अंग दान कर दें जिंदगी

Published at :11 Aug 2017 12:28 PM (IST)
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अंग दान कर दें जिंदगी

डॉ एके झा कॉर्डियोलॉजिस्ट, उपनिदेशक सह इमरजेंसी प्रभारी, आइजीआइसी, पटना हममें से कई लोग रक्तदान तो करते हैं, पर अन्य अंगों को दान करने में घबराते हैं. इसकी मुख्य वजह समाज में फैली मिथक जानकारी है. कहा जाता है कि डॉक्टर मरने से पहले ही अंग निकाल लेते हैं, हालांकि 1994 में पारित हुए द […]

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डॉ एके झा
कॉर्डियोलॉजिस्ट, उपनिदेशक सह इमरजेंसी प्रभारी, आइजीआइसी, पटना
हममें से कई लोग रक्तदान तो करते हैं, पर अन्य अंगों को दान करने में घबराते हैं. इसकी मुख्य वजह समाज में फैली मिथक जानकारी है. कहा जाता है कि डॉक्टर मरने से पहले ही अंग निकाल लेते हैं, हालांकि 1994 में पारित हुए द ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन आर्गन एक्ट के अनुसार जब तक डोनर के ब्रेन डेड न हो, बॉडी से अंग नहीं निकाले जा सकते हैं. किडनी और लिवर के कुछ टिश्यू जीवित अवस्था में डोनेट किये जा सकते हैं. अन्य सभी अंगों के दान के लिए रजिस्ट्रेशन पहले और स्वेच्छा से कराया जाता है.
आपकी बॉडी के कुल 11 अंगों को दान कर आप कई लोगों की जिंदगी बचा सकते हैं. इनमें किडनी, लिवर, लंग्स, हार्ट, पैनक्रियाज, आंत, आंखें, स्किन, इयर ड्रम, हार्ट वाल्व और हड्डियां शामिल हैं.
हार्ट ट्रांसप्लांटेशन
हृदय चूंकि शरीर के सभी अंगों में खून पहुंचाने के लिए जिम्मेवार होता है. इसलिए हार्ट फेल्योर की स्थिति में मरीज को हार्ट ट्रांसप्लांटेशन की जरूरत पड़ती है.
यदि हार्ट का पंपिंग रेट 20% तक या उससे कम हो जाये, कार्डियक अरेस्ट आ चुका हो, लिवर में सूजन हो, हाथ-पांव में सूजन हो अथवा हार्ट फेल्योर को रोकने की दवाई का पूरा कोर्स (कम से कम छह माह) खाने के बाद भी सीना भारी महसूस हो, सूजन हो, तो कार्डियोलॉजिस्ट की सलाह पर ही यह ट्रांसप्लांटेशन किया जा सकता है. हालांकि, भारत में अभी कुछ ही राज्यों में हार्ट के ट्रांसप्लांटेशन की सुविधा है. इनमें तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात, कर्नाटक और पुडुचेरी में यह सुविधा उपलब्ध है. हार्ट ट्रांसप्लांटेशन के मामले अन्य अंगों के ट्रांसप्लांटेशन से अधिक जटिल है. यदि ट्रांसप्लांट सफल रहता है, तो मरीज को अधिकतम 9-10 साल की अतिरिक्त जिंदगी मिल जाती है. हालांकि, 80 प्रतिशत मामलों में मरीज को दो साल से अधिक का जीवन नहीं मिल पाता है.
इसका प्रमुख कारण यह है कि हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद रोगी को नियमित दवा खानी पड़ती है, जिससे हृदय की लाइफ लाइन कम हो जाती है. यदि सफल हार्ट ट्रांसप्लांट हो जाये, तो भी मरीज को नियमित रूप से चेकअप कराते रहना चाहिए. थकान, शरीर में दर्द, सांस में तकलीफ जैसी समस्या हो, तो तुरंत चिकित्सक से मिलना चाहिए.
ट्रांसप्लांट की तैयारी
ब्रेन डेड के बाद भी हार्ट पंप करता रहता है. यदि उसे तीन से चार घंटे के बीच दूसरे मरीज को लगा दिया जाये, तो ट्रांसप्लांट सफल हो सकता है. इसके लिए काफी तैयारी करनी होती है क्याेंकि इस मामले में एक-एक सेकेंड मायने रखता है और ट्रांसप्लांट के प्रोसेस में सर्वाधिक समय ट्रैफिक में जाता है.
एक पहल जिंदगी के लिए
इसके लिए सरकार ग्रीन कॉरिडोर की योजना पर काम कर रही है, जिससे कम-से-कम समय में हार्ट को डोनर से रिसीवर तक सुरक्षित पहुंचाया जा सके. इसके अलावा हार्ट मैचिंग में भी काफी समय लगता है. भारत में औसतन 36 माह यानी तीन साल तक अपने ग्रुप का हार्ट ढ़ूढ़ने में लगता है.
ट्रांसप्लांट के लिए यह भी जरूरी है कि डोनर द्वारा पहले ही रजिस्ट्रेशन कराया गया हो या उसकी फैमिली के लोग ब्रेन डेड होने से पूर्व ही डोनेट करने के लिए सहमत हों. ताकि कागजी कार्रवाई में समय जाया न हो. साथ ही दोनों जगह पर एक कार्डियोलॉजिस्ट, एक अनुभवी कार्डियक सर्जन, एक कोऑर्डिनेटर जो दोनों मरीजों के परिवार और डॉक्टर के बीच सामंजस्य बैठा सकें.
क्या-क्या होंगे टेस्ट
ट्रांसप्लांटेशन से पहले कई तरह के डोनर और रिसीवर के टेस्ट लिये जाते हैं. इनमें सभी प्रकार के ब्लड टेस्ट, लिवर फंक्शन टेस्ट, हीमोग्लोबीन, एंजियोग्राफी, कार्डियक कैट, फेफड़े का पल्मोनोरी टेस्ट आदि किया जाता है.
हार्ट डिजीज छोटे बच्चों में कंजीनाइटल हार्ट डिजीज और बड़ों में हार्ट अटैक, कार्डियोमायोपैथी (हार्ट का चेंबर फैल जाना), डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, किडनी फेल्योर, पोस्ट वायरल (एड्स), लिवर इन्फेक्शन से हो सकता है. हाथ-पांव में सूजन, लिवर में सूजन आदि इसके प्रमुख लक्षण है. यदि हार्ट फेल्योर की छह माह तक की दवाई खाने के बाद भी दिक्कत आये और 80% हार्ट पंपिंग में दिक्कत आये, तो डॉक्टर हार्ट ट्रांसप्लांटेशन की सलाह देते हैं. इसमें करीब 15 से 20 लाख रुपये खर्च होते हैं.
प्रस्तुति : सौरभ चौबे
60 से कम उम्र के वयस्क कर सकते हैं अंग दान
डाॅ अमन गुप्ता
किडनी रोग विशेषज्ञ, फोर्टिस अस्पताल, नयी दिल्ली
यदि हृदय रोग, डायबिटीज, अनियमित रक्तचाप, अनियमित खान-पान, हेपेटाइटिस, सिस्ट व फाइब्रोसिस जैसी बीमारियों या फिर आनुवंशिक या किसी दुर्घटना के कारण यदि किसी व्यक्ति का अंग क्षतिग्रस्त हो जाये, तो उसे दूसरे व्यक्ति के अंग पर निर्भर होना पड़ता है. यह तभी संभव है, जब दूसरा व्यक्ति स्वेच्छा से मरने से पहले अपना अंग दान कर जाये.
कैसे होता है डोनर का चुनाव
अंग दान का तरीका चाहे कोई भी हो, भारतीय कानून के अनुसार इसके लिए दाता और रेसिपिएंट (ग्रहण करनेवाला) के बीच किसी भी तरह के पैसे का लेन-देन नहीं होना चाहिए. उनके बीच आपसी रिश्ता और समझ मायने रखना चाहिए.
जहां तक अंग दाता (आॅर्गन डोनर) का सवाल है, वह 18 साल से कम आयु का नहीं होना चाहिए और स्वास्थ्य के लिहाज से पूरी तरह फिट होना चाहिए. आॅर्गन प्रोक्योरमेंट और ट्रांसप्लांटेशन नेटवर्क (ओपीटीएन) के डाॅक्टर्स की टीम डोनर का चेकअप करती है. जरूरी है कि डोनर और रेसिपिएंट का ब्लड ग्रुप (ए,बी,ओ) कम से कम 50 फीसदी तक मैच करे. अगर ऐसा नहीं है तो डॉक्टर प्लाज्माफेरेसिस तकनीक से इसे कंट्रोल करते हैं.
इस समस्या से निबटने के लिए डाॅक्टर स्वैप ट्रांसप्लांट का तरीका अपनाते हैं, जिसमें ऐसी परिवार के दो सदस्यों को आॅर्गन इंटरचेंज करने के लिए राजी किया जाता है, जिनका आपस में ब्लड ग्रुप मैच न हो पाने के कारण आॅर्गन ट्रांसप्लांट नहीं हो पा रहा हो. यदि डोनर को पहले कोई गंभीर बीमारी हो और दवाई चल रही हो, तो मरीज की तबीयत और खराब हो सकती है.
भारत में क्या है स्थिति
हमारे देश में कैडवेरिक के बजाय लाइव आॅर्गन ट्रांसप्लांट का चलन ज्यादा है. अमेरिका, स्वीडन और यूरोपीय देशों में कैडवेरिक आॅर्गन ट्रांसप्लांट ज्यादा सफल है. इसके पीछे जागरूकता की कमी, इमोशनल अटैचमेंट और ट्रांसप्लांटेशन में जरूरी सुविधाओं की कमी है.
लाइव आॅर्गन डोनेशन का निर्णय खुद व्यक्ति का होता है. इसलिए ट्रांसप्लांट में दिक्कत नहीं आती. कैडवेरिक डोनेशन ट्रांसप्लांट में डोनर व्यक्ति की सहमति के बावजूद आखिरी फैसला तो परिवारवाले लेते हैं, क्योंकि डोनर लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर जिंदगी मौत से जूझ रहा होता है. आंखों में काॅर्निया और स्किन टिशूज को छोड़ कर बाॅडी के सभी आॅंर्गन डैैमेज या वेस्ट हो जाते हैं. यहां तक कि 6-8 घंटे मे डेेड डोनर के काॅर्निया जैसे टिशूज भी डेड हो जाते हैं.
इसलिए डोनेशन में समय काफी महत्व रखता है. डोनर के अंग को नियत तापमान पर प्रीजर्वेशन सोल्यूशन की मदद से प्रीजर्व किया जा सकता है. इनमें किडनी को 36 घंटे, लिवर को 24 घंटे, हार्ट को 4-6 घंटे, लंग्स को 6 घंटे, पैनक्रियाज को 24 घंटे और काॅर्निया को 24 घंटे तक सही-सलामत रखा जा सकता है.
हमारे देश में आॅर्गन प्रोक्योरमेंट और ट्रांसप्लांटेशन नेटवर्क (ओपीटीएन) बना हुआ है. आॅर्गन हार्वेस्टिंग टीम के डाॅक्टर पुलिस और ट्रैफिक पुलिस की मदद से रोड पर ग्रीन काॅरिडोर बना कर आसानी से काम कर पाते हैं.
बातचीत : रजनी अरोड़ा
आॅर्गन ट्रांसप्लांट के मिथक
हिन्दू धर्म में लोग मानते हैं कि अगर इस जन्म में हमने अपना अंग दान दे दिया, तो अगले जन्म में वह अंग उन्हें नहीं मिलेंगे. इस सोच को दूर करने के लिए समाज में अंग दान करनेवालों को सम्मान दिया जाना चाहिए.
वेंटिलेटर पर पड़े व्यक्ति के फैमिली मेंबर जब उसके आॅर्गन डोनेट करने के लिए राजी हो जाते हैं, तो डाॅक्टर उस मरीज पर ध्यान देना बंद कर देते हैं. पर ऐसा नहीं है. कोई भी डॉक्टर आखिरी क्षण तक मरीज को बचाने का प्रयास करता है.
आॅर्गन ट्रांसप्लांट से बाॅडी का शेप खराब हो जायेगा: ट्रांसप्लांटवाले आॅर्गन बाॅडी के अंदर होते हैं जैसे-किडनी, लिवर. ऊपरी बाॅडी पर हल्का-सा चीरे का निशान होता है, जो धीरे-धीरे ठीक हो जाता है. लेप्रोस्कोपी से सर्जरी में काॅस्मेटिक पक्ष का ध्यान भी रखा जाता है.
60 के उम्र में आॅर्गन डोनेट कर सकते हैं? : आमतौर पर डाॅक्टर्स 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगो को आॅर्गन डोनेट करने के लिए मना करते हैं, क्योकि इस उम्र में उनके आॅर्गन कमजोर हो चुके होते हैं.लेकिन अन्य कोई विकल्प न हो और रिस्क कम हो, तो उनके अंग ट्रांसप्लांट किये जा सकते हैं. ऐसे लोगो को मार्जिनल डोनर की श्रेणी में रखा जाता है.
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