शिल्पी कार्ड के लिए प्रशासन से लगायी गुहार, बुझे मन से घर लौट रहे ढाकी

Updated at : 22 Oct 2018 6:31 AM (IST)
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शिल्पी कार्ड के लिए प्रशासन से लगायी गुहार, बुझे मन से घर लौट रहे ढाकी

शिव कुमार राउत, कोलकाता : पिछले पांच दिनों से महानगर समेत समूचे राज्य में गूंजती ढम-ढम की थाप मां दुर्गा के विसर्जन के साथ ही थमने लगी है. इसे बजानेवाले ढाक कलाकार वापस अपने-अपने गांव की ओर लौट रहे हैं.हुगली, मुर्शिदाबाद, उत्तर व दक्षिण 24 परगना समेत अन्य जिलों से आये ये कलाकार सियालदह स्टेशन […]

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शिव कुमार राउत, कोलकाता : पिछले पांच दिनों से महानगर समेत समूचे राज्य में गूंजती ढम-ढम की थाप मां दुर्गा के विसर्जन के साथ ही थमने लगी है. इसे बजानेवाले ढाक कलाकार वापस अपने-अपने गांव की ओर लौट रहे हैं.हुगली, मुर्शिदाबाद, उत्तर व दक्षिण 24 परगना समेत अन्य जिलों से आये ये कलाकार सियालदह स्टेशन पर गाड़ी का इंतजार करते मिले.
ढाकी सुकांत मंडल से इस बार दुर्गा पूजा सेलिब्रेशन के बारे में बात करने पर उसने फीकी हंसी के साथ कहा : आमादेर जोनो एई पूजो सुदू एकटा अनुष्ठान ना रोजी-रोटी उत्सव आचे. अजीब विडंबना है इस देश की. ढाक के बिना बंगाल की दुर्गापूजा अधूरी मानी जाती है. और इस कला को हेरिटेज की श्रेणी में रखा गया है.
वहीं, इस परंपरा को संजो कर रखनेवाले लोग हाशिये पर हैं. इस बारे में दूसरे ढाक कलाकार कहते हैं कि परंपरा तो मात्र निभाने के लिए रह गयी है. अब देखिये ना जहां विश्वकर्मा पूजा से हमें ढाक बजाने का काम मिल जाता था, वह नहीं मिलता है. उस दौरान लोग इसका रिकाॅर्ड बजाकर ही पूजा करते हैं. अब दुर्गा पूजा ही हमारी कला को जीवित रखे हुए है.
पर बड़ी पूजा कमेटी में ही हमें ढाक बजाने को मिलता है. छोटी पूजा कमेटी रिकार्ड से ही काम चलाती हैं. क्या करें! पेट का सवाल है. हम कलाकार नहीं है, खेती- मजदूरी, राज मिस्त्री और रिक्शा चला कर अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं. पर महंगाई के इस युग में भरपेट रोटी भी नसीब नहीं हो पाती. पूजा ही हमारे लिए थोड़ी आमदनी या कहें बोनस का दिन है. लेकिन तासा, कुरकुरी और बैंजो के कारण हमें उतना काम नहीं मिल पाता. इस बार तो थोड़ा-बहुत ही कमा पाये हैं.
महिलाएं भी इस पेशे में शामिल
टीटागढ़ से आये हारू मंडल बताते हैं कि (दीदी) मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कहने पर हमारे घर की औरतें भी ढाक बजाने लगी हैं. पर स्थिति जस की तस है. हम तो सरकार की बात मान लेते हैं, पर हमारी बात कौन सुनेगा?
गौरतलब है कि इस हेरिटेज कला को बचाये रखने के लिए राज्य सरकार के वेलफेयर डिपार्टमेंट की ओर से वर्ष 2012 से एक विशेष योजना चलायी जा रही है. इसके तहत ब्लॉक व नगर निकाय स्तर पर आमलोगों को सरकार की विभिन्न योजनाओं से अवगत कराने लिए इन ढाकियों को नियुक्त करने की बात थी.
गांव-गांव जाकर इन्हें सरकार की विभिन्न योजनाओं की घोषणा करनी होगी. इस योजना के तहत ढाकी को पारिश्रमिक के तौर पर हर माह दो हजार रुपये देने की घोषणा हुई थी. लेकिन छह साल बाद भी राज्य के सभी ढाकी इस योजना के अंतर्गत अपना पंजीकरण नहीं करवा सके हैं. जिनका पंजीकरण हुआ है, उन्हें हर माह मात्र एक हजार रुपये ही मिल रहे हैं.
मुर्शिदाबाद जिले के हीरा दास ने बताया कि बहरामपुर नगर निगम की ओर से हमें यह कार्ड मिला है. इससे हमें हर महीने एक हजार रुपये मिलते हैं. महीने के 10 दिन हम सभा-सम्मेलन के दौरान ढाक बजाते हैं और गांव-गांव घूम कर मुनादी भी करते हैं. इस काम के एवज में एक हजार रुपया मिलता है. पर क्या आज के दिन इतने पैसे से कुछ होता है?
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