...तो क्या कोरोना के सभी मरीजों को नहीं पड़ती रेमडेसिविर की जरूरत? जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ
Author : Prabhat Khabar Digital Desk Published by : Prabhat Khabar Updated At : 19 Apr 2021 9:48 AM
कोरोना से संक्रमित सभी मरीजों को एंटीवायरल रेमडेसिविर इंजेक्शन की जरूरत नहीं पड़ती. ज्यादातर मामलों में देखा यह गया है कि मरीज की कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट आते ही परिजन रेमडेसिविर और ऑक्सीजन ढूंढने लगते हैं, जबकि ऐसा नहीं है. कोरोना के लक्षण आने के बाद भी यदि आपको अन्य किसी तरह की कोई गंभीर बीमारी नहीं है, तो अस्पताल में भर्ती में होने की भी जरूरत नहीं है.
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अस्पतालों में केवल सीमित प्रयोग के लिए दिया जा सकता है रेमडेसिवीर
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डॉक्टर या अस्पताल मरीज से बाहर से नहीं लाने को कह सकते यह दवा
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रेमडेसिविर की कालाबाजारी करने वालों पर हो सकती है कानूनी कार्रवाई
Coronavirus infection : देश में कोरोना की दूसरी लहर में नए मरीजों की संख्या में तेजी आने के साथ ही इसके इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा रेमडेसिविर की मांग भी बढ़ गई है. आलम यह कि कई जगहों पर इसकी कालाबाजारी की जा रही है. अस्पतालों में इसके सीमित इस्तेमाल के दिशानिर्देश होने के बावजूद रेमडेसिविर की मांग केमिस्ट की दुकानों से की जा रही है. सरकार ने हाल ही में रेमडिसविर के दाम में भी कमी करने के साथ ही इसके निर्यात पर रोक लगा दी है. पहले इंजेक्शन की घरेलू मांग को पूरा किया जाएगा. बावजूद इसके यह जानना बेहद जरूरी है कि कब और किसको रेमडेसिविर की जरूरत है और इसकी बिक्री संबंधी नियम क्या है? रेमडेसिवीर के प्रयोग और इससे संबंधित दिशानिर्देशों पर अहम सवालों का जवाब दे रहे हैं जीटीबी अस्पताल के कम्यूनिटी मेडिसिन विभाग के पूर्व प्रोफेसर और एनआईआईआरएनसीडी जोधपुर के निदेशक डॉ अरुण शर्मा. जानिए, वे रेमडेसिविर के इस्तेमाल को लेकर क्या सलाह देते हैं.
नहीं, कोरोना से संक्रमित सभी मरीजों को एंटीवायरल रेमडेसिविर इंजेक्शन की जरूरत नहीं पड़ती. ज्यादातर मामलों में देखा यह गया है कि मरीज की कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट आते ही परिजन रेमडेसिविर और ऑक्सीजन ढूंढने लगते हैं, जबकि ऐसा नहीं है. कोरोना के लक्षण आने के बाद भी यदि आपको अन्य किसी तरह की कोई गंभीर बीमारी नहीं है, तो अस्पताल में भर्ती में होने की भी जरूरत नहीं है. डॉक्टर की सलाह पर ही रेमडिसविर इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. इंजेक्शन को लेकर अभी तक किए गए क्लीनिकल ट्रायल में यह देखा गया कि यह इंजेक्शन संक्रमण को बढ़ने से रोकता है. इस पर अभी प्रयोगात्मक अध्ययन किए जा रहे हैं और इंजेक्शन का प्रयोग केवल अस्पतालों में इमरजेंसी यूज आर्थराइजेशन के तहत ही किया जा सकता है.
कोरोना के बहुत गंभीर मरीज जिन्हें आरटीपीसीआर के अतिरिक्त सीटी स्केन में चेस्ट में भी कोरोना पॉजिटिव देखा गया है या ऐसे मरीज जिनका सप्ताह भर से बुखार कम नहीं हो या फिर ऐसे मरीज जिन्हें लगातार ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत है. ऐसे मरीजों को रेमडेसिविर इंजेक्शन अस्पताल या इलाज करने वाले चिकित्सक द्वारा ही दिया जाता है.
भारत सरकार द्वारा तैयार किए गए कोरोना ट्रीटमेंट प्रोटोकाल के अनुसार रेमडेसिविर रिटेल शॉप पर नहीं बेचा जा सकता. सीमित इस्तेमाल तहत अस्पतालों में ही इसके आपातकालीन प्रयोग की अनुमति दी जाती है. यदि कोई अस्पताल या डॉक्टर इसे मरीज के परिजनों से बाहर से खरीदने के लिए दबाव बनाता है, तो इसे प्रोटोकॉल का उल्लंघन कहा जा जाएगा. रेमडेसिविर को मरीज बिना डॉक्टर की सलाह पर घर पर भी प्रयोग नहीं कर सकते और न ही इसे डॉक्टर मरीज को घर पर लेने का परामर्श दे सकते. कोविड प्रबंधन के सभी उपायों में रेमडेसिविर की बहुत कम भूमिका है. बावजूद इसके गंभीर मरीजों के लिए इसकी मांग बढ़ी है. इसे देखते हुए सरकार ने रेमडेसिविर का दाम आधा करने के साथ ही एनपीपीए (नेशनल फार्मासियुटिकल प्राइसिंग आर्थोरिटी) से इसके बेवजह प्रयोग को नियंत्रित करने की भी बात कही है.
खुदरा या रिटेल शॉप पर इस इंजेक्शन की बिक्री नहीं हो सकती. सीमित प्रयोग उत्पाद श्रेणी के तहत इसे केवल अस्पतालों में आपूर्ति किया जाता है. यदि खुदरा दवा कारोबारी इसे खुले बाजार में बेच रहे हैं, तो यह गलत है.
रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के साथ हाल में हुई बैठक में रेमडेसिविर के निर्यात पर रोक लगा दी गई है. पहले इंजेक्शन का उत्पादन सात प्रमुख फार्मास्युटिकल कंपनियों द्वारा किया जाता था, जिससे रेमडेसिविर के हर महीने 38 लाख वायल का उत्पादन होता था. छह अतिरिक्त साइट्स पर इंजेक्शन का उत्पादन होने के बाद अब भारत में हर महीने 78 लाख वायल तैयार किए जा सकेगें. घरेलू मांग को पूरा करने के लिए इंजेक्शन के निर्यात को रोकने का भी अहम फैसला किया गया है. रेमडेसिविर का मूल्य अब अधिकतम 5000 और न्यूनतम 899 रुपये कर दिया गया है.
जरूरी दवाओं के स्टॉक को इकट्टा करना या निर्धारित दाम से अधिक पर बेचना या फिर दवा होने पर भी नहीं देना, बेवजह मरीजों से दवा रिटेल से लाने पर जोर देना आदि एपिडेमिक एक्ट में दंडनीय हैं. ऐसा करने पर दवा विक्रेता का लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है, लेकिन ऐसे अधिकांश मामलों में मरीज खुद शिकायत नहीं करते या फिर जो शिकायतें आती हैं, उनमें पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिल पाते. इस कारण आसानी से रिटेल या खुदरा दवा विक्रेता बच निकलते हैं.
Posted by : Vishwat Sen
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