निर्वासन के दो साल: क्या Dhaka लौटकर इतिहास बदल पाएंगी Sheikh Hasina?

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दो साल बाद भी खत्म नहीं हुई हसीना की कहानी

5 अगस्त 2024 को शेख हसीना ने ढाका छोड़ा था. दो वर्ष बाद भी उनका नाम बांग्लादेश की राजनीति के केंद्र में है. अदालत की सजा, निर्वासन, संभावित वापसी और भारत की कूटनीतिक दुविधा- यह कहानी केवल एक नेता की नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में लोकतंत्र, न्याय और शक्ति-संतुलन की बदलती राजनीति की भी कहानी है.

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5 अगस्त 2024 को जब Bangladesh की प्रधानमंत्री शेख हसीना सैन्य हेलीकॉप्टर से ढाका छोड़कर India पहुंचीं, तब बहुतों ने इसे उनके राजनीतिक जीवन का अंत मान लिया था.

लेकिन इतिहास में निर्वासन अक्सर अंत नहीं होता, बल्कि राजनीति का सबसे लंबा अध्याय वहीं से शुरू होता है.

आज, 5 अगस्त 2026 को, निर्वासन के दो वर्ष पूरे हो चुके हैं.

इस बीच बांग्लादेश में चुनाव हो चुके हैं.

नई सरकार सत्ता में है. भारत-बांग्लादेश संबंध नई दिशा खोज रहे हैं.

और इसी बीच शेख हसीना ने ऐलान किया है कि वह दिसंबर 2026 तक बांग्लादेश लौटना चाहती हैं.

यहीं से दक्षिण एशिया की राजनीति का सबसे जटिल सवाल शुरू होता है- क्या यह केवल एक नेता की घर वापसी होगी, या फिर बांग्लादेश की राजनीति का नया संघर्ष?

निर्वासन के दो साल, लेकिन राजनीति से दूरी नहीं

भारत आने के बाद शेख हसीना सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह गायब नहीं हुईं.

उन्होंने लिखित बयान दिए, अंतरराष्ट्रीय मीडिया को इंटरव्यू दिए और अब पहली बार ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए सीधे दुनिया से संवाद करने जा रही हैं.

बांग्लादेश सरकार ने भारत से इस कार्यक्रम को रोकने का अनुरोध किया है. उसका आरोप है कि भारत की धरती से शेख हसीना राजनीतिक गतिविधियां चला रही हैं.

भारत ने सावधानी से जवाब दिया- यह किसी निजी संस्था का कार्यक्रम है, सरकार का नहीं.

यही जवाब बताता है कि नई दिल्ली इस पूरे मामले में कितनी सावधानी से कदम रख रही है.

भारत के सामने सबसे कठिन कूटनीतिक संतुलन

भारत शायद पहली बार ऐसी स्थिति में है जहां उसे एक साथ दो रिश्ते बचाने हैं.

एक तरफ शेख हसीना हैं, जिनके शासनकाल में भारत और बांग्लादेश के संबंध अपने सबसे अच्छे दौर में पहुंचे.

दूसरी तरफ फरवरी 2026 के चुनाव के बाद बनी नई सरकार है, जिसके साथ भी भारत दीर्घकालिक संबंध मजबूत करना चाहता है.

यही कारण है कि भारत न तो हसीना से सार्वजनिक दूरी बनाना चाहता है और न ही ढाका को यह संदेश देना चाहता है कि वह उसकी आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप कर रहा है.

भारत की रणनीति स्पष्ट दिखती है-

व्यक्ति नहीं, राज्य के साथ संबंध.

यही परिपक्व कूटनीति की पहचान भी है.

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प्रत्यार्पण का मामला इतना आसान क्यों नहीं?

बांग्लादेश लगातार भारत से शेख हसीना को वापस भेजने की मांग कर रहा है.

लेकिन यहां कानून और राजनीति एक-दूसरे से टकरा जाते हैं.

भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि जरूर है, लेकिन उसी संधि में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है-

यदि मामला राजनीतिक प्रकृति (Political Offence) का हो, तो प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है.

यहीं पूरा विवाद अटका हुआ है.

भारत आधिकारिक रूप से कहता है कि वह दस्तावेजों की जांच कर रहा है.

लेकिन रणनीतिक हलकों में व्यापक धारणा यही है कि यदि किसी नेता को निष्पक्ष सुनवाई और जीवन की सुरक्षा पर गंभीर संदेह हो, तो प्रत्यर्पण का निर्णय केवल कानूनी नहीं रह जाता, बल्कि मानवीय और राजनीतिक भी बन जाता है.

इतिहास का सबसे बड़ा व्यंग्य

राजनीति कभी-कभी ऐसे मोड़ लेती है जिन्हें इतिहास भी व्यंग्य की तरह दर्ज करता है.

जिस इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) की स्थापना स्वयं शेख हसीना ने युद्ध अपराधों की सुनवाई के लिए की थी, उसी अदालत ने आज उन्हें मौत की सजा सुनाई है.

यह केवल एक कानूनी घटना नहीं है.

यह दिखाता है कि कमजोर लोकतांत्रिक संस्थाओं में न्यायिक संस्थान भी बदलते राजनीतिक समीकरणों का हिस्सा बन सकते हैं.

कल जो संस्था सत्ता का औजार थी, आज वही सत्ता के खिलाफ खड़ी दिखाई देती है.

यही कारण है कि दुनिया भर के राजनीतिक वैज्ञानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी मानते हैं.

क्या हसीना वास्तव में लौटेंगी?

यह सबसे बड़ा प्रश्न है.

हसीना ने संकेत दिया है कि वह दिसंबर में लौटना चाहती हैं.

लेकिन उनकी वापसी केवल विमान का टिकट खरीद लेने भर का मामला नहीं है.

उन्हें अदालतों का सामना करना होगा.
सुरक्षा का संकट अलग होगा.
राजनीतिक विरोध अलग होगा.
और सबसे बड़ी चुनौती होगी...
क्या बांग्लादेश की जनता उन्हें दोबारा स्वीकार करेगी?

सबसे बड़ी चुनौती अदालत नहीं, जनता है

राजनीति में अदालतें कभी-कभी फैसला सुनाती हैं.

लेकिन अंतिम फैसला हमेशा जनता देती है.

लगभग डेढ़ दशक तक सत्ता में रहने के बाद अवामी लीग के खिलाफ व्यापक सत्ता-विरोध (Anti-incumbency) पैदा हुआ.

विपक्ष पर कार्रवाई, चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल, नागरिक स्वतंत्रताओं को लेकर आलोचना और प्रशासन के अत्यधिक केंद्रीकरण ने हसीना सरकार की लोकप्रियता को प्रभावित किया.

इसी पृष्ठभूमि में 2024 का जनआंदोलन उभरा.

इसलिए यदि हसीना वापस भी आती हैं, तो उनके सामने सबसे कठिन लड़ाई अदालत में नहीं, बल्कि जनता के मन में होगी.

निर्वासन से लौटना आसान है.

विश्वास वापस जीतना कठिन.

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नई सरकार भी आसान स्थिति में नहीं

फरवरी 2026 के चुनावों के बाद बनी सरकार के सामने भी चुनौती कम नहीं है.

यदि वह हसीना के खिलाफ बहुत कठोर कार्रवाई करती है, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय मानवाधिकार और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर सवाल उठा सकता है.

यदि वह नरमी दिखाती है, तो उसके अपने समर्थक नाराज हो सकते हैं.

यानी सरकार को कानून, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय छवि- तीनों के बीच संतुलन बनाना होगा.

यही कारण है कि अब तक उसका रुख अपेक्षाकृत संयमित दिखाई देता है.

भारत के लिए असली चिंता क्या है?

भारत की चिंता केवल शेख हसीना नहीं हैं.

भारत की चिंता है-

स्थिर बांग्लादेश.

करीब 4,000 किलोमीटर से अधिक लंबी साझा सीमा, पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी, व्यापार, ऊर्जा, सुरक्षा सहयोग, नदी जल प्रबंधन और बंगाल की खाड़ी की रणनीतिक राजनीति- इन सभी का भविष्य ढाका की स्थिरता से जुड़ा है.

भारत जानता है कि किसी एक नेता के पक्ष या विपक्ष में खुलकर खड़े होने की कीमत पूरे क्षेत्रीय संबंधों को चुकानी पड़ सकती है.

इसीलिए नई दिल्ली आज पहले की तुलना में कहीं अधिक संतुलित भाषा का इस्तेमाल कर रही है.

दक्षिण एशिया के लिए बड़ा सबक

शेख हसीना की कहानी केवल एक नेता की कहानी नहीं है.

यह दक्षिण एशियाई लोकतंत्रों की उन स्थायी चुनौतियों की कहानी भी है, जहां सत्ता परिवर्तन अक्सर संस्थागत निरंतरता के बजाय राजनीतिक प्रतिशोध का रूप ले लेता है.

जब न्याय और राजनीति की सीमाएं धुंधली होने लगती हैं, तब हर नई सरकार पुराने शासन का हिसाब चुकाने में लग जाती है.

लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब संस्थाएं सरकार बदलने के बाद भी समान रूप से विश्वसनीय बनी रहें.

निष्कर्ष

दो साल पहले शेख हसीना का भारत आना एक ऐतिहासिक घटना थी.

दो साल बाद उनकी संभावित वापसी उससे भी बड़ा राजनीतिक मोड़ साबित हो सकती है.

लेकिन दिसंबर 2026 तक पहुंचते-पहुंचते सवाल केवल यह नहीं रहेगा कि क्या शेख हसीना ढाका लौटेंगी.

असल सवाल होगा-

क्या बांग्लादेश अपने लोकतंत्र को प्रतिशोध से ऊपर उठाकर संस्थागत परिपक्वता की ओर ले जा पाएगा?

और भारत के लिए भी यही परीक्षा होगी कि वह बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बीच अपने सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसी के साथ रिश्तों को संतुलन, धैर्य और दूरदृष्टि से आगे बढ़ा सके.

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अचल प्रियदर्शी

लेखक के बारे में

By अचल प्रियदर्शी

अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.

ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  2. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  3. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)

  4. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)

  5. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)

  6. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  7. Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)

  8. उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)

  9. बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)

  10. International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

  11. Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

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