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FILM REVIEW: जानें कैसी है ‘बुधिया सिंह: बॉर्न टू रन'' की कहानी

Updated at : 05 Aug 2016 3:33 PM (IST)
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FILM REVIEW: जानें कैसी है ‘बुधिया सिंह: बॉर्न टू रन'' की कहानी

II उर्मिला कोरी II फिल्म: बुधिया सिंह: बॉर्न टू रन निर्देशक: सौमेंद्र पाधी निर्माता: वायकॉम 18, कोड रेड फिल्म्स स्टार कास्ट: मनोज बाजपेयी, मयूर पटोले, तिलोत्तमा शोम, श्रुति मराठे रेटिंग: साढ़े तीन बायोपिक फिल्में इन दिनों इंडस्ट्री का नया ट्रेंड हैं. 2006 में लिम्का बुक ऑफ रिकार्डस में देश के सबसे कम उम्र के मैराथन […]

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II उर्मिला कोरी II

फिल्म: बुधिया सिंह: बॉर्न टू रन

निर्देशक: सौमेंद्र पाधी

निर्माता: वायकॉम 18, कोड रेड फिल्म्स

स्टार कास्ट: मनोज बाजपेयी, मयूर पटोले, तिलोत्तमा शोम, श्रुति मराठे

रेटिंग: साढ़े तीन

बायोपिक फिल्में इन दिनों इंडस्ट्री का नया ट्रेंड हैं. 2006 में लिम्का बुक ऑफ रिकार्डस में देश के सबसे कम उम्र के मैराथन धावक के रूप में अपना नाम दर्ज करवाने वाले उड़ीसा के बुधिया सिंह की कहानी बुधिया सिंह-बोर्न टू रन है. कहानी की अहम् धुरी कोच बिरंचि दास भी हैं. वह बिरंचि ही था जिसने बुधिया को मैराथन दौड़ने के लिए तैयार किया था.

बुधिया के बिरंचि दास से मिलने को भी कहानी के ट्रैक के साथ जोड़ा गया है. गरीबी और भुखमरी की वजह से उसकी माँ एक चूड़ीवाले को बुधिया को महज 800 रुपये में मजदूरी के लिए बेच देती है. बिरंचि चूड़ीवाले की मार और बाल मजदूरी से बुधिया को न सिर्फ बचाता है बल्कि अपने साथ ले जाकर अपनी अकादमी में उसकी प्रतिभा को पहचान कर प्रैक्टिस करवाता है.

वह बुधिया से महज 5 साल की उम्र में 48 मैराथन दौड़ने का कीर्तिमान हासिल करवाता है. बुधिया की चर्चा देश ही नहीं विदेश तक होने लगती है. बिरंचि का लक्ष्य 2016 में ओलिंपिक पद जीतने का है. जिसकी तैयारी वह बुधिया के साथ 2006 से ही शुरू कर चुका है. सबकुछ ठीक चलता है लेकिन चीज़ें तब बदलने लगती है जब राजनीति इसमें शामिल हो जाती है.

हमारे देश की राजनीति ने हमेशा प्रतिभाओं के साथ खिलवाड़ किया है. यह बात इस कहानी में भी सामने आती है. बुधिया के दौड़ने पर रोक लगा दिया जाता है और इधर बिरंचि की हत्या हो जाती है. एक प्रतिभा हमेशा के लिए गुमनामी के अँधेरे में चली जाती है. बुधिया के दौड़ पर अब भी पाबन्दी है. आखिर में लिखा आता है बुधिया को बिरंचि जैसे कोच की आज फिर से ज़रूरत है. फिल्म का अंत सोचने को मजबूर करता है.

फिल्म के निर्देशक सौमेन्द्र की जितनी तारीफ की जाए वह काम है. यह उनकी पहली फिल्म है. उन्होंने बहुत ही उम्दा तरीके से फिल्म की कहानी को परदे पर पेश किया है. सौमेंद्र ने स्क्रिप्ट और फिल्मांकन दोनों के साथ न्याय किया. उन्होंने न तो भावुकता की अति की है और न ही ड्रामा की. उनकी बात सीधे दर्शक के दिल तक पहुंचती है यही वजह है कि शुरू से आखिर तक आप फिल्म के साथ खुद का जुड़ाव महसूस करेंगे.

निर्देशक इस लिए और शाबाशी के पात्र हैं कि बुधिया की मूल कहानी पता होने के बावजूद फिल्म में एक रहस्य सा बनाए रखा है जो फिल्म को और खास बना देता है. फिल्म में उड़ीसा के रंग को भी बखूबी संजोया गया है. फिर चाहे लोकेशन हो या किरदार. अभिनय की बात करें तो मनोज बाजपेयी ने एक बार फिर अपने अभिनय प्रतिभा से दिल को छू जाते हैं. वह हर किरदार में सहज हैं. उनकी यही सहजता परदे पर आकर्षित करती है. वह ऐसे व्यक्ति के किरदार में हैं जो हार नहीं मानना चाहता है जिस वजह से कई बार वह सख्त और सनकी भी नजर आता है.

बुधिया को दौड़ के बीच पानी न देना अखरता है लेकिन फिर उसका लॉजिक भी ज़रूरी लगता है कि पानी क्यों नहीं देना चाहिए. फिल्म में बाल कलाकार मयूर पटोले भी अभिनय के मामले में दिल जीत लेते हैं. उनकी एनर्जी फिल्म में नज़र आती हैं. दूसरे कलाकारों ने भी बखूबी अपने किरदार के साथ न्याय किया है. मनोज की पत्नी के रूप में श्रुति म्हात्रे और बुधिया की मां की भूमिका में तिलोत्तमा शोम के हिस्से में भी अच्छे दृश्य आए हैं.

फिल्म के संवाद सहज रखे गए हैं. जो किरदारों और सिचुएशन को बखूबी सामने ले आते हैं. फिल्म का गीत संगीत कहानी के अनुरूप है. कुलमिलाकर बुधिया बोर्न टू रन एक अच्छी फिल्म बनी हैजो दिल को छू जाती है. यह फिल्म सभी को देखनी चाहिए.

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