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आपकी सांसों की गंध में आपके बीमार होने के इशारे

Updated at : 13 Feb 2024 3:30 AM (IST)
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आपकी सांसों की गंध में आपके बीमार होने के इशारे

पॉलिंग की खोज के बाद से अन्य वैज्ञानिकों ने हमारी सांसों में सैकड़ों और वीओसी की खोज की है. हमने सीखा है कि इनमें से कई वीओसी में विशिष्ट गंध होती है, लेकिन कुछ में कोई गंध नहीं होती, जिसे हमारी नाक समझ सके.

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शरीर से निकलने वाली विशिष्ट गंध यह संकेत दे सकती है कि हमें क्या बीमारी है. प्राचीन काल में जब हम अस्वस्थ होते थे, तो इसी विधि से चिकित्सक बीमारियों का पता लगाते थे और हमारा इलाज करते थे. जैसे- यदि किसी व्यक्ति की सांस की हवा में मीठापन या फलों की गंध होती थी, तो चिकित्सकों का निष्कर्ष होता था कि पाचन तंत्र में शर्करा टूट नहीं रही है और उस व्यक्ति को संभवतः डायबिटीज है. विज्ञान ने तब से दिखाया है कि प्राचीन यूनानी सही थे.

1971 में नोबेल पुरस्कार विजेता रसायनज्ञ लिनुस पॉलिंग ने सांस में 250 विभिन्न गैसीय रसायनों की गिनती की थी. इन गैसीय रसायनों को वाष्पशील कार्बनिक यौगिक या वीओसी कहा जाता है. पॉलिंग की खोज के बाद से अन्य वैज्ञानिकों ने हमारी सांसों में सैकड़ों और वीओसी की खोज की है. हमने सीखा है कि इनमें से कई वीओसी में विशिष्ट गंध होती है, लेकिन कुछ में कोई गंध नहीं होती, जिसे हमारी नाक समझ सके. वैज्ञानिकों का मानना है कि वीओसी में भले ऐसी कोई गंध है, जिसे हमारी नाक पहचान सकती है या नहीं, वे यह जानकारी दे सकते हैं कि कोई कितना स्वस्थ है.

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जॉय मिलनर ने बदले गंध से पति में पार्किसंस की पहचान की थी

एक स्कॉटिश व्यक्ति के पार्किंसंस रोग की शुरुआत की पहचान उसकी पत्नी, जो एक सेवानिवृत्त नर्स (जॉय मिलनर) थी, ने किया था. जब उसे यकीन हो गया था कि 2005 में निदान होने से कई साल पहले उसकी गंध बदल गयी थी. इस खोज ने इस रोग की गंध की सटीक पहचान करने के लिए जॉय मिलनर से जुड़े शोध कार्यक्रमों की शुरूआत की. कुत्ते अपनी अधिक परिष्कृत घ्राण क्षमता के कारण मनुष्यों की तुलना में बीमारियों को सूंघ कर अधिक पहचान सकते हैं. लेकिन विश्लेषणात्मक टूल मास स्पेक्ट्रोमेट्री जैसी तकनीक वीओसी (वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड) प्रोफाइल में और भी अधिक सूक्ष्म बदलावों को पकड़ती हैं, जिन्हें आंत, त्वचा और श्वसन रोगों के साथ-साथ पार्किंसंस जैसे न्यूरोलॉजिकल रोगों से जोड़ा जा रहा है. शोधकर्ताओं का मानना है कि एक दिन कुछ बीमारियों का निदान केवल एक उपकरण में सांस लेने से हो जायेगा.

त्वचा, मूत्र और मल के गंध से भी चलता है बीमारियों का पता

गंध शरीर में वीओसी का एकमात्र स्रोत नहीं है. ये त्वचा, मूत्र और मल से भी उत्सर्जित होते हैं. त्वचा से वीओसी लाखों त्वचा ग्रंथियों द्वारा शरीर से चयापचय अपशिष्ट, साथ ही हमारी त्वचा पर रहने वाले बैक्टीरिया और अन्य रोगाणुओं द्वारा उत्पन्न अपशिष्ट को हटाने का परिणाम है. पसीना इन जीवाणुओं के चयापचय के लिए अतिरिक्त पोषक तत्वों का उत्पादन करता है जिसके परिणामस्वरूप विशेष रूप से गंधयुक्त वीओसी हो सकते हैं.

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हालांकि, पसीने से आने वाली गंध वीओसी की गंध का केवल एक अंश ही बनाती है. हमारी त्वचा और हमारी आंत के इक्रोबायोम इन रोगाणुओं के नाजुक संतुलन से बने होते हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि वे हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं, लेकिन हम अभी तक इस बारे में बहुत कुछ नहीं समझ पाये हैं कि यह रिश्ता कैसे काम करता है. आंत के विपरीत, त्वचा का अध्ययन करना अपेक्षाकृत आसान है. आप शरीर में गहराई तक गये बिना जीवित मनुष्यों से त्वचा के नमूने एकत्र कर सकते हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि त्वचा वीओसी इस बात की जानकारी दे सकते हैं कि माइक्रोबायोम के बैक्टीरिया और मानव शरीर हमारे स्वास्थ्य को बनाये रखने और हमें बीमारी से बचाने के लिए कैसे मिल कर काम करते हैं.

त्वचा से निकले वीओसी ये पुरुषों और महिलाओं में होता है फर्क

चिकित्सक जांच कर रहे हैं कि क्या त्वचा से निकला गंध उस व्यक्ति की विभिन्न विशेषताओं को प्रकट कर सकता है जिससे वह संबंधित है. त्वचा वीओसी हस्ताक्षरों के जरिये मिलने वाले संकेतों से ही संभवतः कुत्ते गंध से लोगों के बीच अंतर कर पाते हैं. हम इस शोध क्षेत्र में अपेक्षाकृत प्रारंभिक चरण में हैं, लेकिन हमने दिखाया है कि आप त्वचा से वीओसी कितने अम्लीय हैं, इसके आधार पर पुरुषों और महिलाओं में फर्क कर सकते हैं. हम इसे देखने के लिए मास स्पेक्ट्रोमेट्री का उपयोग करते हैं क्योंकि औसत मानव नाक इन वीओसी का पता लगाने के लिए पर्याप्त परिष्कृत नहीं है.

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सटीकता के साथ लगा सकते हैं उम्र का अनुमान

हम किसी व्यक्ति की त्वचा की वीओसी प्रोफाइल से कुछ वर्षों के भीतर उचित सटीकता के साथ उसकी उम्र का अनुमान भी लगा सकते हैं. यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ हमारे शरीर में ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ता जाता है. ऑक्सीडेटिव तनाव तब होता है जब आपके एंटीऑक्सीडेंट का स्तर कम होता है और हमारी कोशिकाओं और अंगों को अपरिवर्तनीय क्षति पहुंचाता है.

हमारे हालिया शोध में त्वचा वीओसी प्रोफाइल में इस ऑक्सीडेटिव क्षति के उप-उत्पाद पाये गये. ये वीओसी न केवल व्यक्तिगत गंध के लिए जिम्मेदार हैं, इनका उपयोग पौधों, कीड़ों और जानवरों द्वारा संचार चैनल के रूप में किया जाता है. पौधे परागणकों, शाकाहारी जीवों, अन्य पौधों और उनके प्राकृतिक शत्रुओं जैसे हानिकारक बैक्टीरिया और कीड़ों सहित अन्य जीवों के साथ निरंतर वीओसी संवाद में रहते हैं. इस आगे और पीछे के संवाद के लिए उपयोग किये जाने वाले वीओसी को फेरोमोन के रूप में जाना जाता है.

लव फेरोमोन किया जा रहा डिकोड

संभव है कि मनुष्य भी सही साथी को आकर्षित करने के लिए वीओसी का उत्पादन करते हैं. वैज्ञानिकों ने अभी तक त्वचा या हमारे शरीर से निकलने वाले अन्य वीओसी को पूरी तरह से डिकोड नहीं किया है. लेकिन मानव प्रेम फेरोमोन के अब तक के साक्ष्य विवादास्पद हैं. एक सिद्धांत से पता चलता है कि वे लगभग दो करोड़ तीस लाख वर्ष पहले खो गये थे, जब प्राइमेट्स ने पूर्ण रंग दृष्टि विकसित की और एक साथी चुनने के लिए अपनी बढ़ी हुई दृष्टि पर भरोसा करना शुरू कर दिया. हालांकि, चिकित्सकों का मानना है कि मानव फेरोमोन मौजूद हैं या नहीं, त्वचा वीओसी यह बता सकते हैं कि उम्र बढ़ने, पोषण और फिटनेस, प्रजनन क्षमता और यहां तक कि तनाव के स्तर जैसी चीजों के संदर्भ में हम कौन और कैसे हैं.

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Mithilesh Jha

लेखक के बारे में

By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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