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झारखंड : आजादी के 75 सालों में इस गांव तक नहीं पहुंची सड़क

लातेहार जिला के महुआडांड़ प्रखंड के पंचायत चंपा के ग्राम ग्वालखाड़ गांव जो आजादी के सात दशक बाद भी संपर्क पथ से नहीं जुड़ पाया है. पहाड़ मे बसे इस गांव के आदिवासीयो की ज़िन्दगी तो पगडंडी के सहारे चलती है. बरसात के दिनो मे ये सुविधा भी इनसे छिन जाती है.

By Prabhat khabar Digital
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लातेहार जिला के महुआडांड़ प्रखंड के पंचायत चंपा के ग्राम ग्वालखाड़ गांव जो आजादी के सात दशक बाद भी संपर्क पथ से नहीं जुड़ पाया है. पहाड़ मे बसे इस गांव के आदिवासीयो की ज़िन्दगी तो पगडंडी के सहारे चलती है. बरसात के दिनो मे ये सुविधा भी इनसे छिन जाती है. रेंगाई पंचायत के पारही गांव से ग्वालखाड़ तक पांच किलोमीटर पहुंच पथ ही नहीं है. सड़क की तरह अन्य बुनियादी सुविधाओं का भी घोर अभाव है.

इस गांव मे आदिम जनजातिय कोरवा और किसान जाति निवास करते है. लगभग तीन सौ की आबादी बसती है. कोरवा समुदाय के 25 और किसान परिवार के लगभग 30 घर है. प्रखंड मुख्यालय से गांव 12 किलोमीटर दूर है. किंतु प्रशासन द्वारा ध्यान नही देने से संपर्क पथ नही बन पाया है. चिकित्सा की सुविधा नहीं रहने की वजह से गर्भवती महिलाओ को जब पीड़ा होती है,तो कंधे मे ढोकर उसे सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र लाया जाता है. बुजूर्गो को बैंक से वृद्धा पेंशन राशि निकालने के लिए टोकरी पर सवार होकर मुख्यालय आना पड़ता है।

पहाड़ पर जीवन पहाड़ से भी विकराल होता है

गांव मे न कुआं न चापाकल है. एक पहाड़ी झरना है. जो इंसान और जानवर दोनो की प्यास बुझाती है. बिजली तो दूर गांव मे खंभे तक नही गड़े है. गांव मे आंगनबाड़ी केंद्र और मध्य विद्यालय भी है. लेकिन भवन जर्जर पड़ा है. नरेगा की योजनाएं गांव मे नही चल रही. इनको राशन तो मिलता है, लेकिन राशन लेने ग्रामीण महुआडांड़ आते है. कोरवा जनजाति लोगो को पारही गांव मे बुलाकर राशन वितरण किया जाता है. युवा गांव से पलायन कर केरल, मुंबई एवं यूपी राज्य मे मजदूरी कार्य करते है. लड़कियां भी दिल्ली जाकर घरो पर दाई का काम करती है. गांव की भौगोलिक बनावट और पठार क्षेत्र होने के कारण सभी तरह की खेती संभव नही है. लोग साल मे एक बार मक्के की खेती करते है, उसे घट्ठा (आहार) बनाकर खाते है.

इस गांव कोरवा जनजातिय की महिलाएं बाजार की गलियो मे सुबह- सुबह सुखी लकड़ी बेचते नजर आती है, डोगंचू कोरवा, पौलुस कोरवा एवं राजेश कोरवा सभी का कहना है, कि पहुंच पथ नहीं रहने की वजह से गांव मे एक साइकिल भी लोगो के पास नही हैं, हमलोग सड़क की मांग हमेशा से करते आ रहे है. सुरेन्द्र कोरवा कहते है, इस पहाड़ पर जीवन पहाड़ से भी विकराल है. करोना के आने से यहां के बच्चो की पढ़ाई छुट गई है. जो कुछ भी पढ़ना लिखना जानते थे, भूल चुके है. फिलहाल बच्चे बैल बकरी चरा रहे है,गांव मे नेटवर्क कनेक्टिविटी मिलती है. लेकिन बच्चे ऑनलाइन शिक्षा से वंचित है. क्योकि एन्ड्रोएड मोबाइल किसी के पास नही है.

रामचन्द्र नगेसिया 70 वर्षीय कई महिनो से अपने वृद्धा पेंशन की राशि को बैंक खाते से नही निकाले है. चलने फिरने से असमर्थ रामचन्द्र नगेसिया ने बताया कि गांव मे सड़क नही होना सबसे बड़ी समस्या है. खुद चलकर बैंक नही जा सकता एवं रोड नही रहने से कोई गाड़ी इस गांव तक नही पहुंचती है.

ग्राम प्रधान राधेश्याम नगेसिया ने कहा, आदिवासीयो की बात तो सरकार करती है, पर ध्यान नही दिया जाता, हम आदिवासीयो का जीवन स्तर बेहद निम्न है, जरूरत है, तो यथाशीघ्र विकास के लिए संपर्क पथ बनाए जाने की वन विभाग से एनओसी लेना हो या फिर रैयत के जमीन के एवज में यदि सरकार को मुआवजा देना पड़े तो उसे दे लेकर गांव के ग्रामीणो को संपर्क पथ से जोड़ना चाहिए.

स्वास्थ्य सहिया प्यारी नगेसिया ने बताया ज्यादातर बच्चो का जन्म गांव मे ही होता है. सड़क नही होने के वजह से गंभीर मरीज अस्पताल समय पर नही पहुंचते, पिछले वर्ष एक घटना घटी थी. गांव की एक गर्भवती महिला को पीड़ा उठी एवं ज्यादा तबियत खराब होती गई. समय मे अस्पताल पहुंचना जरूरी था. उसको खाट मे लिटाकर कंधे मे ढोकर हमलोग सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर जा रहे थे. वही रास्ते मे ही बच्चे का जन्म हो गया. किंतु उस महिला की तबीयत गंभीर हो गई. बच्चा तो सुरक्षित बच गया. लेकिन समय पर इलाज नही मिलने से महिला की मौत रास्ते मे हो गई.

महुआडांड प्रखंड विकास पदाधिकारी अमरेन डांग ने कहा,चंपा पंचायत मे जब सरकार आपके द्वार कार्यक्रम का शिविर लगा था. तब सड़क का मामला आया था. इसे गंभीरता से संज्ञान मे लिया गया है, जहा तक पथ बनना है, वहा कुछ रैयतो की जमीन एवं कुछ वन विभाग भूमि पड़ती है, प्रयास किया जा रहा है, जल्द ग्वालखाड़ गांव को संपर्क पथ से जोड़ा जाएगा।

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