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...और अब 2000 रुपये का नोट भी हुआ बंद! जानें क्या है इसकी असली वजह

Updated at : 19 May 2023 8:00 PM (IST)
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...और अब 2000 रुपये का नोट भी हुआ बंद! जानें क्या है इसकी असली वजह

भारतीय नोट भारत सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के निर्देश पर ही छापे जाते हैं. इनकी छपाई सिर्फ सरकारी प्रिंटिंग प्रेस (एसपीएसीआईएल) में होती है. देश में सिर्फ चार सरकारी प्रिंटिंग प्रेस हैं, जहां ये नोट छपते हैं.

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नई दिल्ली : भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 2016 में नोटबंदी के बाद बाजार के प्रचलन में लाए गए 2000 रुपये के नोट को बंद करने का ऐलान कर दिया है. हालांकि, आरबीआई ने ग्राहकों को 23 मई से 30 सितंबर तक नोट बदलने का वक्त दिया है. इस दौरान जो लोग 2000 रुपये के नोट को बैंकों में जाकर बदल लेंगे या फिर बाजार में खपा देंगे, उनका पैसा बच जाएगा. लेकिन, जो इस दौरान अपने नोट को बदल नहीं पाएंगे, उनका पैसा कूड़ा हो जाएगा. सबसे बड़ी बात यह है कि 8 नवंबर 2016 को 500 और 1000 रुपये के नोटों को प्रचलन से बाहर किए जाने के करीब सात साल बाद आरबीआई ने एक बार फिर नोटबंदी का ऐलान किया है. लेकिन, इसके पीछे क्या है असली वजह, क्या आप जानते हैं?

नोटों की छपाई महंगी

मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, नोट छापने के कागज और छपाई की लागत होने की वजह से भारत में नोटों की छपाई महंगी साबित हो रही है. खासकर, 2000 रुपये के नोट की छपाई में 10, 20, 50, 100 और 500 रुपये नोटों की छपाई के मुकाबले अधिक लागत आती है. हालांकि, 200 रुपये के नोट की छपाई 2000 रुपये के नोट से भी महंगी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2020-21 में 50 हजार रुपये के 1000 नोटों की छपाई का खर्च 920 रुपये था, जो साल 2021-22 में 23 फीसदी बढ़कर 1,130 रुपये हो गया.

2000 रुपये के नोट की छपाई में 4 रुपये खर्च

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2000 रुपये का एक नोट छापने में करीब 4 रुपये की लागत आती है. वर्ष 2018 में 2000 रुपये का एक नोट छापने में 4.18 रुपये का खर्चा आता था, जबकि 2019 में 2000 रुपये का एक नोट छापने में 3.53 रुपये खर्च होते थे. हालांकि, 2019 के बाद से भारत में 2000 रुपये के नोट की छपाई बंद है. एक दूसरी रिपोर्ट के अनुसार, 10 रुपये के 1000 के नोट छापने में 960 रुपये यानी 1 रुपये से भी कम खर्च होता है. इसके अलावा, 100 रुपये के 1000 नोट की लागत 1770, 200 रुपये के 1000 नोट के छपाई की लागत 2370, 500 रुपये के 1000 नोटों की छपाई की लागत 2290 रुपये है.

भारत में कहां छपते हैं नोट

भारतीय नोट भारत सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के निर्देश पर ही छापे जाते हैं. इनकी छपाई सिर्फ सरकारी प्रिंटिंग प्रेस (एसपीएसीआईएल) में होती है. देश में सिर्फ चार सरकारी प्रिंटिंग प्रेस हैं, जहां ये नोट छपते हैं. नोट छापने वाली प्रेस नासिक, देवास, मैसूर एवं सालबोनी में स्थित है. यहीं, नोटों की छपाई का काम होता है. इसे छापने के लिए खास तरीके की स्याही का इस्तेमाल किया जाता है. नोट छापने वाली स्याही को स्विजरलैंड की एक कंपनी बनाती है. अलग-अलग रंग की स्याही अलग-अलग काम करती है. इसका कागल भी खास तरीके से तैयार किया जाता है.

कहां से आता है कागज

भारत में नोटों की छपाई के लिए विदेशों से भी कागज मंगाए जाते हैं. भारत में नोट छापने के लिए ब्रिटेन, जापान और जर्मनी से नोट छापने वाले कागज मंगाए जाते हैं. हालांकि, भारत में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में नोट छापने वाले कागज तैयार किए जाते हैं, लेकिन उससे जरूरतों को पूरा नहीं किया जाता.

भारत में कितने हैं 2000 रुपये के नोट

मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में करीब 3 लाख 62 हजार करोड़ मूल्य के 2000 के नोट बाजार के प्रचलन में शामिल हैं. अब जबकि आरबीआई ने 2000 रुपये के नोट को बंद करने का ऐलान कर दिया है, तो कायदे से 3,62,000 करोड़ मूल्य के 2000 के नोट आगामी 30 सितंबर तक आरबीआई या देश के बैंकों के पास आ जाने चाहिए.

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क्यों बंद किए गए 2000 रुपये के नोट

मीडिया की रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि 2000 रुपये के नोट की छपाई 2019 के बाद से बंद हैं. इसके पीछे इसकी छपाई में आ रही लागत को बताया जा रहा है. वर्ष 2021 में केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने लोकसभा में यह जानकारी दी थी कि पिछले दो साल से 2000 रुपये के एक भी नोट की छपाई नहीं हुई है.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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