जस्ट ट्रांजिशन टास्क फोर्स के चेयरमैन अजय कुमार रस्तोगी ने कहा-यह नया विषय जिसके विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन जारी
Published by : Rajneesh Anand Updated At : 22 Mar 2023 5:53 PM
झारखंड में 12 जिलों में कोयले का खनन हो रहा है और एक अन्य जिले को भी खनन के लिए चुना गया है, यानी कुल 13 जिले में कोयले का खनन हो रहा है. अगर कोयले पर से निर्भरता कम हुई तो हमारा राज्य बुरी तरह से प्रभावित होगा.
COP26 ग्लासगो जलवायु शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह संकल्प लिया है कि 2070 तक भारत नेट जीरो उत्सर्जन यानी शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल कर लेगा. इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सरकार नीतियां बना रही हैं और उसे लागू भी कर रही हैं. वित्तीय वर्ष 2023-24 के बजट में ग्रीन ग्रोथ पर काफी फोकस किया गया है. इसका एकमात्र उद्देश्य है, कार्बन उत्सर्जन को कम करना. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि झारखंड जैसे राज्य इस स्थिति का सामना कैसे करेंगे, जहां कि इकोनाॅमी में कोयले का अहम योगदान है. ज्ञात हो कि पिछले साल यानी 2022 के नवंबर महीने में झारखंड सरकार ने एक टास्क फोर्स का गठन किया है, यह देश का पहला ऐसा टास्क फोर्स है, जो इस बात का अध्ययन कर रही है कि अगर कोयले पर निर्भरता कम हुई तो उसका क्या असर होगा? अगर कोयला खदान बंद हुए तो उससे जीविका चलाने वालों के पास क्या विकल्प है? कोयले पर निर्भरता कम होने से प्रभावितों का जो पुनर्वास कराया जायेगा उसे जस्ट ट्रांजिशन (Just Transition ) का नाम दिया गया है. कहने का आशय यह है कि एनर्जी ट्रांजिशन के इस दौर में प्रभावितों को न्यायसंगत तरीके से बसाना ही जस्ट ट्रांजिशन है. झारखंड सरकार द्वारा गठित जस्ट ट्रांजिशन टास्क फोर्स के चेयरमैन अजय कुमार रस्तोगी ने प्रभात खबर से खास बातचीत में जस्ट ट्रांजिशन पर विस्तार से बात की. पढ़ें उस बातचीत की प्रमुख बातें-
जस्ट ट्रांजिशन क्या है और इसकी जरूरत झारखंड में क्यों है?
भारत सरकार ने 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया है. जब कोई नीति बनती है तो वह दो स्तर पर लागू होती है, एक तो केंद्र सरकार उसे लागू करती है और दूसरे वह राज्यों में लागू होती है. नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के लिए कोयले पर से निर्भरता कम की जायेगी, अभी झारखंड में 12 जिलों में कोयले का खनन हो रहा है और एक अन्य जिले को भी खनन के लिए चुना गया है, यानी कुल 13 जिले में कोयले का खनन हो रहा है. अगर कोयले पर से निर्भरता कम हुई तो हमारा राज्य बुरी तरह से प्रभावित होगा. ऐसे में हमें जस्ट ट्रांजिशन की सख्त जरूरत होगी. झारखंड में कोल माइनिंग कम होगा तो प्रभावितों को सोशल सिक्यूरिटी कैसे मिलेगी उनके रोजगार का क्या होगा? किस तरह उन्हें ट्रेंनिंग दी जायेगी. ट्रेनिंग के बाद श्रमिक बाहर ना जाये इस बात का ध्यान भी रखा जायेगा. जाॅब लाॅस बड़े पैमाने होंगे, इन तमाम बातों का अध्ययन यह टास्क फोर्स करेगी.
क्या आपको लगता है कि अगले पांच वर्ष में झारखंड में खदान बंद होने लगेंगे?
देखिए, हमारे देश में बिजली की जितनी मांग है उसका लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा हमें कोयले से प्राप्त होता है. इस परिस्थिति में कोयले पर से हमारी निर्भरता निकट भविष्य में कम होने वाली नहीं है. वजह यह है कि रिन्यूएबल एनर्जी के जरिये बिजली का उत्पादन तो हो रहा है, लेकिन बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है. ऐसे में कोयले की जरूरत लगातार बनी हुई है क्योंकि क्लीन एनर्जी के जरिये बिजली का उत्पादन उस रफ्तार से नहीं बढ़ रहा है. इसलिए निकट भविष्य में कोयला खदान बंद नहीं होने वाले हैं.
जस्ट ट्रांजिशन की प्रक्रिया झारखंड में अभी किस स्तर पर है?
जस्ट ट्रांजिशन एक बहुत ही नया विषय है, जिसपर अध्ययन जारी है. हमें पहले यह समझने की जरूरत है कि जस्ट ट्रांजिशन होगा कैसे? किन लोगों को इसकी जरूरत होगी. इस बात से सभी वाकिफ हैं कि कोयला क्षेत्र में जितने लोग फाॅर्मल वर्कर हैं उतने ही इनफाॅर्मल वर्कर भी हैं. ऐसे में यह समझना बहुत जरूरी है कि आजीविका की समस्या सिर्फ संगठित मजदूरों को नहीं असंगठित मजदूरों को भी होगी. हमारे राज्य में कोयले पर आधारित कई अन्य उद्योग भी हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है स्टील और सीमेंट. कोयले का उत्पादन अगर प्रभावित होगा तो इन उद्योगों पर भी असर होगा. कई एमएसएमई एवं ट्रांसपोर्टर भी प्रभावित होंगे. ऐसे में मैं यह कह सकता हूं कि झारखंड में अभी कोयले पर निर्भरता कम होने से क्या होगा, इसके विभिन्न आयामों को समझने की कोशिश शुरू हो चुकी है. इसमें बातचीत का दौर जारी है. उसके बाद फ्रेमवर्क तैयार किया जायेगा. इसके लिए स्टेकहोल्डर्स से भी बात हो रही है. उसके बाद डाटा कलेक्शन का काम होगा. अलग-अलग टैमप्लेट बनाकर डाटा कलेक्ट होगा. डाटा का वैलिडेशन होगा, तो कुल मिलाकर अभी बहुत काम होना है. हम अभी यह देख रहे हैं कि हमें क्या करना है और किस दिशा में करना है ताकि सही परिणाम सामने आये. केवल रिपोर्ट बनाकर सरकार को देना हमारा लक्ष्य नहीं है, हमारा टारगेट एक ऐसा रोडमैप तैयार करना है, जिसपर काम हो और सार्थक काम हो. इसके लिए हम विभिन्न एजेंसियों से बात कर रहे हैं क्योंकि कई लोग सामने आ रहे हैं, लेकिन सबकी विशेषज्ञता अलग-अलग क्षेत्रों में है.
जस्ट ट्रांजिशन के लिए फंड की क्या व्यवस्था है?
किसी भी काम को करने के लिए फंड की जरूरत होती है. जस्ट ट्रांजिशन के लिए भी फंड की जरूरत होगी. पैसा कहां से आयेगा यह बड़ा मुद्दा है. इसपर भी बात हो रही है. चूंकि कोयले पर निर्भरता कम होगी तो झारखंड जैसे राज्य के राजस्व में भी कमी आयेगी, ऐसे में जस्ट ट्रांजिशन के लिए राज्य की ओर से कितना फंड मिलेगा यह भी विचार करने वाली बात है. केंद्र की इसमें क्या भूमिका हो सकती है, निवेश को कैसे आमंत्रित किया जा सकता है इन तमाम बातों और संभावनाओं पर भी टाॅस्क फोर्स अपने सुझाव देगी. चूंकि झारखंड सरकार पहली ऐसी सरकार है जिसने जस्ट ट्रांजिशन के लिए टाॅस्क फोर्स का गठन किया है, इसलिए पूरे देश की नजर हम पर है. अगर हम कुछ बेहतर सुझाव दे पायें, तो निश्चित तौर पर वह हमारी उपलब्धि होगी. इसमें कोई दो राय नहीं है कि अगले पांच दशक में कोयला खदान बंद होंगे और हमें जस्ट ट्रांजिशन की जरूरत होगी.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
लेखक के बारे में
By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए










