मॉरीशस यात्रा का अनुभव : बइठकों से बदले हालात

Updated at : 11 Jul 2015 12:35 PM (IST)
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मॉरीशस यात्रा का अनुभव : बइठकों से बदले हालात

– हरिवंश – राज हिरामन, मेरे मॉरीशसवासी मित्र ने बइठकों की चर्चा की. हिंदी में जिन्हें बैठका कहते हैं. कैसे बइठकों ने बदली, लोगों की जिंदगी? मॉरीशस के हालात, राजनीतिक और सामाजिक जागरूकता के सशक्त मंच बन गये बइठके.अपनी धरती से 6000 किमी दूर यह भोजपुरी शब्द सुनते ही गांव याद आये. 40 वर्ष पहले […]

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– हरिवंश –
राज हिरामन, मेरे मॉरीशसवासी मित्र ने बइठकों की चर्चा की. हिंदी में जिन्हें बैठका कहते हैं. कैसे बइठकों ने बदली, लोगों की जिंदगी? मॉरीशस के हालात, राजनीतिक और सामाजिक जागरूकता के सशक्त मंच बन गये बइठके.अपनी धरती से 6000 किमी दूर यह भोजपुरी शब्द सुनते ही गांव याद आये. 40 वर्ष पहले के दृश्य. गांवों में कौड़ा, दालान, पकड़ी या बरगद के नीचे सामूहिक बैठकें होती थीं. मंदिरों के प्रांगण में भी. इन बैठकों में सामूहिक चर्चाएं होती थीं.

गांव-घर से लेकर दुनिया जहान की बात. कलकत्ता में देखा अड्डा जमाना, महाराष्ट्र में इसका अलग रूप देखा, आंध्र प्रदेश में भी. झारखंड के गांवों में तो पहले से ही पंचायत पद्धति रही है. पंचों या अखाड़ों का महत्व है. ये कैसे मंच हैं? नाम अलग-अलग पर, भाव-भंगिमा में लगभग समान. ये सभी सार्वजनिक मंच हैं, जहां लोग साझा दुख बांटते हैं, देश-दुनिया की बातें करते हैं, मुद्दे तय करते हैं.

पानी के जहाज से भले ही मॉरीशसवासी अपनी धरती से दूर हो गये हों, पर वे बैठका को मॉरीशस ले गये. परायी धरती, नया माहौल, गोरे शासक, पर बइठका ही वो मंच था, जब वे आपस में मिलते और अपनी पीड़ा बांटते. इसका सामाजिक स्वरूप लगातार निखरा.
अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री अध्ययन कर सकते हैं कि मॉरीशस के विकास में बइठका का क्या योगदान रहा. बइठका यानी सामूहिक मंच. सबके सवालों पर परामर्श का फोरम. आधुनिक आर्थिक विकास में निजत्व पर जोर है. यह मर्म में व्यक्तिवादी है. व्यक्तिवाद से बड़े बदलाव नहीं होते, पर सामूहिक मंच सामाजिक बदलाव का सबसे कारगर मंच है. यह साबित हुआ, मॉरीशस में बइठकों के प्रयोग से.
बइठका भारत से आये लोगों के लिए शिक्षा का एक मंच भी बना. संपूर्ण विकास का मूल स्रोत. वह मंच जहां उत्सवों और पर्वों के माध्यम से धर्म, भाषा, संस्कृति आदि का प्रचार-प्रसार हुआ, हर गांव में खटनेवाले भारतीय को लगा कि शाम में मिलने-जुलने का कोई मंच होना चाहिए. अलग कमरा हो या बइठका. बइठका का अर्थ मॉरीशस में लोग बताते हैं रमयनियों (रामायण बांचनेवाले) के बैठने का स्थान. सभासदों या पंचों के बैठने की जगह या कमरा.
या वह स्थान जहां प्राय: बच्चों के लिए हिंदी कक्षाएं चलती थीं. इस बइठका का रखरखाव, निर्माण, लिपाई-पुताई आदि सार्वजनिक जलसे में होता था. इन बइठकों का महत्व मंदिर जैसा होता. दिनभर खटनेवाले भारतीय मजदूर शाम को घर लौटते, तो उन्हें बच्चों की चिंता सताती, उनका भविष्य कैसे बने, इसपर चर्चाएं होतीं. इस तरह बच्चों के लिए स्कूल शुरू हो गये. जो थोड़े पढ़े-लिखे लोग थे, वे अध्यापक बन गये, बिना तनख्वाह के. बच्चे नंगे पांव ही बइठका पहुंचते. मारकीन का कुरता और खाकी की निकर पहन कर पटसन की चटाई पर पाल्थी मार कर बैठते थे.
पूजानंद नेमा ने बइठका के उद्गम, महत्व और भूमिका पर प्रभावी अध्ययन किया है. उनके इस अध्ययन का नाम है-बैठका: भारतीय अप्रवासियों का सर्वोदय स्रोत.
पूजानंद नेमा कहते हैं, बइठका दो बजे खुल जाता था. तीन बजे विद्यार्थी जुटते, पढ़ाई छह बजे तक चलती. शनिवार को भी बइठका खुलता. शनिवार पाटी पूजन का विशेष दिन होता था. सभी बच्चे अपनी पाटी धोकर करीने से केले के पत्ते पर रखते. फिर उस पर पान-फल-मिठाई आदि चढ़ा कर पाटी की पूजा करते थे. संझा (संध्या) दी जाती थी. कभी बच्चे सरस्वती देवी को चना, चावल, चीनी आदि भी चढ़ाते थे.
दूसरे साल तक बच्चे रामायण पढ़ने लग जाते थे. साथ ही भारत का इतिहास भी पढ़ाया जाता था. इस तरह बइठका सामाजिक नवजागरण के केंद्र बन गये. बइठकाओं और मठियाओं में पढ़ाई शुरू हो गयी. 1911 में एक कन्या पाठशाला खुली. कई लोगों ने अपनी कमाई लगा कर बइठकों का निर्माण कराया. गीता, पुराण की भी पढ़ाई होती. 1950 तक मॉरीशस में बइठकाओं की संख्या 400 से अधिक हो चुकी थीं. इनमें शादी, विवाह, उत्सव होने लगे.
महिला समाज का भी गठन हुआ. बर्त्तन-हांडी की भी व्यवस्था हुई. कहीं कोई गांव में मर जाता, तो पहले से बनी सभा का छड़ीबरदार या धावन (धावक) गांव भर घूम कर सबको मरनी का हाल देता था. शादी ब्याह का न्योता भी धावन ही देता था या गांव का ठाकुर.
1939 में प्रो वासुदेव विष्णुदयाल भारत से पढ़ कर मॉरीशस लौटे, उन्होंने इन बइठकाओं को सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक आंदोलन का मंच बनाया. वे गीता के जाने-माने वक्ता थे. मॉरीशस निर्माण में इनकी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका थी.
इस तरह नवजागरण के मंच बने ये बइठका. हिंदी बइठकाओं की तरह ही तमिल, तेलुगू, मराठी और उर्दू भाषियों के यहां भी पाठशाला या मंच बने. तमिल मंदिर में ऐसी ही गतिविधियां होती थीं. मराठी भाषा में समानार्थक शब्द धर्मशाला है. इसी तरह बइठकाओं ने मॉरीशस में जागृति और उत्थान का नया अध्याय रचा.
दिनांक : 17.09.2011
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