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सच्चे प्रेम के विजय का उत्सव है होली

Updated at : 24 Feb 2018 6:07 AM (IST)
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सच्चे प्रेम के विजय का उत्सव है होली

होली त्योहार मनाने के पीछे भक्त प्रह्लाद की कथा सबसे ज्यादा प्रचलित है, मगर हमारे धर्मग्रंथों में कई अन्य भी कथाएं मिलती हैं. शिव पुराण के अनुसार, हिमालय की पुत्री पार्वती शिव से विवाह हेतु कठोर तप कर रही थीं और शिव भी तपस्या में लीन थे. इंद्र का भी शिव-पार्वती विवाह में स्वार्थ छिपा […]

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होली त्योहार मनाने के पीछे भक्त प्रह्लाद की कथा सबसे ज्यादा प्रचलित है, मगर हमारे धर्मग्रंथों में कई अन्य भी कथाएं मिलती हैं. शिव पुराण के अनुसार, हिमालय की पुत्री पार्वती शिव से विवाह हेतु कठोर तप कर रही थीं और शिव भी तपस्या में लीन थे.
इंद्र का भी शिव-पार्वती विवाह में स्वार्थ छिपा था कि ताड़कासुर का वध शिव-पार्वती के पुत्र द्वारा होना था. इसी वजह से इंद्र ने कामदेव को शिव जी की तपस्या भंग करने भेजा परंतु शिव ने क्रोधित हो कामदेव को भस्म कर दिया.
शिव जी की तपस्या भंग होने के बाद देवताओं ने शिव को पार्वती से विवाह के लिए राजी कर लिया. इस कथा के आधार पर होली में काम की भावना को प्रतीकात्मक रूप से जला कर सच्चे प्रेम का विजय का उत्सव मनाया जाता है.
एक अन्य कथा भी मिलती है कि कंस को जब आकाशवाणी द्वारा पता चला कि वसुदेव और देवकी का आठवां पुत्र उसका विनाशक होगा तो कंस ने वसुदेव तथा देवकी को कारागार में डाल दिया. कारागार में जन्मे देवकी के छह पुत्रों को कंस ने मार दिया.
सातवें पुत्र शेष नाग के अवतार बलराम थे, जिनके अंश को जन्म से पूर्व ही वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया गया था. आठवें पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण का अवतार हुआ. वसुदेव ने रात में ही श्रीकृष्ण को गोकुल में नंद और यशोदा के यहां पहुंचा दिया और उनकी नवजात कन्या को अपने साथ ले आये. कंस उस कन्या को मार नहीं सका और आकाशवाणी हुई कि कंस को मारनेवाले ने तो गोकुल में जन्म ले लिया है.
तब कंस ने उस दिन गोकुल में जन्मे सभी शिशुओं की हत्या करने का काम राक्षसी पूतना को सौंपा. वह सुंदर नारी का रूप बनाकर शिशुओं को विष का स्तनपान कराने गयी, लेकिन श्रीकृष्ण ने राक्षसी पूतना का वध कर दिया. यह फाल्गुन पूर्णिमा का दिन था. अत: बुराई के अंत की खुशी में होली मनायी जाने लगी.
होली का त्योहार राधा-कृष्ण के पवित्र प्रेम से भी जुड़ा है. बसंत में एक-दूसरे पर रंग डालना श्रीकृष्ण लीला का ही अंग माना गया है. मथुरा-वृंदावन की होली राधा-कृष्ण के प्रेम रंग में डूबी होती है.
बरसाने और नंदगांव की लठमार होली जगप्रसिद्ध है. होली पर होली जलायी जाती है अहंकार की, अहं की, वैर-द्वेष की, ईर्ष्या की, संशय की और प्राप्त किया जाता है विशुद्ध प्रेम.
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