Bangladesh Violence: बांग्लादेश हिंसा से मालामाल हुआ मोहम्मद सुमन, ये काम कर हजारों की कमाई की

Bangladesh Violence
Bangladesh Violence: बांग्लादेश में छात्रों के प्रदर्शन ने शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंका. हसीना के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद भी हिंसा नहीं रुकी और करीब 600 से अधिक लोगों की मौत हो गई.
Bangladesh Violence: बांग्लादेश हिंसा ने पड़ोसी देश को पूरी तरह से तोड़ दिया. आर्थिक रूप से बांग्लादेश को भारी नुकसान उठाना पड़ा. हिंसा से भले ही बांग्लादेश तबाह हो गया, लेकिन एक ऐसा भी शख्स है, जिसके लिए हिंसा और प्रदर्शन ‘आपदा में अवसर’ साबित हुआ. जब बांग्लादेश जल रहा था, तो मोहम्मद सुमन हजारों की कमाई करने में लगा था. आप सोच रहे होंगे कि आखिर शख्स ने किस तरह से कमाई की. ये जानने के लिए आपको खबर के अगले हिस्से में पहुंचना होगा.
ध्वज और हैडबैंड बेचकर शख्स ने कमाई की
1989 में ढाका में जन्मा मोहम्मद सुमन रोजी-रोटी के लिए तीन अलग-अलग आकार के बांग्लादेशी झंडे और हैडबैंड बेचता है। उसके मुताबिक, देश में एक महीने से अधिक समय तक हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान उसने ‘जबरदस्त कमाई’ की. सरकार विरोधी हिंसक प्रदर्शनों के बीच ढाका में राष्ट्रीय ध्वज और ‘हैडबैंड’ बेचने वाला मोहम्मद सुमन बांग्लादेश के असाधारण घटनाक्रम का पल-पल का गवाह रहा, लेकिन उसकी खुद की जिंदगी बेहद साधारण है. मोहम्मद सुमन का नाम सामाजिक सद्भाव की कहानी बयां करता है, जिसकी इस हिंसाग्रस्त देश में इस समय सबसे ज्यादा जरूरत है.
बांग्लादेश में विरोध-प्रदर्शनों का प्रतीक बनकर उभरा सुमन का ध्वज और हैडबैंड
बांग्लादेश के राष्ट्रीय ध्वज से प्रेरित हरा हैडबैंड बेचने वाला सुमन कहता है कि उसके इस उत्पाद की मांग सबसे ज्यादा है, खासकर छात्रों के बीच. यह हैडबैंड बांग्लादेश में विरोध-प्रदर्शनों का प्रतीक बनकर उभरा है. काम से समय निकालकर थोड़ा आराम करते सुमन (35) ने अपने जीवन की कहानी साझा की और बताया कि कैसे उसे ‘सुमन’ नाम मिला, जो हिंदू समुदाय में रखा जाने वाला एक आम नाम है.
प्रदर्शन के दौरान सुमन ने 1500 झंडे और 500 हैडबैंड बेच डाले
सुमन के मुताबिक, उसने पांच अगस्त को ‘रिकॉर्ड बिक्री’ की थी, क्योंकि प्रदर्शनकारी हैडबैंड पहनकर और झंडे लहराकर प्रदर्शन करना चाहते थे. सोशल मीडिया पर प्रसारित तस्वीरों और वीडियो में इसकी झलक भी देखी जा सकती है. सुमन स्वीकार करता है कि उसने दोनों उत्पाद मूल कीमत से तीन गुना से ज्यादा दाम पर बेचे, क्योंकि उस दिन मांग बढ़ गई थी. उसने दावा किया, पांच अगस्त को हर आकार के झंडों की मांग थी. मैं तीन आकार के झंडे बेचता हूं. उस दिन सारे झंडे बिक गए. मैं सुबह आया और बेहद कम समय में लगभग 1500 झंडे और 500 हैडबैंड बेच डाले. सुमन 2018 से रोजी-रोटी के लिए झंडे बेच रहा है. ढाका में क्रिकेट मैच के दौरान भी उसकी अच्छी बिक्री होती है.
धर्म से मुस्लिम, हिंदु महिला ने नाम रखा, मोहम्मद सुमन नाम के पीछे की कहानी
सुमन ने बताया, मेरा जन्म ढाका के एक मुस्लिम परिवार में हुआ था. मेरे नाम की वजह से कई लोगों को लगता है कि मेरे माता-पिता अलग-अलग धर्म के थे, लेकिन ऐसा नहीं है. जब मेरी मां गर्भवती थी, तब हमारे पड़ोस में रहने वाली अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय की एक महिला ने उससे कहा था कि वह जन्म के बाद बच्चे का नाम रखेगी. और जब मेरा जन्म हुआ, तो उसने मुझे सुमन नाम दिया. पुराने ढाका के अलु बाजार इलाके में रहने वाला सुमन बताता है कि भारतीय मूल का उसका पिता 1971 के आसपास कलकत्ता (अब कोलकाता) से ढाका आ गया था और यहीं पर घर बसा लिया था.
झंडे बनाने वाली फैक्टरी में सुमन ने किया काम
झंडे बेचने से पहले सुमन झंडे बनाने वाली एक फैक्टरी में काम करता था. हिंदी और बांग्ला भाषा जानने वाले सुमन ने एक सरकारी स्कूल से कक्षा आठ तक की पढ़ाई की और फिर परिवार के पालन-पोषण के लिए काम करने लगा. वह बताता है, मैंने पहले बिजलीकर्मी के रूप में काम किया, लेकिन आय बहुत कम थी, इसलिए झंडा बनाने वाली फैक्टरी में नौकरी शुरू कर दी.
बांग्लादेश हिंसा ने 600 से अधिक लोगों की जान ली
सरकारी नौकरियों में विवादास्पद कोटा प्रणाली के खिलाफ जुलाई के मध्य में बांग्लादेश में भड़के विरोध-प्रदर्शन में 600 से अधिक लोग मारे गए थे. विरोध-प्रदर्शनों के बीच पांच अगस्त को शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बड़े पैमाने पर हिंदू समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया था. पांच अगस्त को शेख हसीना के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने और बांग्लादेश छोड़कर भारत चले जाने के बाद देश में सरकार विरोधी प्रदर्शन थम गए थे.
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By अरबिंद कुमार मिश्रा
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करियर का सफरनामा
अरबिंद ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत देश की प्रतिष्ठित बहुभाषी न्यूज एजेंसी 'हिंदुस्थान समाचार' से बतौर रिपोर्टर की थी. इसके बाद उन्होंने प्रसार भारती के अंग दूरदर्शन और आकाशवाणी के साथ भी काम किया, जहां उन्होंने एंकरिंग, वॉइस-ओवर और रिपोर्टिंग के गुर सीखे. साल 2011 में वह 'प्रभात खबर डॉट कॉम' से जुड़े और तब से लगातार डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.
प्रमुख उपलब्धियां और ग्राउंड रिपोर्टिंग
खेल पत्रकारिता और जमीनी रिपोर्टिंग में अरबिंद का योगदान उल्लेखनीय रहा है. उनकी कुछ सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल हैं:
34वें राष्ट्रीय खेल: झारखंड में आयोजित ऐतिहासिक 34वें नेशनल गेम्स की बेहतरीन और व्यापक ग्राउंड रिपोर्टिंग.
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट: रांची के जेएससीए (JSCA) स्टेडियम में आयोजित कई इंटरनेशनल क्रिकेट मैचों को करीब से कवर किया.
पुरुष हॉकी वर्ल्ड कप (2018): भुवनेश्वर में आयोजित वर्ल्ड कप के फाइनल मुकाबले की शानदार स्पोर्ट्स रिपोर्टिंग.
पंचायतनामा: प्रभात खबर के इस खास विंग के लिए ग्रामीण इलाकों का दौरा कर कई प्रेरक 'सक्सेस स्टोरीज' लिखीं.
शैक्षणिक योग्यता (Education & Credentials)
UGC NET: साल 2019 में यूजीसी नेट (UGC NET) की परीक्षा उत्तीर्ण की.
बैचलर ऑफ जर्नलिज्म (BJMC): रांची विश्वविद्यालय से साल 2011 में पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री हासिल की.
एम.ए. (नागपुरी भाषा): रांची विश्वविद्यालय के 'जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग' से साल 2009 में नागपुरी भाषा में स्नातकोत्तर (MA) की डिग्री हासिल की.
लेखन शैली और विशेषज्ञता: एक्सप्लेनर, रिसर्च बेस्ड स्टोरीज, स्पोर्ट्स जर्नलिज्म, इंटरनेशनल अफेयर्स और झारखंड की लोक-संस्कृति.
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