सिद्धपीठ: हरदी स्थित मां वन देवी दुर्गा स्थान में बहती है आस्था की बयार

पिंड रूप में विराजमान हैं वन देवी
सुपौल. जिला मुख्यालय से मात्र 12 किलोमीटर पूरब सुपौल-सिंहेश्वर मुख्य मार्ग पर हरदी गांव स्थित मां वन देवी दुर्गा स्थान आमजन के अटूट विश्वास और आस्था का प्रमुख केंद्र है. यहां स्थापित मां दुर्गा को सिद्धपीठ माना जाता है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि जो भक्त यहां सच्चे मन से पूजा-अर्चना करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. मंगलवार और शुक्रवार को यहां विशेष पूजा का आयोजन होता है. साथ ही सालभर माता को छाग की बलि दी जाती है. खासतौर से दुर्गा पूजा के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है और पूरा क्षेत्र मां के जयकारों से गूंज उठता है. पिंड रूप में विराजमान हैं वन देवी हरदी दुर्गा स्थान में माता दुर्गा का स्वरूप पिंड रूप में है. वर्षों तक माता बेर के पेड़ों के बीच विराजमान रही. इसी कारण उन्हें वन देवी की संज्ञा दी गई. श्रद्धालुओं का मानना है कि माता को खुले आसमान और बेर के पेड़ों के बीच रहना ही प्रिय था. यही वजह है कि लंबे समय तक मंदिर निर्माण के प्रयास असफल होते रहे. हालांकि जून 2014 में ग्रामीणों ने सामूहिक सहयोग और विशेष पूजा-अर्चना के बाद माता की इच्छा से भव्य मंदिर का निर्माण किया गया. आज भी यहां की आस्था और श्रद्धा का भाव अद्वितीय है. पांडवों व वीर लौरिक से जुड़ी आस्था हरदी स्थित मां वन देवी दुर्गा स्थान का महत्व सिर्फ आस्था ही नहीं, बल्कि पौराणिक कथाओं से भी जुड़ा है. मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहां मां दुर्गा की स्थापना कर पूजा-अर्चना की थी. वहीं, लोककथाओं के अनुसार महान योद्धा वीर लौरिक भी हरदी पहुंचे थे. उस समय यहां के राजा महबैर अत्याचार करते थे. प्रजा को इस आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए वीर लौरिक यहीं रुक गए और मां वन दुर्गा के परम उपासक बनकर उनकी पूजा-अर्चना की. आस्था का अद्भुत केंद्र आज मां वन देवी दुर्गा स्थान की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है. सुपौल ही नहीं, बल्कि सीमांचल और पड़ोसी राज्यों से भी श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं. श्रद्धालुओं की मान्यता और भक्ति ही इस सिद्धपीठ को विशेष बनाती है, जहां हरदी गांव की मिट्टी में देवी की शक्ति और आशीर्वाद का अहसास होता है.
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