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कोविड-19 की तीसरी लहर से पहले स्कूल खुलते हैं, तो क्या हम बच्चों को सुरक्षा देने में सक्षम हैं?

Updated at : 29 Aug 2021 5:45 PM (IST)
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कोविड-19 की तीसरी लहर से पहले स्कूल खुलते हैं, तो क्या हम बच्चों को सुरक्षा देने में सक्षम हैं?

COVID-19, Third wave, School reopen, Child safety, Corona vaccine for Child : भारत सरकार के गृह मंत्रालय, विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने आशंका जतायी है कि कोरोना वायरस की तीसरी लहर में बच्चे अधिक प्रभावित हो सकते हैं. वहीं, जुलाई से ही बच्चों में कोविड-19 के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है.

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भारत सरकार के गृह मंत्रालय, विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने आशंका जतायी है कि कोरोना वायरस की तीसरी लहर में वयस्कों की तुलना में बच्चे अधिक प्रभावित हो सकते हैं. तीसरी लहर की अटकलों के बीच जुलाई की शुरुआत से ही बच्चों में कोविड-19 के मामलों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है.

चिकित्सकों के मुताबिक, कोरोना वायरस के तेज संक्रामक डेल्टा संस्करण में वृद्धि के साथ बच्चों और किशोरों में बढ़ते मामलों ने अभिभावकों को अपने बच्चों को वैक्सीन लगाने के लिए प्रेरित किया है. बच्चों के लिए वैक्सीन देने की दिशा में राष्ट्रीय दवा नियामक ने 12 साल से अधिक आयु के बच्चों के लिए जायडस कैडिला की तीन खुराक वाली आरएनए वैक्सीन को मंजूरी दे दी है.

वहीं, भारत बायोटेक की कोवैक्सिन को भी सितंबर तक स्वीकृति मिलने की उम्मीद है. मालूम हो कि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी की निदेशक प्रिया अब्राहम ने कहा है कि सितंबर 2021 तक दो से 18 वर्ष की आयु के बच्चों को कोविड-19 वैक्सीन लगा सकते हैं. वर्तमान में बच्चों पर क्लिनिकल ट्रायल का दूसरे और तीसरे चरण का परीक्षण चल रहा है.

इससे पहले अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली के निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया ने कहा था कि बच्चों के लिए भारत बायोटेक, फाइजर और जायडस के वैक्सीन जल्द ही देश में उपलब्ध होंगे. दो साल से अधिक उम्र के बच्चों के लिए भारत बायोटेक की कोवैक्सिन का दिल्ली एम्स समेत छह अस्पतालों में परीक्षण चल रहा है. अंतरिम डेटा सकारात्मक और उत्साहजनक है. आंकड़ों के विश्लेषण के बाद बच्चों के लिए सितंबर-अक्टूबर में वैक्सीन उपलब्ध हो सकेगा.

इधर, भारत बायोटेक ने नेजल वैक्सीन के परीक्षण में बच्चों को भी शामिल किया है. इस वैक्सीन का शॉट नाक में दिया जाता है. जबकि, सीरम इंस्टीट्यूट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अदार पूनावाला ने कहा था कि बच्चों के लिए वैक्सीन अगले साल की पहली तिमाही में लॉन्च की जायेगी. इसके जनवरी-फरवरी में आने की संभावना है.

बच्चों के वैक्सीनेशन में 12 से 18 आयु वर्ग के बच्चों को प्राथमिकता दी जायेगी. हालांकि, क्लिनिकल ट्रायल के परिणामों के आधार पर 12 वर्ष की आयु से कम उम्र के बच्चों को भी वैक्सीन दी जा सकती है. मालूम हो कि देश के बच्चों को वैक्सीन देने के लिए करीब 20 करोड़ खुराक की जरूरत होगी.

केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर गठित राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआईडीएम) के तहत गठित विशेषज्ञों की एक कमेटी ने निष्कर्ष निकाला है कि कोविड-19 की तीसरी लहर अक्टूबर के आसपास चरम पर हो सकती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि ”बाल चिकित्सा सुविधाएं, जैसे- डॉक्टर, कर्मचारी, वेंटिलेटर, एंबुलेन्स आदि उपकरण कहीं नहीं हैं, जहां बड़ी संख्या में बच्चों के संक्रमित होने पर जरूरी हो सकते हैं.” इस रिपोर्ट को पीएमओ को सौंप दिया गया है.

नीति आयोग के सदस्य वीके पॉल की अध्यक्षता वाले समूह ने भी पिछले माह सरकार से सिफारिश की है कि कोविड-19 संक्रमण में वृद्धि होने पर प्रत्येक 100 पॉजिटिव मामलों में 23 को ही अस्पताल में भर्ती कराया जाये. इस बीच, केरल के राज्य स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, पिछले पांच महीनों में चार बच्चों की मौत हुई है. साथ ही 300 से अधिक मल्टी-सिस्टम इंफ्लेमेटरी सिंड्रोम-इन चिल्ड्रन देखने को मिले हैं.

केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने भी माता-पिता से बच्चों में मल्टी-सिस्टम इंफ्लेमेटरी सिंड्रोम के लक्षण दिखने पर तत्काल चिकित्सा सहायता लेने को कहा है. इसका इलाज संभव है. हालांकि, इस बीमारी को अनदेखा करने पर जटिलताएं उत्पन्न होंगी. विशेषज्ञों ने कहा है कि मल्टी-सिस्टम इंफ्लेमेटरी सिंड्रोम बच्चों में कोविड के बाद की बीमारी थी. इनमें बुखार, पेट दर्द, आंख लाल होना और मतली के लक्षण तीन-चार सप्ताह बाद सामने आये थे.

दिल्ली समेत कई राज्यों में स्कूल खुल रहे हैं या खोल दिये गये हैं. राष्ट्रीय राजधानी में खुलनेवाले स्कूलों को देखने के लिए दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा गठित विशेषज्ञ पैनल ने अपनी रिपोर्ट दिल्ली सरकार को सौंप दी है. इधर, स्कूलों को खोलने को लेकर मेदांता के अध्यक्ष डॉ एन त्रेहन ने कहा है कि ”भारत में बच्चों का वैक्सीनेशन नहीं हो रहा है. यदि पर्याप्त बच्चे बीमार पड़ जाते हैं, तो हमारे पास उनकी देखभाल के लिए अच्छी सुविधाएं नहीं हैं. हमारी जनसंख्या को देखते हुए सतर्क रहना जरूरी है.”

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