बंगाल में फिर ‘दीदी’ के करीब आया अल्पसंख्यक वोट बैंक! स्टिंग और UCC के डर ने बिगाड़ा खेल, जानें नये सियासी समीकरण

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Minority Vote Bank Mamata Banerjee Tmc West Bengal Election 2026

Minority Vote Bank West Bengal 2026: बंगाल चुनाव 2026 से पहले अल्पसंख्यक वोट बैंक में बड़ा बदलाव होता दिख रहा है. SIR में नाम हटने और UCC के वादे के बाद मुस्लिम मतदाता फिर से तृणमूल कांग्रेस के पीछे एकजुट हो रहे हैं. हुमायूं कबीर स्टिंग और ISF के कमजोर पड़ने का पूरा विश्लेषण यहां पढ़ें.

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Minority Vote Bank West Bengal 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले राज्य का सियासी पारा सातवें आसमान पर है. करीब एक महीने पहले तक ऐसा लग रहा था कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सबसे मजबूत ‘अल्पसंख्यक वोट बैंक’ में 15 साल में पहली बार बड़ी दरार पड़ने वाली है. लेकिन, पिछले तीन हफ्तों के घटनाक्रम ने पूरी तस्वीर ही बदल दी है.

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फिर ममता बनर्जी के पीछे एकजुट हुए मुस्लिम वोटर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में नाम हटने का डर, हुमायूं कबीर का स्टिंग विवाद और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के समान नागरिक संहिता (UCC) के वादे ने मुस्लिम मतदाताओं को एक बार फिर ममता बनर्जी के पीछे एकजुट कर दिया है.

बिखरता स्वतंत्र नेतृत्व और टीएमसी की मजबूती

मार्च 2026 की शुरुआत तक इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF), असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM और हुमायूं कबीर की पार्टी AJUP एक साथ मिलकर ‘स्वतंत्र मुस्लिम नेतृत्व’ की बात कर रहे थे. वक्फ कानून और मदरसा भर्ती जैसे मुद्दों पर नाराजगी के सहारे ये दल करीब 110 मुस्लिम बहुल सीटों पर टीएमसी के आधार में सेंध लगाने की तैयारी में थे. अचानक हुए बदलावों ने इस मोर्चे को कमजोर कर दिया.

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एआईएमआईएम और आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) के बीच गठबंधन उस समय टूट गया, जब हुमायूं कबीर का एक कथित स्टिंग वीडियो सामने आया. इस वीडियो में उन्हें भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ सौदेबाजी की बात करते सुना गया. हालांकि कबीर ने इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का कमाल बताया, लेकिन नुकसान हो चुका था. किसी मजबूत तीसरे विकल्प की अनुपस्थिति में मतदाताओं को अब फिर से टीएमसी ही एकमात्र सहारा नजर आ रही है.

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SIR और नागरिकता का डर

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से करीब 91 लाख नाम हटाये गये हैं, जिसने पूरे राज्य में खलबली मचा दी हैय हटाये गये नामों में करीब 34 प्रतिशत मुस्लिम हैं. मुर्शिदाबाद, मालदा और 24 परगना जैसे जिलों में इसे लेकर गहरी असुरक्षा की भावना है.

विश्लेषक मैदुल इस्लाम का कहना है कि अल्पसंख्यक मतदाता उत्साह में नहीं, बल्कि ‘डर’ की वजह से टीएमसी के पीछे खड़े हो रहे हैं. उन्हें लगता है कि अगर वोट बंटा, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को होगा.

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UCC का वादा और धार्मिक नेताओं की अपील

भाजपा के घोषणापत्र में सत्ता में आने के 6 महीने के भीतर समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने के वादे ने भी माहौल बदल दिया है. ऑल बंगाल माइनॉरिटी यूथ फेडरेशन और नाखोदा मस्जिद के इमाम का मानना है कि अब लड़ाई सड़क या बिजली की नहीं, संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक पहचान की रक्षा की है.

इमाम मौलाना मोहम्मद शफीक कासमी के अनुसार, मुस्लिम मतदाता उन छोटी पार्टियों को वोट देकर अपना वोट ‘बर्बाद’ नहीं करना चाहेंगे, जो सांप्रदायिक ताकतों से सीधे नहीं लड़ सकतीं.

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Minority Vote Bank: आंकड़ों में टीएमसी का दबदबा

वर्ष 2021 के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने उन 89 सीटों में से 87 पर जीत हासिल की थी, जहां अल्पसंख्यक मतदाता 30 प्रतिशत से अधिक थे. विश्लेषकों का कहना है कि वर्ष 2026 में भी यही कहानी दोहरायी जा सकती है, क्योंकि अल्पसंख्यक मतदाताओं को अब ममता बनर्जी के अलावा कोई दूसरा व्यावहारिक विकल्प नजर नहीं आ रहा है.

राजनीति में ‘असुरक्षा’ अक्सर सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनती है. बंगाल में इस समय ठीक यही हो रहा है. वर्ष 2026 का बंगाल चुनाव अब ‘त्रिकोणीय’ होने की बजाय एक बार फिर टीएमसी और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला बनता दिख रहा है.

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