क्या इलाहाबाद विश्वविद्यालय का नाम बदलने से धूमिल होगी प्रतिष्ठा? इन यूनिवर्सिटी का हुआ ‘नेमचेंज’...
Allahabad University
उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों में शुमार इलाहाबाद शहर का नाम 2018 में बदलकर प्रयागराज कर दिया, इसके पीछे तर्क यह था कि इस शहर का प्राचीन नाम यही था जिसे मुस्लिम शासकों ने बदलकर इलाहाबाद कर दिया था. यह तो पुरानी बात हो गयी है, अब विवाद यह है कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय और योगी आदित्यनाथ की सरकार यह चाहती है कि पूर्वांचल के सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय इलाहाबाद विश्वविद्यालय का नाम बदलकर प्रयागराज विश्वविद्यालय कर दिया जाये.
उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों में शुमार इलाहाबाद शहर का नाम 2018 में बदलकर प्रयागराज कर दिया, इसके पीछे तर्क यह था कि इस शहर का प्राचीन नाम यही था जिसे मुस्लिम शासकों ने बदलकर इलाहाबाद कर दिया था. यह तो पुरानी बात हो गयी है, अब विवाद यह है कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय और योगी आदित्यनाथ की सरकार यह चाहती है कि पूर्वांचल के सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय इलाहाबाद विश्वविद्यालय का नाम बदलकर प्रयागराज विश्वविद्यालय कर दिया जाये.
इसके लिए मंत्रालय ने विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद को पत्र लिखा है और उनसे इस बाबत सलाह मांगी है. हालांकि परिषद के 15 सदस्यों में से 12 सरकार के प्रस्ताव से सहमत नहीं है, उनका मानना है कि जब विश्वविद्यालय के नाम के साथ प्रयागराज जुड़ा ही है, तो फिर नाम बदलने की कवायद क्यों की जा रही है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय की एक पहचान है, नाम बदल देने से इसकी पहचान मिट जायेगी.
कार्यकारी परिषद के विरोध के बाद संभव है कि विश्वविद्यालय का नाम ना बदला जाये, लेकिन हमारे देश में विश्वविद्यालयों का, शहरों का और सड़कों का नाम बदलने की परंपरा पुरानी है. देश में जिस पार्टी की सरकार रही उसने अपने मन से परंपराओं और मान्यताओं की आड़ में यह ‘नेमचेंज’ किया. कलकत्ता अब कोलकाता है, बंबई अब मुंबई है, मद्रास बना चेन्नई और गुड़गांव गुरुग्राम. इसी तरह मुगलसराय स्टेशन का नाम पंडित दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन हो गया है. वैसे ही दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम कलाम रोड और शाहजहां रोड का दशरथ मांझी रोड कर दिया गया.
तो अब बात करें उन विश्वविद्यालयों की जिनका नाम बदल दिया गया. यहां गौर करने वाली बात यह है कि देश में जब विश्वविद्यालयों का नाम बदलने की पेशकश हुई तो उसका विरोध भी हुआ. विरोध अगर मुखर हुआ तो प्रस्ताव वापस भी हो गया. लेकिन जो प्रमुख विश्वविद्यालय सामने आते हैं , जिनका नाम बदला गया, उनमें प्रमुख है भागलपुर विश्वविद्यालय जिसका नाम बदलकर 1991 में तिलका मांझी विद्यालय कर दिया गया.
वैसे बिहार यूनिवर्सिटी, मुजफ्फरपुर का नाम बदलकर अंबेडकर यूनिवर्सिटी कर दिया गया. ऐसे ही मेरठ यूनिवर्सिटी का नाम बदलकर चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय कर दिया, जबकि आगरा विश्वविद्यालय का नाम 1995 में बदलकर डॉ भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय कर दिया गया. गौरतलब है कि किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के नाम को लेकर भी विवाद हुआ था, लेकिन बाद में तात्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने विवाद पर विराम लगा दिया था और विश्वविद्यालय का नाम बदला नहीं गया था.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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