Kumbh Mela 2021: रहस्यों से भरी है नागा साधुओं की जिंदगी, जानें आम आदमी कैसे बनता है नागा सन्यासी, क्यों कुंभ मेले में ही दिखते हैं ये, जानें सबकुछ

Haridwar Kumbh Mela 2021, Shahi Snan Dates, Naga Saints in Kumbh, History Of Naga Sadhu: निरंजनी अखाड़े ने एक लाख नागा सन्यासी बनाने का दावा किया है. अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरी ने कहा है कि हरिद्वार कुंभ 2021 के दौरान 22 से 27 अप्रैल तक एक लाख नागा सन्यासी तैयार किए होंगे. जो धर्म की रक्षा में अपना योगदान देंगे. लेकिन, क्या आपको मालूम है किन कठिनाईयों से गुजर कर एक आम इंसान नागा सन्यासी बनता है, क्यों कुंभ मेले में ये दिखते है. आइये जानते हैं सब कुछ....
Haridwar Kumbh Mela 2021, Shahi Snan Dates, Naga Saints in Kumbh, History Of Naga Sadhu: निरंजनी अखाड़े ने एक लाख नागा सन्यासी बनाने का दावा किया है. अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरी ने कहा है कि हरिद्वार कुंभ 2021 के दौरान 22 से 27 अप्रैल तक एक लाख नागा सन्यासी तैयार किए होंगे. जो धर्म की रक्षा में अपना योगदान देंगे. लेकिन, क्या आपको मालूम है किन कठिनाईयों से गुजर कर एक आम इंसान नागा सन्यासी बनता है, क्यों कुंभ मेले में ये दिखते है. आइये जानते हैं सब कुछ….
रहस्यों से भरी होती है नागा साधुओं की जिंदगी. आम इंसान ऐसी जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकता है. नागा सन्यासी बनने के लिए कई चरणों से होकर गुजरना पड़ता है. इसकी ट्रेनिंग काफी कठिन होती है और इस दौरान कई कष्टों से होकर गुजरना पड़ता है.
आपको बता दें कि कुंभ के दौरान गंगा स्नान कर अपने सारे पाप धोने और विशेष पूजा के लिए नागा साधु इकट्ठा होते है. उनके बिना कुंभ अधुरा माना जाता है. पूरे शरीर में भभूत लगाए कड़ाके की ठंड हो या गर्मी नग्न अवस्था में सिर पर जटा लिए नागा साधुओं को देखने का अनुभव कुछ अलग ही होता है.
कहा जाता है कि भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य नागालैंड, जहां नंगा पर्वत श्रेणियां फैली हैं वहीं से नागा जनजाति की शुरूआत हुई है. ‘नागा’ शब्द का अर्थ ‘पहाड़’ है. कच्छारी भाषा में इसका अर्थ ‘एक युवा बहादुर लड़ाकू व्यक्ति’ होता है. वहीं, कुछ विद्वानों की मानें तो नागा संन्यासियों के अखाड़े आदि शंकराचार्य के पहले भी हुआ करते थे. हालांकि, उसे अखाड़ा नाम से नहीं पुकारे जाते थे. ऐसे साधुओं को बेड़ा अथवा साधुओं का जत्था भी कहा जाता था. पहले साधुओं के जत्थे में पीर, तद्वीर हुआ करते थे. मान्यताओं के अनुसार मुगलकाल से अखाड़ा शब्द का चलन शुरू हुआ.
सबसे पहले इसके लिए अखाड़ा उस व्यक्ति के परिवार की जांच पड़ताल करता है जो नागा सन्यासी या साधु बनने का इच्छुक है. यदि उन्हें लगता है कि संबंधित व्यक्ति बन सकता है तब ही उन्हें अखाड़े में प्रवेश की अनुमति प्रदान की जाती है.
फिर उसके ब्रह्मचर्य की परीक्षा ली जाती है. इस परीक्षा में करीब 6 महीने से 12 साल तक का समय लग सकता है.
अब साधु को महापुरुष बनाने की प्रक्रिया शुरू की जाती है जिसके अनुसार संबंधित व्यक्ति के 5 गुरु बनाए जाते हैं. इन पांच परमेश्वरों में भगवान शिव, विष्णु शक्ति, सूर्य और गणेश शामिल होते है जिनकी उन्हें पूजा करनी होती है.
अब अखाड़े के पुरोहित उस महापुरुष को अवधूत बनाते हैं. जिसके तहत साधु को बाल कटवाने होते हैं और परिवार और समाज के लिए मृत होना पड़ता है. इसके लिए वह अपना खुद से श्राद्ध क्रम करता है जिसका पिंडदान अखाड़ा द्वारा करवाया जाता है.
नागा साधुओं को इसके बाद 24 घंटे अखाड़े के ध्वज के नीचे नग्न अवस्था में खड़ा करवाया जाता है. जहां वरिष्ठ नागा संयासी द्वारा उनके लिंग की एक विशेष नस को खींच दी जाती है. जिससे वह यौन सुख जीवन भर नहीं ले सकता और नपुंसक हो जाता है व दिगंबर बन जाता है.
दिगंबर साधु के भविष्य की सारी तपस्या गुरुमंत्र पर आधारित हो जाती है. उन्हें सुबह स्नान करने के बाद शरीर पर भस्म लगाना होता है व रुद्राक्ष भी धारण करना होता है.
यदि वे वस्त्र धारण करना चाहते हैं तो केवल गेरुआ रंग का वस्त्र ही पहन सकते हैं. अथवा वस्त्र धारण करने की भी अनुमति नहीं होती है.
भिक्षा मांग कर ही नागा साधुओं को अपनी भूख मिटानी होती है. वे दिन भर में एक समय ही भोजन करते है. अगर 7 घरों में उन्हें भिक्षा न मिली तो उन्हें भूखा ही सोना पड़ता है.
उन्हें ना तो सोने के लिए पलंग, न ही खाट मिलता है. उन्हें जमीन पर ही जीवन भर सोना पड़ता है.
नागा साधु केवल सन्यासी को ही प्रणाम करते हैं अथवा अपने गुरु को. इसके अलावा वह किसी को ना प्रणाम कर सकते हैं और ना किसी की निंदा करते हैं.
नागा साधुओं के भी कई पद होते हैं. उन्हें महंत, श्री महंत, थानापति महंग, तमातिया महंत, पीर महंत, दिगंबर श्री, महामंडलेश्वर और आचार्य मंडलेश्वर जैसे पद मिलते है.
कुंभ मेले की अवधि कम करने के साथ ही शाही स्नान की संख्या में भी कमी की गई है. पहले कुंभ मेले के दौरान 4 शाही स्नान होते थे लेकिन कोरोना काल के कारण इसे घटाया गया है. अप्रैल में होने वाले हरिद्वार कुंभ मेला 2021 में केवल 3 शाही स्नान (Shahi Snan) होंगे.
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पहला शाही स्नान: 12 अप्रैल (सोमवती अमावस्या)
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दूसरा शाही स्नान: 14 अप्रैल (बैसाखी)
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तीसरा शाही स्नान: 27 अप्रैल (पूर्णिमा के दिन)
Posted By: Sumit Kumar Verma
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