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फिल्‍म रिव्‍यू : नाना के एक्‍शन और धांसू डायलॉग का तड़का...

Updated at : 27 Feb 2015 3:36 PM (IST)
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फिल्‍म रिव्‍यू : नाना के एक्‍शन और धांसू डायलॉग का तड़का...

II अनुप्रिया अनंत II फिल्‍म : अब तक छप्‍पन 2 कलाकार : नाना पाटेकर, गुल पनाग और आशुतोष राणा डायरेक्टरः एजाज गुलाब रेटिंग : 2.5 स्टार शिमित अमीन की पहली फिल्म थी ‘अब तक छप्पन और उस फिल्म से ही शिमित ने साबित कर दिया था कि उनके पास निर्देशन का जबरदस्त हुनर है और […]

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II अनुप्रिया अनंत II

फिल्‍म : अब तक छप्‍पन 2

कलाकार : नाना पाटेकर, गुल पनाग और आशुतोष राणा
डायरेक्टरः एजाज गुलाब
रेटिंग : 2.5 स्टार
शिमित अमीन की पहली फिल्म थी ‘अब तक छप्पन और उस फिल्म से ही शिमित ने साबित कर दिया था कि उनके पास निर्देशन का जबरदस्त हुनर है और शायद यही वजह थी कि अब तक छप्पन का पहला भाग दर्शकों को लुभाने में कामयाब भी रहा. फिल्म में नाना पाटेकर के तेवर, उनका जुनून वाकई किसी इनकाउंटर स्पेशलिस्ट के रूप में वास्तविक चरित्र चित्रण के रूप में प्रस्तुत किया गया था.
लेकिन इस बार फिल्म के निर्देशक ऐजाज ने थोड़ी ढिलता दिखाई है. फिल्म की कहानी में वह कसाव नहीं, जो इस फिल्म की खासियत थी. नाना पाटेकर जिन्होंने फिल्म में साधू का किरदार निभाया है , उनके सामने बड़ी चुनौतियां नहीं आतीं. साधू कमजोर व थका सा नजर आता है. हालांकि नाना बेहतरीन एक्टर हैं, और जाहिर है उन्होंने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी है. लेकिन कहानी ही कमजोर है.
सो, नाना चाह कर भी फिल्म को उस ऊंचाई पर नहीं ले जा पाते. इस फिल्म में राजनीति और राजनीति के दांव पेंच की कहानी ही प्रस्तुत की गयी है. नाना का अंदाज, उनके संवाद ही फिल्म में आकर्षित करते हैं. शेष कहानी में खास बात नहीं. गुल पनाग ने सहयोगी कलाकार के रूप में बेहतरीन काम किया है.
‘अब तक छप्पन 2’ के दूसरे भाग में साधू में वह तेवर नजर नहीं आते जो साधू कुछ सालों पहले था. ‘अब तक छप्पन 2’ में पहले भाग से कहानी के कई हिस्से लिये गये हैं तो सीक्वल के रूप में इसे सार्थक कहा जा सकता है. कहानी वही से शुरू होती है. जहां खत्म हुई थी. पहले भाग में साधू ने अपनी पत् नी को खोया. इस बार वह अपने बच्चे को खो देता है.
फिल्म में इस सोच को बखूबी दर्शाया गया है कि एक ईमानदार पुलिस अफसर भी किस तरह राजनीति के दांव पेंच से नहीं बच पाता और राजनेता अपनी चाल चलते रहते हैं. आशुतोष राणा ने अपनी अभिनय सीमा को व्यर्थ किया है. वे क्यों इस तरह के किरदार निभा रहे. वे प्रभावशाली अभिनेता हैं. लेकिन इसके बावजूद वे छोटे किरदार निभा रहे. लेकिन उनमें वे अपनी छाप छोड़ने में कामयाब नहीं हो रहे. सो, उन्हें इस बात पर गंभीरता से सोचना चाहिए.
‘अब तक छप्पन’ में जिस तरह साधू सबके होश उड़ाता है. इस बार उसे थोड़ा निहत्था व कमजोर दर्शाया गया है. शायद यही वजह है कि फिल्म पहले संस्करण की तरह प्रभाव नहीं छोड़ पाती.
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