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  • Mar 21 2015 7:29AM

103 साल का बिहार : बिहार को इतिहास बोध की जरूरत

103 साल का बिहार : बिहार को इतिहास बोध की जरूरत
डॉ शिव कुमार मिश्र
चर्चिल ने कहा था- ‘अतीत में जितनी दूर तक देख सकते हो, देखो. इससे भविष्य की राह निकलेगी.’ बिहार के स्थापना दिवस (22 मार्च) के मौके पर इस उक्ति को याद करने का मतलब अतीत से ग्रस्त होने का नहीं, बल्कि उसके गौरव से प्रेरणा लेने, उसे आवश्यक व उपयोगी मान कर प्रासंगिक बनाने और अंतत: चरितार्थ करने से है.
 
यह बात गौरव का बोध कराती है कि बिहार के इतिहास के बगैर भारत का इतिहास अधूरा है. ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहरें बिहार के र्जे-र्जे में हैं. इन धरोहरों को सहेजने, उन्हें संरक्षित करने की जरूरत है, ताकि परंपरा को प्रगति से जोड़ कर इतिहास को आगे ले जाया जा सके. विश्व के बड़े मुल्कों ने बड़े-बड़े संग्रहालयों के जरिये अपने इतिहास को संजो कर रखा है. आखिर इतिहास सिर्फ पढ़ने नहीं, बल्कि समाज को समझने और उसे बदलने का भी उपकरण है. इसी समझ के साथ 103वें स्थापना दिवस के मौके पर आज से विशेष प्रस्तुति.
 
इतिहास के जरिये हम पुरानी बातों को सिलसिलेवार तरीके से जानकारी प्राप्त करते हैं. ऐतिहासिक धरोहर हमें काल विशेष में राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था, कला-संस्कृति आदि बताते हैं. दोनों अतीत से जुड़ा है. अपने अतीत को जानना इसलिए जरूरी है कि इससे हमें गौरव बोध होता है और भविष्य गढ़ने में मदद मिलती है. गौरवशाली इतिहास हमें प्रेरणा देता है, तो कोई काल खंड गलतियां न दोहराने का सबक भी देता है. आज बिहारी समाज को भी इतिहास बोध की जरूरत है.  
 
यदि यह कहा जाता है कि बिहार के इतिहास के बिना भारत का इतिहास अधूरा है, तो इसके पीछे वाजिब तर्क और ऐतिहासिक प्रमाण हैं.  लंबे समय तक भारत की राजनीति का केंद्र बिंदु बिहार रहा है. इसी तरह बिहार पुरातन काल से सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केंद्र रहा है. महात्मा बुद्ध के काल से यदि शुरू किया जाये, तो उस समय हर्यक वंश का शासन था. बिम्बिसार इस वंश के राजा थे. उनके पुत्र अजातशत्रु ने अपने शासन का विस्तार भारत के बड़े भू-भाग पर किया.
 
इसके बाद नंद वंश का शासन रहा. अधिकतर क्षेत्र में उसका शासन रहा. फिर मौर्य वंश का शासन आया. इसके राजा चंद्रगुप्त ने अपने गुरु कौटिल्य के साथ मिल कर शासन का विस्तार किया. गुप्त वंश के शासन में समृद्धि आयी. कहने का अर्थ यह है कि एक तरह से भारत का इतिहास बिहार का ही इतिहास रहा है.
  इसी तरह उत्तर वैदिक काल में जायें, तो वैदिक साहित्य, ब्राह्मण ग्रंथ, उपनिषद्, महाकाव्य आदि की रचनाएं बिहार में ही हुई. मिथिला के राजा का दरबार काफी समय तक पूरे भारत की सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा. वहां दार्शनिक शास्त्रर्थ और ज्ञान प्राप्ति के लिए आते थे. इसके प्रमाण प्राचीन साहित्य में भरे पड़े हैं. मिथिला के जनकवंशी अंतिम राजा के समय लोकतंत्र की स्थापना हुई थी, जो दुनिया का सबसे पुरानी गणतांत्रिक शासन पद्धति थी.
 
इतिहास का ज्ञान प्राप्त करने के क्रम में यदि हम अपने गौरवशाली अतीत की ओर देखते हैं, तो पुन: उसे प्राप्त करने की इच्छा जाग्रत होती है. प्रेरणा मिलती है. इसी बात को यदि बिहार के संदर्भ में कहा जाये, तो यहां नालंदा विश्वविद्यालय और बिक्रशिला महाविहार उच्च कोटि के शिक्षण संस्थान थे. यहां देश-विदेश के विद्यार्थी धर्म, विज्ञान, दर्शन आदि की शिक्षा ग्रहण करने आते थे. इनके बारे में उपलब्ध प्रमाण बताते हैं कि हमारे पुरखों ने इनके निर्माण में कितना अथक प्रयास किया होगा. यह इतिहास का प्रेरणादायक प्रसंग है, जो हमें प्रेरणा देता है कि हमें भी ऐसे प्रयास कर आगे बढ़ना होगा.
 
इसी तरह के गौरवशाली अतीत की ओर झांकने और ऐतिहासिक धरोहरों को संजोने से बिहार के समाज को गति मिलेगी. अतीत को जानने और धरोहरों को संजोने में संग्रहालयों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. संग्रहालय का अर्थ है किसी वस्तु या वस्तुओं का संग्रह करना. संग्रह उन्हीं वस्तुओं का किया जाता है, जो महत्वपूर्ण हैं.
 
महत्वहीन वस्तुओं का संग्रह नहीं किया जाता है. ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और उन्हें सहेजने के मामले में अंगरेजों से सीखा जाना चाहिए. ब्रिटिश शासनकाल में जो भी अधिकारी भारत भेजे जाते थे, उन्हें धरोहर और इतिहास की शिक्षा दी जाती थी. आप देखेंगे कि ब्रिटिश काल में भारत में कई संग्रहालयों का निर्माण हुआ. 1915 में बिहार रिसर्च सोसाइटी की स्थापना हुई थी, जिसमें तत्कालीन लेफ्टिनेंट गर्वनर सीएस बेली और एडवर्ड गेट का बड़ा योगदान था. इतिहास और संस्कृति के क्षेत्र में अनुसंधान और उत्खनन के क्रम में जब प्राचीन वस्तुएं मिलने लगीं, तो 1917 में पटना संग्रहालय की स्थापना हुई.
 
यह काफी दुखद है कि आम लोगों खास तौर पर नयी पीढ़ी के बीच धरोहरों के प्रति जागरूकता की कमी है. बिहार में हर जगह इतिहास छुपा है. हालत यह है कि कहीं कोई प्राचीन मूर्ति मिलती है, तो लोग उसका उचित संरक्षण नहीं करते हैं. इसी तरह कई जगहों पर टीलों को लोगों ने तोड़ कर खेत बना डाला. जरूरत इस बात की है कि  ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजने की शिक्षा प्राथमिक स्तर पर ही दिये जायें.
 
लोगों को यह समझना होगा कि बिहार की सबसे बड़ी पूंजी उसकी ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहरें हैं. ये धरोहरें न केवल बिहार की ब्रांडिंग करती हैं, बल्कि इससे आर्थिक हलचल भी होता है. दुनिया के बुद्धिस्ट देशों का गुरु भारत और खास तौर पर बिहार रहा है. जिस तरह मुसलमानों के लिए तीर्थस्थल मक्का रहा है, उसी तरह बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए बोधगया और वैशाली तीर्थस्थल है. पटना संग्रहालय में बुद्ध के अस्थि अवशेष को देखने के लिए जिस तरह हर साल बड़ी संख्या में दूसरे देशों के बौद्ध धर्मावलंबी आते हैं, उससे इसकी ऐतिहासिक महत्ता का पता चलता है. बुद्ध स्मृति पार्क का भी उदाहरण सामने है, जो कुछ साल पहले तक वीरान और झाड़-जंगल से भरा था. अब यहां आवागमन बढ़ा है.
 
 इसी तरह मधुबनी पेंटिंग को जानने-समझने और खरीदारी के लिए मधुबनी जिले के जितवारपुर, रांटी, रसीदपुर आदि स्थानों पर विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं. जापान में तो बाजाप्ता मधुबनी पेंटिंग का संग्रहालय भी है. बिहार में भी इसके लिए संग्रहालय स्थापित करने की जरूरत है. सरकार ने कुछ दिन पहले मिथिला पेटिंग संस्थान की स्थापना की है. पटना कलम को संरक्षित करने के लिए भी प्रयास की जरूरत है. 
 
कुल मिला कर कहें तो बिहार के गौरवशाली इतिहास और समृद्ध सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने और उन्हें दुनिया के सामने प्रदर्शित करने के लिए बेहतर म्यूजियम की जरूरत है. 
(लेखक बिहार रिसर्च सोसाइटी में अनुसंधान सहायक हैं. उनका यह आलेख रजनीश उपाध्याय से बातचीत पर आधारित)

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