ट्रंप की बढ़ी मुश्किलें: अमेरिकी कानून के अनुसार ईरान युद्ध रोकने की डेडलाइन करीब, क्या राष्ट्रपति मानेंगे कांग्रेस की बात?

Author Govind jee
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप. क्रेडिट- एक्स /@WhiteHouse.

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Iran War Deadline: ईरान के साथ जारी सैन्य तनाव के बीच राष्ट्रपति ट्रंप की घेराबंदी शुरू हो गई है. 1973 के वॉर पावर्स कानून की डेडलाइन खत्म होने से ट्रंप प्रशासन के सामने कानूनी संकट खड़ा हो गया है. जानिए, कैसे अमेरिकी संसद की मंजूरी के बिना नौसेना की तैनाती भारी पड़ सकती है और रिपब्लिकन सांसदों का बदलता रुख क्या संकेत दे रहा है.

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Iran War Deadline: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए कानूनी मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं. दरअसल, ईरान के खिलाफ जारी सैन्य कार्रवाई को खत्म करने की समयसीमा (डेडलाइन) बहुत पास आ गई है. अगर ट्रंप इस डेडलाइन को नजरअंदाज करते हैं, तो उन पर अमेरिकी कानून के उल्लंघन का आरोप लग सकता है.

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क्या है 60 दिनों वाला ‘वॉर पावर्स रिजोल्यूशन’ कानून?

अमेरिका में 1973 में ‘वॉर पावर्स रिजोल्यूशन’ नाम का एक कानून बना था. उस समय के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इसका विरोध किया था, लेकिन फिर भी इसे लागू किया गया. इस कानून का मकसद राष्ट्रपति की मनमानी को रोकना है ताकि वे बिना संसद (कांग्रेस) की मर्जी के युद्ध न लड़ सकें.

नियम के मुताबिक, राष्ट्रपति को किसी भी युद्ध की शुरुआत के 48 घंटे के भीतर कांग्रेस को पूरी रिपोर्ट देनी होती है. इसके बाद उनके पास सिर्फ 60 दिनों का समय होता है. इस दौरान या तो कांग्रेस युद्ध को मंजूरी दे या राष्ट्रपति को अपनी फौज वापस बुलानी पड़ती है.

1 मई को खत्म हो रही है समयसीमा

ट्रंप ने 2 मार्च को इस मामले में अपनी रिपोर्ट कांग्रेस को दी थी. उस हिसाब से 60 दिनों की यह कानूनी मियाद 1 मई को खत्म हो रही है. फिलहाल दोनों देशों के बीच युद्धविराम है, लेकिन ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी के लिए अमेरिकी नौसेना वहां तैनात है. कानून के जानकारों का कहना है कि यह नियम उन नौसैनिकों और जहाजों पर भी लागू होगा. अब तक अमेरिकी कांग्रेस ने इस युद्ध को अपनी मंजूरी नहीं दी है.

अपनी ही पार्टी के सांसदों का विरोध

रॉयटर्स-इप्सोस के एक नए सर्वे के मुताबिक, सिर्फ 34% अमेरिकी लोग ही इस युद्ध के पक्ष में हैं. जनता के इस मूड को देखते हुए ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के सांसद भी अब असहज महसूस कर रहे हैं. यूटा से रिपब्लिकन सीनेटर जॉन कर्टिस ने साफ कहा है कि अगर 60 दिनों के अंदर संसद की मंजूरी नहीं मिली, तो वे इस युद्ध का साथ नहीं देंगे. ट्रंप के पास सिर्फ एक रास्ता है कि संसद इस समयसीमा को 30 दिन के लिए और बढ़ा दे, लेकिन इसके लिए वोटिंग करानी होगी.

क्या ट्रंप कानून को मानेंगे?

ऐसी चर्चा है कि ट्रंप सेना वापस बुलाने के आदेश को इग्नोर कर सकते हैं. वे इस कानून को ही असंवैधानिक बताकर अदालत जा सकते हैं. पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी 2011 में लीबिया के वक्त ऐसा ही तर्क दिया था कि उनकी सेना सीधे युद्ध में शामिल नहीं है, इसलिए यह कानून लागू नहीं होता. हालांकि, इस बार स्थिति अलग है क्योंकि 6 महीने बाद वहां चुनाव होने हैं और ट्रंप के पास संसद में बहुमत बहुत कम है.

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पहली बार कानून का दिख सकता है असर

पिछले 50 सालों में कई राष्ट्रपतियों ने इस कानून की अनदेखी की है, लेकिन इस बार मामला गंभीर है. अगर 1 मई तक अमेरिकी सेना वहां तैनात रहती है, तो यह कानून पहली बार असल में प्रभावी साबित हो सकता है. डेमोक्रेट्स इस मामले को लेकर कोर्ट जाने की तैयारी में हैं. ट्रंप ने अपनी रिपोर्ट में खुद को ‘कमांडर-इन-चीफ’ बताते हुए कार्रवाई को सही ठहराया है, लेकिन कानूनी तौर पर बिना संसद की अनुमति के वे लंबे समय तक युद्ध जारी नहीं रख सकते.

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