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कैसे मिले बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं? झारखंड, बंगाल, मप्र समेत 5 राज्यों के PHC में 40% डॉक्टर के पद रिक्त

Updated at : 08 Mar 2022 9:57 PM (IST)
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कैसे मिले बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं? झारखंड, बंगाल, मप्र समेत 5 राज्यों के PHC में 40% डॉक्टर के पद रिक्त

Health Services: नीति आयोग (NITI Aayog) की ओर से प्रकाशित रिपोर्ट ‘हेल्दी स्टेट्स प्रोग्रेसिव इंडिया’ (Healthy States Progressive India) में जो तथ्य दिये गये हैं, उसके मुताबिक, उत्तराखंड में सबसे ज्यादा 69.6 फीसदी डॉक्टरों के पद खाली पड़े हैं.

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Health Services: स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के सरकारों के दावे बहुत हैं, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि लोगों का इलाज करने वाले डॉक्टरों का घोर अभाव है. जनस्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों के लिए जितने पद सृजित किये गये हैं, उनमें से अधिकांश रिक्त हैं. वर्ल्ड बैंक की हाल ही में एक रिपोर्ट आयी है, जिसमें बताया गया है कि झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड में जनस्वास्थ्य केंद्रों में मेडिकल ऑफिसर के 40 फीसदी से अधिक पद रिक्त हैं.

नीति आयोग की रिपोर्ट ने पेश की चिंताजनक तस्वीर

नीति आयोग (NITI Aayog) की ओर से प्रकाशित रिपोर्ट ‘हेल्दी स्टेट्स प्रोग्रेसिव इंडिया’ (Healty States Progressive India) में जो तथ्य दिये गये हैं, उसके मुताबिक, उत्तराखंड में सबसे ज्यादा 69.6 फीसदी डॉक्टरों के पद खाली पड़े हैं. छत्तीसगढ़ में 57.3 फीसदी रिक्त हैं, तो मध्यप्रदेश में 55.1 फीसदी. झारखंड में 46.3 फीसदी, पश्चिम बंगाल में 41.2 फीसदी, बिहार में 34.1 फीसदी, हिमाचल प्रदेश में 32.1 फीसदी, ओड़िशा में 31.9 फीसदी, गुजरात में 30.2 फीसदी, जम्मू-कश्मीर में 28.8 फीसदी, असम में 25.5 फीसदी, महाराष्ट्र में 22.8 फीसदी, हरियाणा में 22.4 फीसदी डॉक्टरों की बहाली होनी है.

केरल, कर्नाटक, यूपी का प्रदर्शन बेहतर

केरल, कर्नाटक एवं उत्तर प्रदेश ऐसे राज्य हैं, जहां जनस्वास्थ्य केंद्रों में 5 फीसदी से भी कम डॉक्टरों के पद रिक्त हैं. इन राज्यों में क्रमश: 2.4 फीसदी, 4.6 फीसदी और 4.8 फीसदी पद रिक्त हैं. आंध्रप्रदेश में 10.6 फीसदी, तो राजस्थान में 12.2 फीसदी, तेलंगाना में 15 फीसदी, तमिलनाडु में 15.1 फीसदी और पंजाब में 17.7 फीसदी डॉक्टरों के पद रिक्त पड़े हैं. छोटे राज्यों में मणिपुर एकमात्र प्रदेश है, जहां यह आंकड़ा 40 फीसदी से अधिक है.

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उत्तराखंड में दो साल में 5 गुणा से अधिक बढ़ी रिक्तियां

रिपोर्ट के तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि उत्तराखंड में वर्ष 2015-16 में सिर्फ 12.2 फीसदी पद रिक्त थे, जो वर्ष 2017-18 में बढ़कर 69.6 फीसदी हो गया. छत्तीसगढ़ में 45 फीसदी से 57.3 फीसदी हो गया, तो ओड़िशा में यह आंकड़ा 26.9 फीसदी से बढ़कर 31.9 फीसदी हो गया. हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2015-16 में डॉक्टरों के 21.7 फीसदी पद रिक्त थे, जो अब बढ़कर 32.1 फीसदी हो गयी है.

असम और महाराष्ट्र में लगातार बढ़ी रिक्तियां

असम और महाराष्ट्र भी ऐसे राज्य हैं, जहां रिक्तियां लगातार बढ़ीं हैं. महाराष्ट्र में आंकड़ा 17 फीसदी से बढ़कर 22.8 फीसदी हो गया है, तो असम में 17.8 से बढ़कर 25.5 पर पहुंच गया. तमिलनाडु और पंजाब भी पीछे नहीं हैं. तमिलनाडु में वर्ष 2015-16 में 7.6 फीसदी डॉक्टरों के पद रिक्त थे, जो बढ़कर 15.1 फीसदी हो गयी है. यानी रिक्तियों में लगभग 100 फीसदी का इजाफा हुआ है. वहीं, पंजाब में रिक्तियों का आंकड़ा 7.8 फीसदी से 12.7 फीसदी पहुंच गया है.

उत्तर प्रदेश, बिहार में तेज हुई डॉक्टरों की बहाली

डॉक्टरों की बहाली करने में उत्तर प्रदेश और बिहार ने सबसे ज्यादा तेजी दिखायी है. उत्तर प्रदेश में 2015-16 में 26.7 फीसदी डॉक्टरों के पद रिक्त थे, जो अब सिर्फ 4.8 फीसदी रह गयी है. इसी तरह बिहार ने 63.6 फीसदी रिक्ति को घटाकर 34.1 फीसदी पर लाने में कामयाबी हासिल की है. कुल 21 बड़े राज्यों में से 8 में रिक्तियों का आंकड़ा बढ़ा है, जबकि 13 राज्यों में घटा है.

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छोटे राज्यों का प्रदर्शन बेहतर

छोटे राज्यों की बात करें, तो नगालैंड, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़ और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह ने भी रिक्तियां घटाने के मामले में बेहतर प्रदर्शन किया है. नगालैंड में 27.4 फीसदी पद रिक्त हुआ करते थे, अब सभी पदों पर डॉक्टरों की तैनाती कर दी गयी है. त्रिपुरा, चंडीगढ़ और लक्षद्वीप ने भी डॉक्टरों की कमी को पूरा कर लिया है. इन राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के जनस्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों का एक भी पद रिक्त नहीं है.

सिक्किम में डॉक्टरों के पद नहीं हैं खाली

वर्ल्ड बैंक की इस रिपोर्ट में सिक्किम एकमात्र राज्य है, जहां वर्ष 2015-16 में भी डॉक्टर का कोई पद रिक्त नहीं था, अब भी कोई रिक्ति नहीं है. मिजोरम ने 38.1 फीसदी रिक्त पदों को घटाकर 2.4 फीसदी कर लिया है, तो गोवा में यह आंकड़ा 14.2 फीसदी से बढ़कर 20.2 फीसदी हो गया है. मणिपुर में भी रिक्तियां बढ़ी हैं. यहां पहले डॉक्टरों के 42.8 फीसदी पद खाली थे, अब 43.1 फीसदी खाली हैं. अरुणाचल प्रदेश और मेघालय ने रिक्तियां कम की हैं. अरुणाचल ने 38.8 फीसदी को घटाकर 30.2 फीसदी कर लिया है, तो मेघालय ने 35.7 फीसदी को घटाकर 30.9 फीसदी कर लिया है.

अंडमान निकोबार ने भर्ती में दिखायी तेजी

केंद्रशासित प्रदेशों में अंडमान निकोबार द्वीप ने डॉक्टरों के रिक्त पदों को 36.4 फीसदी से घटाकर 10.6 फीसदी पर लाने में कामयाबी हासिल की है, तो दादर एवं नगर हवेली में अब भी 16.7 फीसदी पद रिक्त पड़े हैं. पुडुचेरी, दिल्ली और दमन एवं दीव में भी डॉक्टरों की बहाली पर सरकार का ध्यान नहीं रहा. पुडुचेरी में रिक्तियों का ग्राफ 12.8 फीसदी से बढ़कर 16.1 फीसदी हो गया, जबकि दिल्ली में 14.2 फीसदी से बढ़कर 26.3 फीसदी और दमन एवं दीव में 7.1 फीसदी से बढ़कर 28.6 फीसदी हो गया है.

Posted By: Mithilesh Jha

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Mithilesh Jha

लेखक के बारे में

By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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