रंगों की राजनीति और प्रतीक
Author Prabhat khabar digital desk
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ऐश्वर्या ठाकुर आर्किटेक्ट एवं ब्लॉगर सूरज की किरण अपनी मुट्ठी में सात रंगों की सौगात भर लाती है और कायनात के कैनवस को सतरंगी बना देती है. इन्हीं रंगों से नहा कर दुनिया काबिल-ए-दीद बन जाती है. रंगों को सियासी और मजहबी खेमों में बांटनेवाले भी कम नहीं हैं. बर्फपोश चोटियां हों या चांद की […]
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ऐश्वर्या ठाकुर
आर्किटेक्ट एवं ब्लॉगर
सूरज की किरण अपनी मुट्ठी में सात रंगों की सौगात भर लाती है और कायनात के कैनवस को सतरंगी बना देती है. इन्हीं रंगों से नहा कर दुनिया काबिल-ए-दीद बन जाती है. रंगों को सियासी और मजहबी खेमों में बांटनेवाले भी कम नहीं हैं. बर्फपोश चोटियां हों या चांद की सतह, हर जगह हर कोई अपना ही रंग लहराता देखना चाहता है. इसी खींचतान के चलते आज रंगों की सियासत और फलसफे उनके अलग-अलग अर्थ पेश करते नजर आते हैं.
ज्योतिष के ज्ञाता नवग्रहों को रंगों के साथ जोड़ कर ‘शुभ’ और ‘अशुभ’ जैसी संज्ञाएं देते हैं. मजहबी पहचानों को भी अलग-अलग रंगों के पैरहन ओढ़ा दिये गये हैं. विकास, जीवन और आशा का प्रतीक होने के कारण हरे रंग को इस्लाम से जोड़ कर देखा जाता है. भगवा या केसरी रंग वीरता और त्याग का प्रतीक है और हिंदू एवं बौद्ध धर्म के साथ इसकी पहचान जुड़ी हुई है. इसलिए साधू-संत और बौद्ध भिक्षु भगवा चोला धारण किये रहते हैं.
नीले रंग में भी राजनीति और अध्यात्म की कई परतें हैं. पुराणों में शिव को हलाहल विष पीने के कारण ‘नीलकंठ’ कहा गया है. श्रीकृष्ण का पौराणिक चित्रण भी नीला ही किया जाता है, क्योंकि यमुना में कूदने के बाद कालिया सर्प के विष के प्रभाव से उनका रंग नीला पड़ गया था. गौरतलब है कि मौजूदा राजनीतिक संदर्भ में नीला रंग दलित आंदोलन के साथ जोड़ कर देखा जाता है. अांबेडकर का नीला कोट ही दलित आंदोलन द्वारा नीले रंग के प्रतीकात्मक अंगीकरण की संभावित वजह भी है.
एक तरफ जहां खाकी रंग चुस्त पुलिसिया वर्दियों और फौजी यूनिफॉर्म का पर्याय है, वैसे ही सफेद को आत्मसमर्पण, शुद्धता और शांति के रंग के तौर पर पहचान मिली है. सलेटी रंग का जिक्र आते ही वारिस शाह की कृति ‘हीर सलेटी’ याद हो आती है, जिसके मटमैले रूप-रंग को देख रांझा सौदाई हो गया था.
गुलाबी रंग के साथ कोमलता का संबंध होने के चलते साहित्य में स्त्री-सौंदर्य को गुलाबी रंग के साथ जोड़ कर देखा गया. लेकिन स्त्री सशक्तीकरण आंदोलनों और स्त्रीवाद ने इसके पीछे छिपी जेंडर-पॉलिटिक्स को पहचाना और ‘पिंक’ जैसी फिल्मों और ‘गुलाबी गैंग’ जैसे संगठनों ने इस रंग को नजाकत से आगे जाकर महिला शक्ति और आत्मविश्वास का चिह्न बनाने का काम किया.
लाल सलाम के नारों से गूंजती रैलियों और लहराते हुए लाल परचम की राजनीति भी कम दिलचस्प नहीं. फ्रांसिसी क्रांति के दौरान लाल रंग विद्रोह के रंग के तौर पर पहचाना जाने लगा. यही लाल रंग पूंजीवाद के खिलाफ लड़ते हुए मजदूरों के बहनेवाले खून का प्रतीक बन गया और दुनियाभर में साम्यवाद के रंग के नाम से पहचाना जाने लगा.
विरोध ने भी अक्सर काले रंग को ही अपने प्रतीक के रूप में चुना है, इसलिए विरोध चाहे स्याही फेंक कर की जाये या झंडे दिखा कर, रंग हमेशा काला ही चुना जाता है. फिल्म ‘काला’ में भी नायक के नाम समेत उसके साथ जुड़े तमाम प्रतीक, जातीय दमन के प्रतिरोध के रूप में दर्ज हैं. जिम्बाब्वे के विख्यात नेता रॉबर्ट मुगाबे ने काले रंग के साथ जुड़े नस्लीय भेदभाव को अपने भाषण में पुरजोर तरीके से उठाया था.
रंगों ने अक्सर क्रांति के गाड़ीवान की भूमिका भी निभायी है. चाहे खेती-किसानी में आयी हरित-क्रांति हो या फ्रांसिसी सरकार के खिलाफ चली ‘येलो वेस्ट’ यानी पीले रंग की जैकेट पहने विद्रोहियों की क्रांति, यूक्रेन में राजनीतिक बदलाव के लिए हुए विरोध प्रदर्शन को ‘ऑरेंज क्रांति’ का नाम दिया गया हो या इराक में सद्दाम हुसैन के सत्ता परिवर्तन को दिया गया नाम ‘बैंगनी क्रांति’, रंगों के संकेतात्मक इस्तेमाल ने इनकी पहचान को एक नया आयाम दिलाने में अहम भूमिका निभायी है.
राजस्थानी पगड़ी के रंगों की बात हो या प्राइड मार्च में झूमता सतरंगी झंडा, रंगीन पतंगें हों या दीवारों पर एयरस्प्रे से बनी बैंक्सकी की ग्राफिटी, रंगों का सियासी, सामाजिक, आध्यात्मिक और कलात्मक फैलाव हर तरफ अनहद दिखता है.
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