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चार साल बाद भी बंद पड़ा है सदर अस्पताल का ऑक्सीजन प्लांट, मरीज आज भी सिलेंडर पर है निर्भर

Updated at : 05 Sep 2025 7:25 PM (IST)
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चार साल बाद भी बंद पड़ा है सदर अस्पताल का ऑक्सीजन प्लांट, मरीज आज भी सिलेंडर पर है निर्भर

विभाग को हर महीने लाखों का होता है नुकसान

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– बाहर से ही सिलेंडर खरीद कर ऑक्सीजन की हो रही आपूर्ति – विभाग को हर महीने लाखों का होता है नुकसान – 160 से अधिक बेडों तक पहुंचा है पाइपलाइन, लेकिन नहीं होती है आपूर्ति सुपौल. वैश्विक महामारी कोरोना काल ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी थी. ऑक्सीजन की किल्लत के कारण हजारों मरीज असमय मौत के मुंह में समा गए थे. इसी कड़वे अनुभव के बाद केंद्र सरकार ने पीएम केयर फंड से देश भर के जिलों के सदर अस्पतालों में अत्याधुनिक ऑक्सीजन प्लांट लगाने की पहल की थी. करोड़ों की लागत से सुपौल सदर अस्पताल में भी दो ऑक्सीजन प्लांट लगाए गए और 160 से अधिक बेड तक पाइपलाइन से आपूर्ति की व्यवस्था की गई. लेकिन विडंबना यह है कि चार साल गुजर जाने के बाद भी दोनों प्लांट अब तक चालू नहीं हो सके हैं. लाखों-करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद मरीजों को एक भी दिन इसका लाभ नहीं मिल पाया है. आज भी अस्पताल प्रबंधन को बाहर से सिलेंडर खरीदकर ही ऑक्सीजन आपूर्ति करनी पड़ रही है. मालूम हो कि 500 लीटर प्रति मिनट क्षमता वाले दो ऑक्सीजन प्लांट का निर्माण सदर अस्पताल में कराया गया है. लेकिन विगत दो साल से रख-रखाव नहीं होने के कारण प्लांट बंद पड़ा है. निजी कंपनियों से है गठजोड़ जानकारों का कहना है कि अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही और निजी कंपनियों से गठजोड़ के कारण यह व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित है. बताया जाता है कि यदि प्लांट चालू कर दिया जाए तो निजी कंपनियों से हर महीने खरीदे जाने वाले ऑक्सीजन सिलेंडरों का खर्च बच सकता है. यही कारण है कि प्लांट को जान-बूझकर ठप रखा गया है. ताकि हर महीने लाखों रुपये का बिल बनता रहे. बताया कि ऑक्सीजन के लिए यदि अस्पताल परिसर में ही स्टोर किया जाय तो लाखों की बचत सरकार को हो सकती है. विभाग को इस विषय पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है. प्रशिक्षित कर्मी नहीं हैं उपलब्ध तीन माह पहले तक एक तकनीशियन को प्लांट की देखरेख के लिए नियुक्त किया गया था. लेकिन विभाग ने उसे भी हटा दिया. ऐसे में अब स्थिति यह है कि अगर प्लांट चलाना भी चाहें, तो प्रशिक्षित कर्मी उपलब्ध नहीं हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि मशीनों को नियमित रूप से चालू रखना जरूरी है. वरना अचानक जरूरत पड़ने पर तकनीकी खराबी की आशंका बनी रहती है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते इस प्लांट का उपयोग शुरू किया गया होता तो सुपौल जिला स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में आत्मनिर्भर हो सकता था. फिलहाल यह सवाल बना हुआ है कि करोड़ों की लागत से बनी यह व्यवस्था आखिर कब धरातल पर उतरेगी और मरीजों को वास्तविक लाभ मिल पाएगा. कहते हैं सिविल सर्जन सिविल सर्जन डॉ ललन कुमार ठाकुर ने बताया कि दो ऑक्सीजन प्लांट में से एक खराब है, जिसकी मरम्मत को लेकर विभाग को लिखा गया है. जबकि दूसरा पूरी तरह सही है, लेकिन एक घंटे तक प्लांट चलाने में करीब 3200 से 3400 रुपये का खर्च आता है. मरीजों की संख्या कम होने पर यह खर्च वहन करना विभाग के लिए व्यावहारिक नहीं है. उन्होंने बताया कि वर्तमान में अस्पताल का अनुबंध मुजफ्फरपुर की निजी कंपनी एसबीजी एयर प्रोडक्ट्स से है और हर महीने 80 से 100 सिलेंडर खरीदे जाते हैं. जिन पर 50 से 55 हजार रुपये का खर्च आता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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RAJEEV KUMAR JHA

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By RAJEEV KUMAR JHA

RAJEEV KUMAR JHA is a contributor at Prabhat Khabar.

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