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नये साल में बड़कागांव के गांव-देहातों में ढक्कन दबा रोटी और पीठा बनाने की है परंपरा, जानें इसकी खासियत

Updated at : 31 Dec 2021 8:42 PM (IST)
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नये साल में बड़कागांव के गांव-देहातों में ढक्कन दबा रोटी और पीठा बनाने की है परंपरा, जानें इसकी खासियत

jharkhand news: हजारीबाग के बड़कागांव में आज भी नये साल पर ढक्कन दबा रोटी और पीठा बनाने की परंपरा है. आज भी गांव-देहात के लोग अपने-अपने घरों में पीठा समेत अन्य कई व्यंजन बनाकर नये साल का स्वागत करते हैं.

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Jharkhand news: हजारीबाग जिला अंतर्गत बड़कागांव के गांव-देहात में ढक्कन दबा रोटी, पीठा आदि बनाने की परंपरा आज भी जीवित है. पहले पिकनिक में मुख्य रूप से हर लोग अपने-अपने घरों में ही नये साल की खुशियां मनाते थे. लेकिन, समय के साथ-साथ पिकनिक मनाने का तरीका भी बदलने लगा है.

बड़कागांव निवासी स्वर्गीय धनिक लाल साव की वयोवृद्ध पत्नी रुकमणी देवी स्वस्थ हैं. इनके 5 पुत्र हैं. जिससे 8 पोता और 3 परपोता, 8 नाती एवं 11 पर नाती है. रुकमणी देवी कहती हैं कि 80 साल पहले पिकनिक मनाने के लिए इतना तामझाम नहीं रहता था. फस्ट जनवरी कब आता था, लोगों को पता तक भी नहीं चलता था. क्योंकि गरीबी उस समय अधिक थी. गरीबी के कारण लोग अपने काम-धंधा में व्यस्त रहते थे.

कहती है कि खुद में अपने खेत-खलिहान में व्यस्त रखती थी. हां, आसपास के कुछ लोग खेत- खलिहान में या नदियों के किनारे पिकनिक मनाया करते थे. 80 साल पहले पिकनिक में मुख्य रूप से हर लोग अपने-अपने घरों में ही नये साल की खुशियां मनाया करते थे.

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कहती हैं कि उस समय ढक्कन दबा रोटी एवं छिलका प्रमुख व्यंजन था. अपने घरों में ढक्कन दबा रोटी एवं छिलका रोटी बनाकर खुशी मनाते थे. लेकिन, गरीबी के कारण उस वक्त इतनी तामझाम के साथ चिकन और मटन के साथ पिकनिक नहीं मनाते थे. उस समय किसी भी प्रकार का बाजा नहीं बजता था. डीजे का प्रचलन नहीं था और ना ही नाच-गान होता था.

वहीं, बड़कागांव के अंबेडकर मोहल्ला निवासी वयोवृद्ध देवल भुइयां का कहना है कि 80 साल पहले पिकनिक का प्रचलन नहीं था. कुछ लोग वनभोज मनाया करते थे. जब हमलोग जंगल से लकड़ी लाने के लिए जाते थे, तो जंगल की ओर अंग्रेज वनभोज करते थे. अंग्रेजों के पास बंदूक रहता था क्योंकि जंगल में उस वक्त बाघ, शेर, लकड़बग्घा बहुत रहते थे. इसीलिए उन लोग जब भी वनभोज करने जाते थे, तो साथ में बंदूक लेकर जाया करते थे.

लकड़ी लाने के दौरान अंग्रेज हमलोगों को भोजन कराते थे. गरीबी के कारण हमलोग वनभोज नहीं कर पाते थे. वनभोज अमीर लोगों के लिए था. गरीबों के लिए नहीं था. हम लोग अपने घरों में छिलका रोटी और पूड़ी, रशिया (गुड़भात), पीठा, डुबकुल (आटा चावल का पीठा) बनाकर ही नये साल की खुशी मनाते थे. बड़कागांव में आज भी नये साल के अवसर पर रसिया और पीठा बनाने की परंपरा है.

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रिपोर्ट : संजय सागर, बड़कागांव, हजारीबाग.

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