवस्था को लसर चिंता सता रही थी.

सुपौल के मोनू को टेंट में मिल गयी थी शरण

बिहार के सुपौल के 38 वर्षीय मोनू कुशवाहा ने कहा कि किसानों के विरोध-प्रदर्शन के लिए सिंघू सीमा पर आने से पहले, वह फुटपाथ पर सोता था, लेकिन पिछले साल आंदोलन शुरू होने के बाद हालात बदल गये थे. कुशवाहा ने अफसोस जताते हुए कहा, ‘किसानों के आंदोलन के दौरान, मैं उनके एक तंबू में सोता था और लंगर में खाना खाता था. अब यह सब बंद हो जायेगा और मैं फिर से फुटपाथ पर आ जाऊंगा.’

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कुंडली में केएफसी टावर के पास स्थित झुग्गियों में रहने वाले आठ वर्षीय मौसम ने कहा कि वह पिछले एक साल से लंगर में अच्छा खाना खा रहा था. उसने कहा, ‘मेरे पिता एक कारखाने में काम करते हैं. लेकिन चूंकि परिवार बड़ा है, इसलिए हमें अक्सर एक समय का भोजन छोड़ना पड़ता है. लेकिन पिछले एक साल से, हम लंगर में बहुत सारा खाना खाते थे. हम घर के लिए भी पैक करवाकर ले जाते थे. यह सब अब बंद हो जायेगा.’

लंगर में खाना खाकर स्कूल चला जाता था तरुण

ग्यारह वर्षीय तरुण ने कहा, ‘मेरा स्कूल राजमार्ग के दूसरी ओर स्थित है. जब से किसान यहां आये थे, मुझे यातायात नहीं होने के कारण सड़क पार करने में कोई समस्या नहीं होती थी. मैं यहां खाना खाता था और फिर स्कूल चला जाता था. यह मेरे लिए दुख की बात है कि किसान वापस जा रहे हैं.’ तरुण के पिता एक शोरूम में काम करते हैं.

एजेंसी इनपुट

Posted By: Mithilesh Jha

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