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सपने, संघर्ष व सफलता की कहानी

Updated at : 16 Apr 2018 4:46 PM (IST)
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सपने, संघर्ष व सफलता की कहानी

।।विजय बहादुर ।। फेसबुक से जुड़ेंटि्वट से जुड़ेंइमेल करें – vijay@prabhatkhabar.in सुदूर गांव से, आदिवासी इलाकों से, अनपढ़ ( याद रखिएगा मूर्ख नहीं) औरतों से मिलना होता है, तो मन जोश से भर जाता है. खुद से सवाल पूछता हूं कि सपने क्या होते हैं. क्या सपनों का बोझ इतना होता है कि कोई नौजवान […]

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।।विजय बहादुर ।।

फेसबुक से जुड़ें
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इमेल करें – vijay@prabhatkhabar.in

सुदूर गांव से, आदिवासी इलाकों से, अनपढ़ ( याद रखिएगा मूर्ख नहीं) औरतों से मिलना होता है, तो मन जोश से भर जाता है. खुद से सवाल पूछता हूं कि सपने क्या होते हैं. क्या सपनों का बोझ इतना होता है कि कोई नौजवान फांसी पर लटक कर अपनी जान दे दे या सपनों में इतनी ताकत होती है कि उस नौजवान को अपनी मंजिल तक पहुंचा दे. सपने और सवाल को लेकर आज गांव की दो महिलाओं की जिंदगी की कहानी रख रहा हूं. इन दोनों कहानियों में सपने हैं, चाहत है, संघर्ष है और सफलता भी है.

अब ब्लॉक लेवल पर उपस्थिति दर्ज कराने को आतुर श्यामा देवी
गिरिडीह के बेंगाबाद प्रखंड का काशीटांड़ गांव की रहने वाली श्यामा देवी. देखने में बहुत ही मामूली-सी घरेलू महिला. उपलब्धि भी एक नजर में आपको बहुत ही मामूली लगेगी, लेकिन जब आप उनकी कहानी से रुबरु होंगे, तो लगेगा कि गांव की महिला का आजीविका मिशन से जुड़ना, फिर गांव-गांव जाकर सखी मंडल की मीटिंग करना. इसके बाद आस-पास के गांवों की सखी मंडल के एकाउंट का लेखा-जोखा रखना. वर्ष 2015 में जिन लोगों ने श्यामा देवी को देखा था, वह श्यामा देवी क्या थीं. एक घरेलू महिला, जो घर में बच्चों को पालती थीं. आज श्यामा देवी क्या हैं, गांव-गांव स्कूटी से घूमती हैं. आजीविका मिशन के तहत गठित सखी मंडल का एकाउंट चेक करती हैं. एकाउंट में क्या गलती है. वह बताती हैं. आगे गलती नहीं हो, इसका गुर बताती हैं. इस काम में वह खुश भी हैं. उन्हें कोई बड़ा व्यापार नहीं खड़ा करना है.
श्यामा कहती हैं कि मैं ऋण लेकर व्यापार पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रही थी. जब मैं अपनी सखी मंडल मां दुर्गा आजीविका सखी मंडल से जुड़ी, तो मुझे बीके की जिम्मेवारी दी गयी. फिर धीरे-धीरे मेरी जिम्मेवारियां बढ़ती गयीं. काम का दायरा बढ़ता गया. मैं दो बच्चों की मां हूं, तो मेरे सामने चुनौती आ रही थी. एक बच्चे को अपने मायके भेज दी पढ़ने के लिए ताकि ज्यादा से ज्यादा समय इधर दे सकूं. ग्राम संगठन में एकाउंटेंट बनने के बाद मैं क्लस्टर लेवल में अकाउंटेंट बन गयी और दीदियों को एकाउंट का प्रशिक्षण देने वाली प्रशिक्षक भी. अब इतने दिनों बाद एक बड़ा ऋण करीब 30 हजार रुपये का लिया और उससे एक स्कूटी खरीदी, क्योंकि पैदल सभी जगह जाना संभव नहीं था.
पब्लिक ट्रांसपोर्ट से जाने में समय ज्यादा लगता था, काम कम कर पाती थी. ये सारी बातें सधे वाक्यों के साथ बता रही होती हैं. उनके चेहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा होता है. वह कहती हैं कि स्कूटी एक दिन में ही सीख गयी. अब इसी से आना-जाना करती हूं और मेरा लक्ष्य है कि अब क्लस्टर के बाद ब्लॉक लेवल पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराऊं. श्यामा के सामने सवाल रखते हैं कि सभी दीदियां तो लोन लेकर अपना व्यापार भी बढ़ा रही हैं और एक मॉडल के तौर पर खड़ी हो रही हैं, आपने कभी क्यों नहीं सोचा कि आप भी व्यापार के लिए लोन लें, अपना कोई छोटा-मोटा व्यापार करें. श्यामा कहती हैं कि नहीं, कभी सोची ही नहीं. मुझे घूम-घूम कर दीदियों को बताने-समझाने व लोन लेकर अपना जीवन संवारने के लिए प्रेरित करने में ज्यादा मन लगता है.
कौशल्या की जिद ने जीवन बनाया आसान
आजीविका मिशन की एक और दीदी की कहानी, जो ग्रीक कथा के पक्षी फीनिक्स की याद दिलाती है. खाक से उठ कर फिर से उड़ान भरने की कहानी जैसी. केनबांकी पंचायत के अंबाटोली गांव की रहने वाली कौशल्या देवी फिलहाल गांव में ही एक किराना दुकान चलाती हैं. रोजाना 500-600 रुपये की बिक्री करती हैं. पर्व-त्योहार या खास आयोजन हो, तो दो-दो हजार रुपये तक की बिक्री कर लेती हैं.
वह अपनी दुकान भी चलाती हैं और फिर दूर बाजार से जाकर सामान भी लाती हैं. यह सब खुद देखती हैं, लेकिन यह सब जो आज कर रही हैं, वह इतना आसान भी नहीं था. कौशल्या बताती हैं कि 1996 में उनकी शादी हुई. ससुराल में आयीं, तो तमाम तरह की परेशानियां सामने थीं. पारिवारिक कलह के कारण घर में अलगाव भी हुआ और सास-ससुर-ननद ने भी साथ छोड़ दिया. ऐसे में कौशल्या के सामने मुश्किलें और बड़ी थीं. कौशल्या कहती हैं कि एक दिन उनके पति फिरू सिंह ने गांव में ही रहनेवाले सहदेव सिंह से एक सौ रुपये का कर्ज लिया. सौ रुपये लेकर वे आइसक्रीम (मलाई बरफ) बेचने का काम करने लगे. सहदेव सिंह का पैसा लौटा दिये, जैसे-तैसे घर-परिवार चलने लगा.
किसी तरह जुगाड़ कर कौशल्या के पति कमाई कर पा रहे थे. घर में तो खाना बनाने के लिए बर्तन तक नहीं था. फिर कौशल्या ने खुद मोरचा संभाला. सखी मंडल से जुड़कर कर्ज लिया और भूंजा दुकान शुरू किया. दुकान चल पड़ी. फिर किराना दुकान खोल दीं. कौशल्या कहती हैं कि अब तो दुकान में 20-30 हजार का सामान भी है और हर दिन बिक्री भी ठीक-ठाक हो जाती है. इसी को धीरे-धीरे आगे बढ़ाउंगी. कौशल्या के पति भी उनके काम में हाथ बंटाते हैं. अब बिखरे हुए घर-परिवार को सहेजने की कोशिश जारी है.
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