कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष की बैठक को ममता की ना
Updated at : 15 May 2019 7:50 AM (IST)
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मतगणना से पहले विपक्ष को एकजुट रखने और राष्ट्रपति से मिलने की रणनीति सिरे चढ़ती नहीं दिख रही है. टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने नतीजों से पहले विपक्षी दलों की बैठक को ना कह दिया है. वहीं, बसपा प्रमुख मायावती और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने फिलहाल इस पर कोई जवाब नहीं दिया है. आंध […]
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मतगणना से पहले विपक्ष को एकजुट रखने और राष्ट्रपति से मिलने की रणनीति सिरे चढ़ती नहीं दिख रही है. टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने नतीजों से पहले विपक्षी दलों की बैठक को ना कह दिया है.
वहीं, बसपा प्रमुख मायावती और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने फिलहाल इस पर कोई जवाब नहीं दिया है. आंध प्रदेश के सीएम और टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू इस बैठक के लिए विपक्षी दलों से संपर्क साधने में जुटे हैं. उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सहित डेढ़ दर्जन क्षेत्रीय दलों के नेताओं से संपर्क साधा है. सूत्रों के मुताबिक ममता ने कहा है कि नतीजे आये बिना ऐसी बैठक में वह शिरकत नहीं करेंगी. हालांकि एनसीपी, आरजेडी, डीएमके, जेडीएस सहित दर्जन भर क्षेत्रीय दल इसके लिए राजी हैं.
कांग्रेस के नेतृत्व में प्रस्तावित इस बैठक में विपक्षी दलों के बीच एकजुटता बनाने और राष्ट्रपति से मिल कर किसी दल या गठबंधन को बहुमत न मिलने की स्थिति में बहुमत का परीक्षण किये बिना किसी को भी सरकार बनाने का निमंत्रण न देने का अनुरोध करने की रणनीति थी. इस क्रम में 21 या 22 मई को विपक्ष को एकजुट होना था. दरअसल ममता, माया, अखिलेश जैसे नेता गैर कांग्रेस- गैर भाजपा सरकार के पक्ष में हैं.
लिहाजा, ये नेता नतीजा आने से पहले कांग्रेस की अगुवाई में होने वाली बैठक से दूर रहना चाहते हैं.किसी को बहुमत न मिलने की स्थिति में ममता, माया, अखिलेश, के चंद्रशेखर राव, जगनमोहन रेड्डी, नवीन पटनायक जैसे नेताओं का रुख महत्वपूर्ण हो जायेगा.
जब विजयाराजे ने दो पार्टियों से लड़ा चुनाव
1967 में विजयाराजे सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी. उसी समय मध्य प्रदेश के विधानसभा और लोकसभा चुनाव एक साथ हो रहे थे. दुविधा के बीच विजयाराजे ने जनसंघ के उम्मीदवार के रूप में करेरा विधानसभा सीट से पर्चा भरा, जबकि गुना सीट पिर स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा. विजयाराजे दोनों सीटों पर भारी मतों के अंतर से चुनाव जीत गयी थीं. गुना लोकसभा सीट पर उन्हें 78.79% वोट मिले थे, जबकि उनके विरोधीकांग्रेस के उम्मीदवार डीके जाधव को 16% वोट ही मिले थे. इसके साथ ही तब सबसे ज्यादा वोटों से जीतने का रिकॉर्ड भी विजयाराजे ने अपने नाम कर लिया था.
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