अनाज मापने की पुरानी परंपरा को सांस दे रहा है झारखंड का यह गांव, बनाते हैं पइला

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आज हमारे पास वजन मापने की कई आधुनिक मशीन है, इस मशीन तक पहुंचने के सफर की अलग- अलग कहानी है लेकिन झारखंड में इसकी शुरुआत पइला से होती है. पइला जो आज भी झारखंड के ग्रामीण बाजारों की अर्थव्यस्था मांप कर चलाती है.

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आज हमारे पास वजन मापने की कई आधुनिक मशीन है, इस मशीन तक पहुंचने के सफर की अलग- अलग कहानी है लेकिन झारखंड में इसकी शुरुआत पइला से होती है. पइला जो आज भी झारखंड के ग्रामीण बाजारों की अर्थव्यस्था माप कर चलाती है.

गांव के बाजार में खेजा ( सामान का छोटा सा ढेर जो अंदाजे से लगाया जाता है ) आज भी प्रचलित है. मिर्च, बादाम, सब्जियां, मशाले आज भी गांव के बाजारों में अंदाजे से बेचे जाते हैं और अगर मापने की जरूरत पड़े, तो दिखता है पइला. पइला आज भी चलन में है और खूब इस्तेमाल होता है लेकिन सवाल है कि कौन लोग हैं, जो आज भी पइला बना रहे हैं. पढ़ें मापने की पुरानी परंपरा को सांस देने वाले गांव से पंकज कुमार पाठक की खास रिपोर्ट

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