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Monday, March 4, 2024

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चीन में गिरते रियल सेक्टर की आग बैंकिंग तक पहुंची, मच सकता है कोहराम, आर्थिक मंदी की आहट से सहमा देश

चीन की सबसे बड़ी वेल्थ मैनेजमेंट कंपनी (Wealth Management Company) ने साफ कह दिया है कि उसके पास बिल चुकाने के लिए पैसे नहीं है. कंपनी के ऊपर 64 अरब डॉलर का बकाया है.

वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत के बढ़ते कदम के बीच चीन की हालत पतली होती जा रही है. यहां की रियल एस्‍टेट संकट (Real Estate Crisis) का असर, बैंकिंग सेक्टर पर दिखने लगा है. चीन की सबसे बड़ी वेल्थ मैनेजमेंट कंपनी (Wealth Management Company) ने साफ कह दिया है कि उसके पास बिल चुकाने के लिए पैसे नहीं है. कंपनी के ऊपर 64 अरब डॉलर का बकाया है. मगर, अब कंपनी खुद को दिवालिया बता रही है. कंपनी के इस तरह एलान करने से चीन के ऊपर एक नया संकट दिखने लगा है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, Zhongzhi Enterprise Group (ZEG) चीन की सबसे बड़ी फंड मैनेजिंग कंपनी है. उसके ऊपर 420 युआन यानी 64 अरब डॉलर की देनदारी है. जबकि, कंपनी के पास कुल 200 युआन की संपत्ति है. इस बारे में कंपनी की तरफ से कहा गया है कि उसका पैसा लंबे समय से डेट और इक्विटी में फंसा हुआ है. जबकि, कंपनी के अंदर लिक्विडीटी भी खत्‍म हो चुकी है. उसकी हालत पूरी तरह से खराब हो चुकी है.

कंपनी पर पहले से दिख रहा था दबाव

कंपनी पर वित्तिय संकट का असर, अगस्त महीने से दिखना शुरू हो गया था. कंपनी ने ऑडिट के लिए बिग फोर अकाउंटिंग फर्मों में से एक को काम पर रखा था. इसके बाद कंपनी ने रणनीतिक निवेशकों की तलाश शुरू कर दी थी. इसी बीच ट्रेस्‍ट ने कॉरपोरेट इंवेस्‍टर्स के पेमेंट में डिफॉल्‍ट किया. कंपनी करीब 87 अरब डॉलर का फंड मैनेज करती है. ये देश में निवेशकों को सबसे ज्यादा रिटर्न भी देती है. Zhongzhi Enterprise Group (ZEG) शैडो बैंकिंग से जुड़ी हुई है. अगर, ये कंपनी दिवालिया होती है तो चीन के शैडो बैंकिंग सेक्टर के ऊपर एक बड़ी परेशानी देखने को मिलेगी. इसमें ज्यादातर मिडिल और अपर-मिडिल क्लास के लोगों का निवेश है. ऐसे में अगर, देश के अन्य निवेशकों का भरोसा उठता है तो निवेशों से लोग बड़ी संख्या में पैसा निकालना शुरू कर देंगे. इससे देश की हालत और खराब होने की संभावना है. कुछ विश्लेषकों को उम्मीद है कि नियामक व्यापक नतीजों को रोकने के लिए कदम उठाएंगे. चीन में पिछले कुछ से रियल एस्‍टेट सेक्‍टर गहरे संकट में है. देश की कुल अर्थव्यवस्था में रियल स्टेट का योगदान करीब 25 प्रतिशत से ज्यादा है. ऐसे में कई एक्‍सपर्ट मानते है कि यहां से चीन में आर्थिक मंदी की शुरूआत हो सकती है.

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टेस्ला भी देगा चीन को झटका

चीन की अर्थव्यवस्था में एप्पल और टेस्ला का बड़ा योगदान है. अमेरिका-चीन के संबंध और कोविड पॉलिसी के कारण एप्पल ने भारत का रुख कर लिया. अब, टेस्ला भी भारत में निर्माण के अवसर की तलाश कर रही है. इसका असर, सीधे चीन की अर्थव्यस्था पर पड़ रहा है. एप्पल ने भारत में अपनी मैन्युफैक्चरिंग शुरू कर दी है. भारत सरकार, टेस्ला को भारत में लाने की तैयारी पूरी जोर शोर से कर रही है. ईटी के रिपोर्ट के अनुसार, पीएमओ ने सरकारी विभागों को आदेश दिया है कि वो जनवरी तक सभी जरूरी मंजूरी देने के काम को पूरा कर लें. इसी साल जून में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने अमेरिका की यात्रा की थी. इस दौरान उन्होंने टेस्ला के CEO एलन मस्क से मुलाकात हुई थी. इसके बाद से टेस्ला और भारत के बीच, कॉमर्स एंड इंडस्ट्री, हैवी इंडस्ट्री और इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मिनिस्ट्री इलेक्ट्रिक कार मेकर्स के साथ बातचीत कर ररहे हैं. भारत और टेस्ला दोनों के लिए ये डील जनवरी तक होना काफी अहम माना जा रहा है. एक तरफ इस डील से भारत की अर्थव्यवस्था काफी तेजी से आगे बढ़ेगी. वहीं, जनवरी में गणतंत्र दिवस के मौके पर अमेरिकी प्रेसीडेंट जो बाइडन चीफ गेस्ट होंगे. ऐसे में भारत की पूरी कोशिश है कि वो इस डील को जनवरी तक डन कर ले.

भारत ने खेली बड़ी पारी

भारत, अमेरिका और आईपीईएफ समूह के 12 अन्य सदस्यों ने आपूर्ति श्रृंखला में लचीलापन लाने संबंधी एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. इससे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उत्पादन केंद्रों के संभावित स्थानांतरण और आपूर्ति श्रृंखला के झटकों से होने वाले आर्थिक व्यवधानों के जोखिमों को कम करने में मदद मिलेगी. समझौते पर सैन फ्रांसिस्को में हस्ताक्षर किए गए. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क फॉर प्रॉस्पेरिटी (आईपीईएफ) की मंत्रिस्तरीय बैठक में हिस्सा लेने के लिए अभी सैन फ्रांसिस्को में हैं. इस समझौते से भारत जैसे सदस्य देशों की चीन पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी. कोविड-19 वैश्विक महामारी के प्रकोप ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को गंभीर रूप से बाधित किया, क्योंकि अधिकतर देश दवा संबंधी कच्चे माल जैसे विभिन्न उत्पादों के लिए चीन पर निर्भर हैं.

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