झारखंड में पहाड़ पर रहने वाले आदिम जनजातियों के लिए सड़क तक नहीं, श्रमदान कर ग्रामीणों ने बना लिया रास्ता
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 18 Jan 2022 12:45 PM
Jharkhand News: गढ़वा की पूर्व उपायुक्त डॉ नेहा अरोड़ा ने हेसातु गांव से सरुवत तक के लिए सड़क निर्माण का न सिर्फ ग्रामीणों को आश्वासन दिया था, बल्कि इसका प्रस्ताव बनाकर राज्य सरकार को भी भेजा था, लेकिन तीन साल बाद भी तस्वीर बहीं बदली.
Jharkhand News: झारखंड के गढ़वा की पूर्व उपायुक्त नेहा अरोड़ा का हेसातु से सरुवत को जोड़ने वाली सड़क के निर्माण का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चले जाने के बाद निराश हो चुके ग्रामीणों ने श्रमदान कर खुद ही सड़क की मरम्मत की है. इस दौरान उन्होंने पहले से बने छतीसगढ़ की ओर से चार किमी कच्ची सड़क का सामूहिक रूप से श्रमदान कर इसे चलने योग्य बना दिया है. आपको बता दें कि इसके पूर्व की उपायुक्त डॉ नेहा अरोड़ा ने यहां आने के बाद सरुवत तक आवागमन के लिये हेसातु गांव से सरुवत तक के लिए सड़क निर्माण का न सिर्फ ग्रामीणों को आश्वासन दिया था, बल्कि इसका प्रस्ताव बनाकर राज्य सरकार को भी भेजा था, लेकिन तीन साल बाद भी तस्वीर बहीं बदली.
आखिरकार ग्रामीणों ने श्रमदान कर छत्तीसगढ़ की ओर जाने के लिये पहले से बनायी गयी कच्ची सड़कों को ही दुरुस्त कर दिया है. उल्लेखनीय है कि वर्ष 2018 में गढ़वा की तत्कालीन उपायुक्त डॉ नेहा अरोड़ा ने पहाड़ों की चढ़ाई कर झारखंड की दूसरी सबसे ऊंची चोटी पर बसे सरुअत गांव पहुंचकर यहां के लोगों का हालचाल लिया था. इस दौरान उन्होंने अपने क्षेत्र हेसातु की ओर से यहां तक सड़क निर्माण का प्रस्ताव की बात कही थी. उस समय फिलहाल मनरेगा से इसे किर्यान्वित किये जाने का निर्देश मिला था.
ग्रामीण संजय यादव, रामनाथ यादव, रामअवध यादव, सुभाष यादव, नंदकेश्वर किसान, रामचन्द्र किसान, विफन किसान, मगरु किसान, सतन किसान, बैजनाथ किसान समेत अन्य ग्रामीण बताते हैं की निर्देश की बात सुनकर उन्हें उम्मीद भी जगी थी कि अपने प्रखंड मुख्यालय तक पहुंचने के लिये अब पहाड़ों की चढ़ाई नहीं करनी पड़ेगी, लेकिन तीन वर्ष बीतने के बाद भी इस मामले को लेकर किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं होता देख वे निराश हैं.
ग्रामीण बताते हैं कि बड़गड़ प्रखंड मुख्यालय की ओर से यहां तक पहुंचने के लिये सड़क मार्ग ही नहीं है. उन्हें बड़गड़ पहुंचने के लिये पैदल ही 3819 फीट की ऊंचाई तक पहाड़ चढ़ना उतरना पड़ता है. तब जाकर 15 किमी की दूरी तय कर प्रखंड पहुंचते हैं. ग्रामीण बताते हैं की छत्तीसगढ़ के बन्दरचुआँ की ओर से झारखंड की सीमा तक छत्तीसगढ़ सरकार ने सड़क मार्ग बनाया है, लेकिन बंदरचुवां से सरुअत तक झारखंड की सीमा होने के कारण चार किमी दूर सरुवत तक पक्की सड़क नहीं बनायी जा सकी है. वहीं अपने क्षेत्र हेसातु की ओर से सड़क निर्माण का प्रस्ताव के बारे में भी अब कोई जानकारी नहीं मिलती. ऐसे में बरसात को छोड़ अन्य दो मौसमों में छतीसगढ़ के इसी रास्ते से गांव तक माल ढोने वाले चार पहिया वाहन पहुंचते हैं. चूंकि बरसात में सरुवत जाने वाले कच्चे रास्तों पर लगातार पहाड़ का पानी रिसाव के कारण अधिक फिसलन हो जाती है. इसके कारण यहां वाहन भी नही पहुंचते हैं. बताते हैं कि फिसलन की वजह से सिर्फ पैदल ही लोग यहां से आवागमन कर पाते हैं.
समुद्र तल से 3819 फीट की ऊंचाई पर बसे गढ़वा जिले के सरुवत गांव में आज भी व्यवस्थाओं में कोई खास बदलाव नहीं हुआ. सरुवत पहाड़ी पर 100 घरों में रहने वाले करीब 800 लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं. सड़क के अलावा बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं का लाभ उन्हें नहीं मिल रहा हैं. ग्रामीणों ने बताया कि पेयजल के लिये छह चापानल लगा है, लेकिन उनकी स्थिति ठीक नहीं है. गांव के अधिकतर लोग नदियों का पानी पीते हैं. गांव में किसी की तबीयत खराब होने पर उन्हें भगवान भरोसे ही रहना पड़ता है. अपनी जीविकोपार्जन के लिये जरूरत के सामानों को लेने के लिये पहाड़ों से नीचे उतरकर बड़गड प्रखंड मुख्यालय पहुंचते हैं. यहां के आदिम जनजाति परिवारों को पीटीजी डाकिया योजना के तहत छत्तीसगढ़ के रास्ते वाहन के जरिये यहां राशन पहुंचता है. कमोबेश बरसात में वाहन के नहीं पहुंचने पर उन्हें पहाड़ से उतरकर टेहरी गांव से राशन ले जाना पड़ता है. यहां के लोगों को पेंशन मिलती है.
सात टोलों के इस गांव के लोगों के लिये बिजली का सपना अधूरा रह गया. केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी पंडित दीनदयाल विद्युतीकरण योजना के तहत बड़गड़ प्रखंड के कुल्ही, हेसातु होते हुये सरुवत टोले में भी दो वर्ष पूर्व बिजली की समुचित व्यवस्था की गयी थी. बिजली के पहुंचते ही यहां के ग्रामीणों में बिजली देखने की ललक थी, लेकिन महज दो घंटे तक बिजली जलने के बाद गांव में दोबारा बिजली नहीं जली. लोग बताते हैं कि तकनीकी खराबी के कारण ऐसा हुआ था, लेकिन तीन वर्ष गुजर जाने के बाद गांव में लगा ट्रांसफार्मर बेकार पड़ा है. इसके बावजूद यहां के लोगों को बिजली का बेसब्री से इंतजार है. ग्रामीणों ने कहा कि बड़ी उम्मीद के साथ बिजली भी पहुंची, लेकिन इसका सपना अधूरा ही रह गया. फिलहाल छोटे-छोटे सोलर के जरिये ग्रामीणों का घर रोशन होता है. इस संबंध में पूछे जाने पर बीडीओ विपिन कुमार भारती ने कहा कि सड़क निर्माण की बात थी, लेकिन इस बारे में उन्हें अधिक जानकारी नहीं है.
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रिपोर्ट: मुकेश तिवारी/संतोष वर्मा
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