Pakistan में सोशल मीडिया की क्रांति, लेकिन Gen Z की बगावत क्यों नहीं?

Updated:
विज्ञापन

सोशल मीडिया से सड़क तक... पाकिस्तान की कहानी अधूरी क्यों?

इमरान खान के समर्थन में डिजिटल अभियान तो चला, लेकिन पाकिस्तान का युवा अब तक किसी स्वतंत्र जनआंदोलन में क्यों नहीं बदल पाया? क्या इसकी वजह राजनीति, सेना या बिखरे हुए सामाजिक मुद्दे हैं?

विज्ञापन

भारत में हाल के वर्षों में युवाओं की राजनीति सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक एक नई दिशा लेती दिखाई दी है.

कभी भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी, कभी बेरोजगारी, तो कभी व्यवस्था के खिलाफ नाराजगी- Gen Z ने अपनी आवाज डिजिटल दुनिया से निकालकर सड़कों तक पहुंचाई.

श्रीलंका में राष्ट्रपति भवन पर कब्जा , बांग्लादेश में आरक्षण विरोधी आंदोलन और नेपाल में social media आधारित जनदबाव ने यह साबित किया कि आज की पीढ़ी केवल वोटर नहीं, बल्कि राजनीतिक बदलाव की ताकत भी बन चुकी है.

ऐसे समय में एक सवाल बार-बार उठता है- क्या पाकिस्तान में भी ऐसा कोई Gen Z आंदोलन देखने को मिलेगा? सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के युवाओं की सक्रियता बढ़ी है. कई मौकों पर उन्होंने भारत के युवा आंदोलनों पर प्रतिक्रिया भी दी है. लेकिन क्या डिजिटल समर्थन कभी वास्तविक जनआंदोलन का रूप ले पाएगा?

हाल ही में ARPA फाउंडेशन की रिसर्च फेलो और Afghanistan-Pakistan मामलों की विशेषज्ञ डॉ. अंगना कोटोके ने इसी विषय पर विस्तार से अपनी राय रखी.

डिजिटल राजनीति है, लेकिन युवा आंदोलन नहीं

डॉ. कोटोके के अनुसार, पाकिस्तान में पिछले कुछ वर्षों में social media ने राजनीति की दिशा बदल दी है. विशेषकर पूर्व प्रधानमंत्री Imran Khan और उनकी पार्टी PTI ने YouTube, WhatsApp, TikTok और X जैसे प्लेटफॉर्म का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया.

इमरान खान की गिरफ्तारी और PTI पर कार्रवाई ने युवाओं को ऑनलाइन सक्रिय किया. इंटरनेट पर वीडियो, पोस्ट, लाइव स्ट्रीम और डिजिटल कैंपेन के जरिए सरकार की आलोचना हुई. लेकिन यह पूरा आंदोलन किसी स्वतंत्र युवा एजेंडे के बजाय इमरान खान के समर्थन के इर्द-गिर्द घूमता रहा.

यानी पाकिस्तान में डिजिटल मोबिलाइजेशन तो हुआ, लेकिन Gen Z Uprising नहीं.

भारत और पाकिस्तान का सबसे बड़ा अंतर

भारत में हाल के वर्षों में कई छात्र और युवा आंदोलन किसी एक नेता के समर्थन में नहीं, बल्कि employment, exam-process, education, corruption और democratic responsibility जैसे मुद्दों पर खड़े हुए.

Sri Lanka में आर्थिक संकट जनता को एक मंच पर ले आया.

Bangladesh में नौकरी आरक्षण विवाद पूरे देश का मुद्दा बन गया.

Nepal में भ्रष्टाचार और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सवालों ने युवाओं को जोड़ा.

लेकिन Pakistan में ऐसा कोई साझा राष्ट्रीय मुद्दा अभी तक नहीं बन पाया है जो पूरे देश के युवाओं को एक साथ खड़ा कर सके.

शिकायतें बहुत हैं, लेकिन एकजुटता नहीं

पाकिस्तान में बेरोजगारी है.

महंगाई लगातार बढ़ रही है.

आर्थिक संकट गहरा रहा है.

राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है.

युवाओं में भविष्य को लेकर निराशा भी है.

फिर भी ये सभी असंतोष अलग-अलग क्षेत्रों, जातीय समूहों और राजनीतिक पहचान में बंटे हुए हैं. बलूचिस्तान की समस्याएं अलग हैं, खैबर पख्तूनख्वा की अलग और पंजाब की अलग.

यही विखंडन किसी राष्ट्रीय युवा आंदोलन को जन्म नहीं लेने देता.

Political map of Pakistan.png

पाकिस्तान में राजनीति अब भी व्यक्तियों के इर्द-गिर्द

डॉ. कोटोके का कहना है कि पाकिस्तान की राजनीति आज भी मुद्दों से अधिक व्यक्तित्वों पर आधारित है.

युवा बड़ी संख्या में इमरान खान के समर्थन में सक्रिय हुए, लेकिन उन्होंने बेरोजगारी, शिक्षा सुधार, लोकतांत्रिक संस्थाओं या युवाओं के अधिकारों को लेकर अलग राजनीतिक मंच तैयार नहीं किया.

Free Imran Khan जैसे नारे लाखों लोगों को जोड़ सकते हैं, लेकिन वे पूरे पाकिस्तान के युवाओं को साझा राष्ट्रीय आंदोलन में नहीं बदल पाते.

यही सबसे बड़ा अंतर है.

imra.jpg

कई आंदोलन हैं, लेकिन सब बिखरे हुए

पाकिस्तान में कई सामाजिक आंदोलन वर्षों से चल रहे हैं.

Baloch Yakjehti Committee (BYC) जबरन गुमशुदगी के खिलाफ आवाज उठाती है.

Pashtun Tahafuz Movement (PTM) पश्तून समुदाय के अधिकारों की बात करता है.

औरत मार्च महिलाओं के अधिकारों पर काम करता है.

वकीलों का आंदोलन न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए चला.

लेकिन इन सभी आंदोलनों की एक सीमा है.

इनकी पहचान क्षेत्रीय, जातीय या वैचारिक मानी जाती है. इसलिए ये पूरे देश का साझा आंदोलन नहीं बन पाते. पाकिस्तान पर मेरी किताब पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

सोशल मीडिया पर भी राज्य की मजबूत पकड़

भारत में सोशल मीडिया अक्सर सरकार और जनता के बीच खुली बहस का मंच बन जाता है.

पाकिस्तान में स्थिति अलग है.

डॉ. कोटोके बताती हैं कि वहां डिजिटल आतंकवाद जैसी अवधारणाओं के माध्यम से राजनीतिक आलोचना और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच की रेखा कई बार धुंधली कर दी जाती है.

राज्य डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल अपनी उपलब्धियों, सैन्य शक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा के नैरेटिव को मजबूत करने के लिए भी करता है.

इससे वैकल्पिक राजनीतिक विमर्श सीमित हो जाता है.

छात्र राजनीति पर पुरानी बंदिशें

पाकिस्तान में स्वतंत्र छात्र राजनीति भी लंबे समय से कमजोर है.

1984 में General Zia-ul-Haq ने छात्र संघों पर प्रतिबंध लगाया था. यह प्रतिबंध आज भी प्रभावी है.

इसके बाद अदालतों ने भी छात्रों के लिए राजनीतिक गतिविधियों पर कई शर्तें लागू कीं.

जब विश्वविद्यालयों में ही संगठित छात्र राजनीति कमजोर हो जाए, तब राष्ट्रीय युवा आंदोलन खड़ा करना और कठिन हो जाता है.

क्या भविष्य में तस्वीर बदल सकती है?

डॉ. कोटोके मानती हैं कि पाकिस्तान में परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं.

देश की बड़ी आबादी युवा है.

डिजिटल कनेक्टिविटी लगातार बढ़ रही है.

सोशल मीडिया अब मुख्यधारा की राजनीति का अहम हिस्सा बन चुका है.

यदि कभी बेरोजगारी, आर्थिक संकट, लोकतांत्रिक अधिकारों और राजनीतिक असंतोष जैसे मुद्दे जातीय और प्रांतीय सीमाओं से ऊपर उठकर एक साझा राष्ट्रीय एजेंडा बन जाते हैं, तब पाकिस्तान का युवा वर्ग स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर सकता है.

भारत के लिए क्या सीख?

भारत और पाकिस्तान की परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन डिजिटल राजनीति दोनों देशों में तेजी से बदल रही है.

भारत का अनुभव बताता है कि जब युवा किसी साझा सार्वजनिक मुद्दे के इर्द-गिर्द संगठित होते हैं, तो उनका प्रभाव केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहता. वहीं पाकिस्तान का अनुभव यह दिखाता है कि यदि डिजिटल ऊर्जा किसी एक नेता या दल तक सीमित रह जाए, तो वह व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप नहीं ले पाती.

यही कारण है कि पाकिस्तान आज Digital Mobilization Without a Gen Z Uprising का उदाहरण बनकर सामने आता है- जहां इंटरनेट पर राजनीतिक सक्रियता तो व्यापक है, लेकिन वह अभी तक स्वतंत्र, राष्ट्रीय और मुद्दा-आधारित युवा आंदोलन में परिवर्तित नहीं हुई है.

आने वाले वर्षों में यदि आर्थिक चुनौतियां, युवाओं की आकांक्षाएं और लोकतांत्रिक सवाल एक साझा राष्ट्रीय विमर्श में बदलते हैं, तो पाकिस्तान की डिजिटल पीढ़ी केवल ऑनलाइन दर्शक नहीं, बल्कि राजनीतिक परिवर्तन की निर्णायक शक्ति भी बन सकती है.

तब तक, वहां की राजनीति में सोशल मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी, लेकिन वह वास्तविक Gen Z जनआंदोलन का विकल्प नहीं बन पाएगी.

IR Geopolity Special.png


विज्ञापन
अचल प्रियदर्शी

लेखक के बारे में

By अचल प्रियदर्शी

अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.

ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  2. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  3. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)

  4. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)

  5. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)

  6. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  7. Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)

  8. उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)

  9. बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)

  10. International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

  11. Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola