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आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं हो सकता: सुप्रीम कोर्ट

Updated at : 10 Dec 2024 1:29 AM (IST)
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आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं हो सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता. शीर्ष अदालत कलकत्ता हाइकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी.

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बंगाल में ओबीसी आरक्षण के मामले में याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने की टिप्पणी

एजेंसियां/ संवाददाता, नयी दिल्ली/कोलकाता.

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता. शीर्ष अदालत कलकत्ता हाइकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. हाइकोर्ट ने 2010 से पश्चिम बंगाल में कई जातियों को दिये गये ओबीसी दर्जे को रद्द कर दिया था. हाइकोर्ट के 22 मई के फैसले को चुनौती देने वाली पश्चिम बंगाल सरकार की याचिका सहित दूसरी याचिकाएं जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ के सामने सुनवाई के लिए आयीं. जस्टिस गवई ने कहा: धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं हो सकता.

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने रखा राज्य सरकार का पक्ष: राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा: यह (आरक्षण) धर्म के आधार पर नहीं है.यह पिछड़ेपन के आधार पर है. हाइकोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए सिब्बल ने कहा कि अधिनियम के प्रावधानों को रद्द कर दिया गया है. उन्होंने कहा: इसलिए ये बहुत गंभीर मुद्दे हैं. यह उन हजारों छात्रों के अधिकारों को प्रभावित करता है, जो विश्वविद्यालयों में दाखिला पाने के इच्छुक हैं, जो लोग नौकरी चाहते हैं. इसलिए कपिल सिब्बल ने पीठ से कुछ अंतरिम आदेश पारित करने और हाइकोर्ट के आदेश पर एकतरफा रोक लगाने का आग्रह किया.

हाइकोर्ट ने पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा) (सेवाओं और पदों में रिक्तियों का रिजर्वेशन) अधिनियम, 2012 के तहत ओबीसी के रूप में 37 वर्गों दिये गये आरक्षण को भी रद्द कर दिया. सोमवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मामले में मौजूद वकीलों से मामले का अवलोकन करने को कहा. सात जनवरी को होगी अगली सुनवाई: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह सात जनवरी को और सुनवाई करेगा. इससे पहले पांच अगस्त को मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार से ओबीसी सूची में शामिल की गयी नयी जातियों के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में उनके अपर्याप्त प्रतिनिधित्व पर मात्रात्मक डेटा देने को कहा. हाइकोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की याचिका पर निजी वादियों को नोटिस जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य से एक हलफनामा दायर करने को कहा, जिसमें 37 जातियों, ज्यादातर मुस्लिम समूहों को ओबीसी सूची में शामिल करने से पहले उसके और राज्य के पिछड़ा वर्ग पैनल की तरफ से किये गये परामर्श, यदि कोई हो, का विवरण दिया गया हो.

क्या है मामला :

कलकत्ता हाइकोर्ट ने 2010 से पश्चिम बंगाल में कई जातियों को दिये गये अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के दर्जे को रद्द कर दिया था. कोर्ट ने सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों और राज्य संचालित शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले में उनके लिए आरक्षण को गैरकानूनी ठहराया था. अपने फैसले में, हाइकोर्ट ने कहा था: हकीकत में इन समुदायों को ओबीसी घोषित करने के लिए धर्म ही एकमात्र मानदंड प्रतीत होता है. हाइकोर्ट ने कहा था कि मुसलमानों के 77 वर्गों को पिछड़ा वर्ग के रूप में चुनना समग्र रूप से मुस्लिम समुदाय का अपमान है. राज्य के 2012 के आरक्षण कानून और 2010 में दिये गये रिजर्वेशन के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला लेते हुए हाइकोर्ट ने साफ किया था कि हटाये गये वर्गों के नागरिक, जो पहले से ही सेवा में थे या रिजर्वेशन का फायदा उठा चुके थे, या राज्य की किसी भी चयन प्रक्रिया में कामयाब हुए थे, उनकी सेवाएं इस फैसले से प्रभावित नहीं होंगी. हाइकोर्ट ने 77 वर्गों के आरक्षण को रद्द कर दिया .

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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