पीएम की चौथी जापान यात्रा

Updated at : 18 Jul 2015 11:22 AM (IST)
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पीएम की चौथी जापान यात्रा

– तोक्यो से हरिवंश – भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की यह चौथी जापान यात्रा है. प्रधानमंत्री के रूप में. फिलहाल वह तीन दिनों (24 अक्तूबर से 26 अक्तूबर) की जापान यात्रा पर हैं. वह जापान सरकार के अतिथि हैं. अपनी टीम के साथ जापान-भारत के रिश्तों को मजबूत करने के लिए यहां आये […]

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– तोक्यो से हरिवंश –

भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की यह चौथी जापान यात्रा है. प्रधानमंत्री के रूप में. फिलहाल वह तीन दिनों (24 अक्तूबर से 26 अक्तूबर) की जापान यात्रा पर हैं. वह जापान सरकार के अतिथि हैं. अपनी टीम के साथ जापान-भारत के रिश्तों को मजबूत करने के लिए यहां आये हैं.

इसके पहले डॉ सिंह दिसंबर 2006 में राजकीय यात्रा पर जापान आये थे. जुलाई 2008 में जी-आठ की बैठक में डॉ सिंह तोक्यो और होके़इदो में उपस्थित रहे. अक्तूबर 2008 में वह सरकारी यात्रा पर जापान में थे. अपनी हर यात्रा में डॉ सिंह की मुलाकात जापान के अलग-अलग प्रधानमंत्रियों से हुई.

2006 में वह जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो ऐबे से मिले. जुलाई 2008 में यासुओ फुकुदा से उनकी बातचीत हुई. अक्तूबर 2008 में तारो एसो प्रधानमंत्री थे. डॉ सिंह ने भारत-जापान रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने के लिए उनसे चर्चा की. अब चौथी यात्रा में उनकी बात जापान के मौजूद प्रधानमंत्री नाओतो कान से हो रही है.

जापान की इस राजनीतिक अस्थिरता के बारे में एक जापानी जानकार से चर्चा करता हूं. वह भारतीय मुहावरे और भाषा में समझाते हैं. एलडीपी पहले यहां कांग्रेस जैसी पार्टी थी. लंबे समय तक उसका एकछत्र राज रहा. जैसे ’60 के दशक में कांग्रेस बिखरनी शुरू हुई (1967 के आसपास), उसी तरह पिछले दशक में जापान की एलडीपी का हाल हुआ.

विरोधियों के बारे में जापानी राजनीति के जानकार मित्र कहते हैं, ये काया, स्वरूप और काम में जनता दल की तरह है. भानुमती का कुनबा. कुछ घोर चीन विरोधी, कुछ अमेरिकापरस्त. कार्यक्रम के स्तर पर विरोधियों में कोई साझा नहीं. न दृष्टि और न प्रोग्राम. सत्ता के खिलाफ पिछले एक दशक से अधिक समय से जापान की अर्थव्यवस्था में भी उतार है. ठहराव और गंभीर चुनौतियां. इस सबके बीच यह राजनीति अस्थिरता है.

पर भारत और जापान के बीच रिश्ता पुराना है.

जापानी बताते हैं कि दोनों के बीच यह रिश्ता शुरू हुआ छठी शताब्दी में, जब बौद्ध धर्म जापान आया. भारतीय संस्कृति व बौद्ध धर्म का जापानी जीवन पद्धति पर गहरा असर रहा है. इसलिए राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद जापान में भारत के प्रति अपनत्व है. लगाव है. इसलिए जापान में सरकार कोई रहे, भारत के साथ मजबूत रिश्ता बनाने में कोई दुविधा या बाधा नहीं.

यह पुष्टि भी बिना बताये, कहे या घोषणा के ही हुई. ‘जापान टाइम्स’ (अंग्रेजी अखबार, 25 अक्तूबर) ने भारतीय प्रधानमंत्री के जापान दौरे पर तीन पेज का सप्लीमेंट भी निकाला. इसमें जापान के पूर्व प्रधानमंत्री योशिरो मोरी और पूर्व प्रधानमंत्री यासुओ फुकुदा के लेख भी हैं. योशिरो मोरी का कहना है कि ‘इंडियन रैपिड इकॉनोमिक ग्रोथ बेनिफिट्स द वर्ल्ड इकॉनोमी’ (भारत के तेज आर्थिक विकास से विश्व अर्थव्यवस्था को लाभ हो रहा है). मोरी जापान-इंडिया एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं.

यह 107 वर्षों पुरानी संस्था है. फुकुदा (पूर्व प्रधानमंत्री) भारत-जापान के संबंधों में कहते हैं -‘ए स्ट्रेटेजिक एंड ग्लोबल पार्टनरशिप’ ( रणनीतिक व वैश्विक साझेदारी). फुकुदा जापान-भारत संसदीय मैत्री फोरम के अध्यक्ष हैं. दोनों ने भारत के प्रधानमंत्री को विश्व का बड़ा राजनेता और आधुनिक भारत का निर्माता भी बताया.

जापानियों को याद है कि दूसरे विश्व युद्ध के हार के बाद वे अकेले पड़ गये थे. तब कैसे भारत ने उनके साथ शांति समझौता किया. 28 अप्रैल 1952 को राजनीतिक संबंध स्थापित किये. तब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1949 में तोक्यो चिड़ियाघर को उपहार में दो हाथी भी दिये थे. यह जापानी आदर के साथ याद करते हैं.

अतीत के इस मजबूत नींव पर दोनों देश मिल कर आधुनिक संसार में अपनी जगह बनाना चाहते हैं. 25 अक्तूबर को निप्पन कीडैनरेन ने भारत के प्रधानमंत्री के सम्मान में दोपहर का भोज आयोजित किया था. यह बिजनेस मीट था. भारत-जापान बिजनेस लीडर्स फोरम के जाने-माने लोग मौजूद थे.

उसमें डॉ सिंह ने कहा कि मुझे यह कहने में खुशी है कि भारत की घरेलू बचत दर बढ़ कर 35 फीसदी हो गयी है. पिछले तीन सालों में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) 100 बिलियन डॉलर (अमेरिकी डॉलर) से अधिक हुआ है. जापान के साथ मिल कर भारत किन-किन क्षेत्रों में काम कर सकता है और करेगा, इस पर भी प्रधानमंत्री ने चर्चा की.

दुनिया के संबंधों में आ रहे बदलाव पर नजर रखनेवाले विशेषज्ञ मानते हैं कि एशिया की स्थिति बदल रही है. भारत को अपनी स्थिति मजबूत रखने के लिए जापान से मजबूत संबंध बनाना होगा.

साथ ही बदलते सामरिक परिवेश में जापान के महत्व को समझना होगा. आज भारत में जापान का निवेश 3.7 बिलियन डॉलर हो गया है. जापान के साथ आर्थिक सहयोग और व्यापार बढ़ाने के लिए भारतीय कानूनों में और सुधार की मांग होती रही है. यह प्रधानमंत्री डॉ सिंह की पहल पर ही संभव है.

चीन के उदय ने एशिया के पारंपरिक दृश्य को बदल दिया है. चीन, बड़ी ताकत के रूप में एशिया के मामलों में दखल देने लगा है. चीन के मछली मारनेवालों और जापान के तटीय सुरक्षा गार्डों के बीच सेनकाकू द्वीप पर झड़प हो चुकी है. इस तरह भारत की भूमिका, आनेवाले वर्षों में एशिया में बढ़े, यह विश्लेषक मानते हैं.

दिनांक : 26.10.2010

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