Mahashivratri 2022: महाशिवरात्रि आज, जानें कैसे करें शिव की आराधना, यहां है पूजा विधि,शुभ मुहूर्त और आरती
Mahashivratri 2022 Date : फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि व्रत रखते हैं. इस वर्ष महाशिवरात्रि कल यानी 01 मार्च दिन मंगलवार को है.महाशिवरात्रि के दिन भगवान भोलेनाथ की पूजा और व्रत रखने का विशेष महत्व होता है. यहां जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसका महत्व
महाशिवरात्रि के व्रत में क्या खाएं
महाशिवरात्रि के व्रत में व्रती अनार या संतरे का जूस पी सकते हैं, फल खा सकते हैं. इस दिन बेर भी खाए जा सकते हैं. जूस पीने से शरीर में पानी की कमी नहीं होती और एनर्जी भी बनी रहती है.
महामृत्युंजय मंत्र जाप करने का सही तरीका
महामृत्युंजय जाप से पहले भगवान शिव के सामने धूप-दीप जलाएं. मंत्र को हमेशा कुश के आसान पर करें और जाप करते समय अपना मुख पूर्व दिशा की ओर रखें. महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते समय ध्यान रखें कि उच्चारण शुद्ध रहे. साथ ही इसका जाप माला से ही करें. इस महामंत्र का जाप जोर से बोलकर नहीं करें, बल्कि ऐसे करें कि स्वर होंठों से बाहर न निकलें. कोशिश करें कि नियमित तौर पर जाप कर रहे हों तो एक स्थान नियत कर लें, हर दिन जगह न बदलें. तामसिक भोजन का सेवन न करें.
किस दिशा में स्थापित करें भोलेनाथ की मूर्ति
भगवान शिव का निवास स्थान कैलाश पर्वत पर है, जो कि उत्तर दिशा में है.इसलिए ध्यान रखें कि भोलेनाथ की मूर्ति उत्तर दिशा में स्थापित करें. साथ ही भगवान शिव की क्रोध मुद्रा वाली प्रतिमा स्थापित नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसे विनाश का प्रतीक माना जाता है.
महाशिवरात्रि का महत्व
महाशिवरात्रि को भक्त माता पार्वती और भगवान शिव के विवाह को याद करने के साथ-साथ इसलिए भी मनाते हैं क्योंकि महादेव को मन पर विजय पाने वाले देवता के रूप में देखा जाता है. भक्त शिव के प्रतिरूप खुदको ढालने का प्रयास करते हैं. वे ध्यान और चिंतन के गुण खुद में लाना चाहते हैं. वहीं, कहते हैं कि कन्याएं इस दिन शिव जी का व्रत (Mahashivratri Fast) रख मनोकामना मांगती हैं कि उन्हें सुयोग्य वर की प्राप्ति हो. इन्हीं कारणों के चलते महाशिवरात्रि को भक्त पूरे भक्तिभाव के साथ मनाते हैं.
बेलपत्र की महिमा
महाशिवरात्रि की कथा में एक प्रसंग यह भी आता है कि शिवरात्रि की अंधेरी रात की वजह से एक भील घर नहीं जा सका. उस रात उसने एक बेलपत्र के वृक्ष पर गुजारी. नींद आने के कारण वृक्ष से नीचे गिर ना जाए इसलिए वह रात भर बेल के पत्तों के तोड़कर नीचे फेंकता रहा. संयोग से उस वृक्ष के नीचे शिवलिंग था. बेलपत्र शिवलिंग पर गिरने से भगवान शिव प्रसन्न हो गए. जिसके बाद भगवान शिव उस भील के समक्ष प्रकट हुए और उसे मुक्ति का वरदान दिया. कहते हैं कि बेलपत्र की महिमा से उस भील को शिवलोग की प्राप्ति हुई.
क्यों चढ़ाते हैं शिवलिंग पर जल और बेलपत्र?
शिव पुराण के अनुसार समुद्र मंथन के समय कालकूट नाम का विष निकला था. जिसके प्रभाव से सभी देवता और जीव-जंतु व्याकुल होने लगे. सृष्टि में हहाकार मच गया. सृष्टि की रक्षा के लिए देवताओं और असुरों ने मिलकर भगवान शिव के प्रार्थना की. जिसके बाद भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होनें विष को हथेली पर रखकर पी लिया. भगवान शिव विष के प्रभाव से खुद को सुरक्षित रखने के लिए इसे अपने कंठ में धारण कर लिया. जिसकी वजह से भोलेनाथ का कंठ नीला पड़ गया, इसलिए शिवजी नीलकंठ कहलाए. विष की ज्वाला इतनी तेज थी कि भोलेनाथ का मस्तिष्क गर्म हो गया. ऐसे में देवताओं ने भगवान शिव पर जल अर्पण करना शुरू कर दिया. साथ ही बेलपत्र के गुणों के कारण उसे भगवान शिव पर चढ़ाने लगे. इसके बाद से ही भगवान शिव को जल और बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा है. यही कारण है कि जल और बेलपत्र से शिव की पूजा करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है. साथ ही दरिद्रता दूर होती है और जीवन में सौभाग्य बढ़ता है.
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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