बाजार के कारण हिंदी बन रही है विदेशियों के भी रोजगार की भाषा

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 10 Nov 2019 12:54 PM

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भोपाल : भारत के विशाल बाजार के कारण हिंदी अब विदेशी लोगों के रोजगार की भी भाषा बन रही है. कई देशों में व्यापार प्रबंधन और मार्केटिंग से जुड़े लोग इसे सीख रहे हैं. यह मानना है विदेशों में हिंदी पढ़ाने वाले विदेशी हिंदी विशेषज्ञों का. मूलत: वेनिस के रहने वाले मार्को जोल्ली इटली के […]

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भोपाल : भारत के विशाल बाजार के कारण हिंदी अब विदेशी लोगों के रोजगार की भी भाषा बन रही है. कई देशों में व्यापार प्रबंधन और मार्केटिंग से जुड़े लोग इसे सीख रहे हैं. यह मानना है विदेशों में हिंदी पढ़ाने वाले विदेशी हिंदी विशेषज्ञों का.

मूलत: वेनिस के रहने वाले मार्को जोल्ली इटली के कुछ विश्वविद्यालयों के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ा चुके हैं. उन्होंने कहा कि अब यूरोपीय को भी यह महसूस होने लगा है कि यदि भारत के साथ व्यापार करना है, तो हमें यहां सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी सीखनी होगी.

जोल्ली ने कहा कि उन्होंने इटली और दुबई में हिंदी के ऐसे कोर्स तैयार किये, जो विशेषतौर पर ‘बिजनेस एक्जिक्यूटिव’ और प्रबंधन से जुड़े लोगों के लिए बनाये गये थे. उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को, जो हिंदी सिखायी जाती है, वह प्राचीन नहीं, आम बोलचाल की हिंदी है.

उन्होंने अपना एक अनुभव साझा करते हुए कहा कि उनके कोर्स में शामिल रही एक लड़की का जब दुबई में भारतीय स्वामित्व वाली कंपनी में साक्षात्कार हुआ, तो लोग उसकी हिंदी सुनकर दंग रह गये. वह बिल्कुल आम बोलचाल वाली हिंदी बोल रही थी. जोली की पत्नी भी हिंदी में पीएचडी कर चुकी हैं. वह इस समय वाराणसी में एक ‘हिंदी स्टडी सेंटर’ भी चला रहे हैं.

उन्होंने कहा कि उनके हिंदी प्रेम के कारण उनका हिंदुस्तान प्रेम कई गुणा बढ़ गया. इस्राइल के तेल अवीव विश्वविद्यालय के पूर्व एशिया विभाग में हिंदी पढ़ाने वाले डॉ गेनादी श्लोम्पेर ने ताशकंद में हिंदी की पढ़ाई की थी. विदेशों में रोजगार के लिहाज से हिंदी के महत्व के बारे में उनका मानना है कि भारत से व्यापार करने वाली कंपनियों को हिन्दी जानने वालों की आवश्यकता अक्सर पड़ती है.

उन्होंने माना कि तेल अवीव विश्वविद्यालय में हिंदी की तुलना में चीनी और जापानी भाषा पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या अधिक है. फिर भी लोग भारतीय सभ्यता और हिंदी फिल्मों के कारण हिंदी की ओर आकर्षित अवश्य होते हैं. उन्होंने कहा कि शायद ही कोई इस्राइली हो, जिसने हिंदी फिल्म या इसके गाने न देखे हों.

डॉ श्लोम्पेर ने स्वीकार किया कि हिब्रू भाषा में हिंदी साहित्य का अधिक अनुवाद नहीं हुआ. किंतु उन्होंने काफी उम्मीदों के साथ कहा कि अब उनके द्वारा पढ़ायी गयी पीढ़ी, हिंदी साहित्य को उनके देश की भाषा में अनुदित करेगी. अर्मेनिया के येरवान से आयी हिंदी विद्वान हृपसीमे ने शुरू में विदेशी भाषा को सीखने की ललक के कारण हिंदी सीखी. उन्होंने रामायण कथा को संक्षिप्त करते हुए इसे अपने देश की भाषा में अनुवाद किया.

हिंदी में रोजगार की संभावना पर उनका मानना है कि उनके देश में अनुवाद और दुभाषिया कामों के लिए ही अक्सर इसकी आवश्यता पड़ती है. हृपसीमे ने यह भी स्वीकार किया कि वह अपने हिंदी प्रेम के कारण भारत बार-बार आना पसंद करती हैं.

राज कपूर, मिथुन चक्रवर्ती और शाहरुख खान की फिल्मों की दीवानगी के कारण हिंदी सीखने वाली कजाखस्तान में अल फराबी कजख राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की दरीगा कोकएवा मानती हैं कि सोवियत संघ से अलग हुए लगभग सभी देशों में हिंदी को लेकर एक आकर्षण है.

उन्होंने कहा कि उनके शिक्षण संस्थान में भी जो लोग हिंदी पढ़ने आते हैं, उनमें से अधिकतर का उद्देश्य इसे रोजगार से जोड़ना होता है. दरीगा को इस बात का अफसोस है कि वहां हिंदी सीखने वाले छात्रों को हिंदी की समुचित किताबें नहीं मिल पाती हैं. उन्होंने कहा कि इसके लिए कजाख्सतान में भारतीय दूतावास को हिन्दी पुस्तकों के लिए अधिक आर्थिक मदद दी जानी चाहिए.

ये चारों विदेशी विद्वान यहां टैगोर अंतरराष्ट्रीय कला साहित्य महोत्सव में भाग लेने के लिए यहां आये थे. इनके साथ ही कई अन्य विदेशी हिंदी विद्वान और प्रवासी हिंदी साहित्यकार इस चार दिवसीय महोत्सव में शामिल हो रहे हैं.

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