झारखंड की ये आदिवासी महिलाएं बचा रही हैं जंगल, दिन-रात करती हैं पहरेदारी, एक को मिल चुका है पद्मश्री

Updated at : 01 May 2023 2:46 PM (IST)
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झारखंड की ये आदिवासी महिलाएं बचा रही हैं जंगल, दिन-रात करती हैं पहरेदारी, एक को मिल चुका है पद्मश्री

झारखंड की इन महिला समूहों के बारे में कहा जाता है कि ये दिन और रात जंगल की पहरेदारी करती है. जंगल की लकड़ी काटने पर जुर्माने का प्रावधान है. लकड़ी की जरूरत लोग इन समूहों से अनुमति लेते हैं

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पूर्वी सिंहभूम, मो. परवेज:

कहा जाता है कि आदिवासी प्राकृति के सबसे बड़े संरक्षक होते हैं. उनके लिए जंगल और जमीन सब कुछ होता है. लेकिन क्या आपने किसी आदिवासी महिला को जंगल की रक्षा करने के लिए दिन रात पहरेदारी करते देखा है. अगर नहीं तो हम आज आपको इस कहानी के जरिये झारखंड के उन महिला समूहों से रू-ब-रू करवायेंगे. ये कहानी पूर्वी सिंहभूम के चाकुलिया, सिरका और घाटशिला गांव की है.

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इन महिला समूहों के बारे में कहा जाता है कि ये दिन और रात जंगल की पहरेदारी करती हैं. जंगल की लकड़ी काटने पर जुर्माने का प्रावधान है. हां, अगर किसी को शादी ब्याह या मरनी में लकड़ी की जरूरत होती है तो ये महिला समूह से मिलकर इजाजत लेते हैं. इसके बाद ही किसी लकड़ी काटने की अनुमति दी जाती है.

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जमुना टुडू अन्य महिला साथियों के साथ मिलकर बचा रही है जंगल

जमुना टुडू जंगल बचाने में सबसे चर्चित महिलाओं में से एक है. जो अन्य महिला साथियों के साथ मिलकर दिन-रात इसी काम में लगे हुए हैं. जमुना टुडू के बारे में कहा जाता है कि उनका विवाह साल 1998 में चाकुलिया स्थित सोनाहातू पंचायत में मानसिंह टुडू के साथ हुई थी. जमुना के ससुराल में एक बंजर पहाड़ी स्थित थी. जिसमें इक्के दुक्के साल के पौधे भी लगे थे.

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उस गांव में महिलाओं को हर दिन सुबह-सुबह जंगल से लकड़ी काटने जाना होता था. जमुना से भी उनके परिजनों और गांव के लोगों ने ये काम करने को कहा. लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया. इसकी बड़ी वजह उन्हें मायके से ही जंगल बचाने का संस्कार मिला था. शुरूआत में उन्हें अकेली ही ये लड़ाई लड़नी पड़ी. धीरे-धीरे गांव की अन्य महिलाओं ने उनकी लड़ाई को समझा और उनका साथ देने का फैसला किया. इसके लिए सभी को बारी बारी से जंगल की सुरक्षा का जिम्मा मिला.

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इसका सुखद परिणाम देखने को मिला और कुछ ही दिनों में जंगल हरा-भरा दिखने लगा. हालांकि इस वजह से कई लोग उनके जान के दुश्मन बन गये, और उन पर हमला हुआ. लेकिन वह हर बार बच गयी. वन संरक्षण में बेहतर कार्य को के लिए उस वक्त तत्कालीन रेंजर एके सिंह ने जमुना टुडू को लेडी टार्जन की उपाधि दी.

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जंगल बचाने के लिए जमुना को लकड़ी माफियाओं से भी लड़ना पड़ा. फिर भी वन संरक्षण के क्षेत्र में जमुना काम करती रही. धीरे-धीरे जमुना ने समूचे कोल्हान में वन संरक्षण सह प्रबंधन समिति का गठन कर किया. पेड़ पौधों को बचाने के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने के लिए जमुना को पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया.

सिरका गांव की संगीता मुर्मू 187.12 एकड़ वन भूमि को बचा कर रखी है हरियाली कायम

एमजीएम थाना क्षेत्र के सिरका गांव की संगीता मुर्मू महिलाओं की समूह बना कर 187.12 एकड़ वन भूमि में वृक्षों को बचाकर हरियाली कायम रखी है. इससे जंगल लहलहा उठे हैं. वह वर्षों से वन सुरक्षा समिति गठित कर जंगलों को बचाने में जुटी है. उनकी समिति में 90 से अधिक महिलाएं हैं. ये महिलाएं हर दिन समूह बनाकर रात-दिन जंगलों की पहरेदारी करती है.

कोई जंगल से लकड़ी काटते पकड़ा जाता है तो उन पर कड़ी सजा के साथ जुर्माना भी लगाया जाता है. अगर लकड़ी माफिया उनकी बातों को अनसुना करते हैं तो वो इसकी शिकायत वन विभाग से करती है. संगीता को इस काम के लिए मुंबई में साल 2019 में वन विभाग ने तीन लाख रुपये का नगद पुरस्कार देकर सम्मानित किया है.

कालाझोर भूमि में लहलहा रहे हैं साल जंगल

घाटशिला क्षेत्र के कालाझोर वन भूमि में वन सुरक्षा समिति के अथक प्रयास से साल जंगल लहलहा रहे हैं. समिति के अध्यक्ष दो पुरुष हैं. समिति के अध्यक्ष दुलाल चंद्र हाउदा है. जिन्होंने सैकड़ों महिलाओं को इस काम से जोड़ा है. दुलाल चंद्र का इस बारे में कहना है कि महिलाएं इमानदार होती है और अपना काम जिम्मेदारी से निभाती है, इस वजह ज्यादातर महिलाओं को इस काम से जोड़ा गया है. इन महिलाओं के प्रयास का ही नतीजा है कि आज साल जंगल लहालहा रहा है.

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