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हार्ट अटैक से होने वाली मौतों में भारत शीर्ष पर

Updated at : 24 Feb 2026 12:06 AM (IST)
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हार्ट अटैक से होने वाली मौतों में भारत शीर्ष पर

यह खुलासा बीएम बिरला हार्ट हॉस्पिटल की ‘बीट बाय बीट 2025’ रिपोर्ट में हुआ है.

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कोलकाता. दुनिया भर में हार्ट अटैक से होने वाली कुल मौतों में लगभग 20 प्रतिशत अकेले भारत में होती हैं. देश में कार्डियोवैस्कुलर (हृदय संबंधी) मौतों में पूर्वी भारत की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत है. यह खुलासा बीएम बिरला हार्ट हॉस्पिटल की ‘बीट बाय बीट 2025’ रिपोर्ट में हुआ है. यह रिपोर्ट हाल ही में सीके बिरला हॉस्पिटल्स के बीएम बिरला हार्ट हॉस्पिटल द्वारा जारी की गयी है, जिसमें भारत में हृदय रोग के बढ़ते बोझ पर विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, 190 से अधिक देशों में से अकेले भारत में हार्ट अटैक से होने वाली लगभग 20 प्रतिशत मौतें दर्ज की जाती हैं. यह आंकड़ा रोकथाम, समय पर जांच (डायग्नोसिस) और दीर्घकालिक कार्डियक केयर में गंभीर कमी की ओर संकेत करता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में कार्डियोवैस्कुलर बीमारी से होने वाली कुल मौतों में 30 प्रतिशत हिस्सेदारी पूर्वी भारत की है. अनुमान है कि इस क्षेत्र में हर 10 में से एक वयस्क किसी न किसी रूप में हृदय रोग से प्रभावित है. पश्चिम बंगाल में इस्केमिक हार्ट डिजीज का प्रसार राष्ट्रीय औसत से अधिक पाया गया है, जिससे यह क्षेत्र देश के कार्डियक बोझ का अहम केंद्र बन गया है. रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों के सबसे तेजी से बढ़ते वैश्विक हॉटस्पॉट के रूप में उभर रहे हैं. इस क्षेत्र में स्ट्रोक से होने वाली मौतों का अनुपात अधिक है. यहां बीमारी अपेक्षाकृत कम उम्र में शुरू होती है और प्रसार की तुलना में मृत्यु दर भी अधिक दर्ज की जाती है, जिसका मुख्य कारण समय पर उपचार न मिल पाना है. घनी आबादी और तेजी से शहरीकरण वाले क्षेत्रों में शुरुआती स्क्रीनिंग, ‘गोल्डन आवर’ के भीतर आपातकालीन उपचार और निरंतर कार्डियक प्रबंधन की व्यवस्था में कमी को भी रिपोर्ट ने रेखांकित किया है. ‘बीट बाय बीट 2025’ रिपोर्ट में नये और कम पहचाने गये जोखिम कारकों पर भी प्रकाश डाला गया है. क्रोनिक स्ट्रेस, सोशल आइसोलेशन, खराब नींद की आदतें और डिजिटल बर्नआउट जैसे लाइफस्टाइल व साइकोसोशल फैक्टर्स कम उम्र के कामकाजी वयस्कों में हृदय रोग का खतरा बढ़ा रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार, जो लोग सामाजिक अलगाव का सामना कर रहे हैं, उनमें कोरोनरी हार्ट डिजीज का जोखिम 15 प्रतिशत अधिक होता है. वहीं लंबे समय तक स्क्रीन पर काम, वर्क-फ्रॉम-होम संस्कृति और लगातार डिजिटल कनेक्टिविटी के कारण 2024 तक 72 प्रतिशत से अधिक शहरी पेशेवरों में क्रोनिक डिजिटल थकान की शिकायत देखी जा सकती है. 25 से 45 वर्ष आयु वर्ग में मानसिक तनाव, सर्कैडियन रिद्म में व्यवधान और लगातार दबाव के कारण ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव, तनाव-जनित एरिथमिया और शुरुआती कार्डियोवैस्कुलर स्ट्रेन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. रिपोर्ट के अंत में लक्षित प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी को बढ़ावा देने, “गोल्डन आवर” के भीतर त्वरित आपातकालीन उपचार उपलब्ध कराने और टियर-2 व टियर-3 शहरों में मजबूत कार्डियक इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की सिफारिश की गयी है. इन क्षेत्रों में डायग्नोसिस में देरी अधिक होती है और मरीज अक्सर गंभीर स्थिति में अस्पताल पहुंचते हैं. रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि यदि रोकथाम, समय पर पहचान और समुचित इलाज पर तत्काल ध्यान नहीं दिया गया, तो भारत में हृदय रोग का संकट और गहरा सकता है.

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GANESH MAHTO

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By GANESH MAHTO

GANESH MAHTO is a contributor at Prabhat Khabar.

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