ममता बनर्जी की नौकरी बचाने वाला पूर्व कांस्टेबल नौकरी को मोहताज, गली-गली में लगा रहा है फेरी
Updated at : 23 Jul 2018 2:25 AM (IST)
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कोलकाता : मुख्यमंत्री की जान बचानेवाला आज नौकरी को मोहताज है. कभी राज्य सरकार का मुलाजिम रहा यह शख्स, अपने परिवार का पेट पालने के लिए साइकिल पर सवार होकर गली-गली फेरी लगा रहा है.पुलिस का पूर्व जवान और आज के इस फेरीवाले का नाम सिराजुल इस्लाम है. सिराजुल चाहते हैं कि उसकी खोयी नौकरी […]
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कोलकाता : मुख्यमंत्री की जान बचानेवाला आज नौकरी को मोहताज है. कभी राज्य सरकार का मुलाजिम रहा यह शख्स, अपने परिवार का पेट पालने के लिए साइकिल पर सवार होकर गली-गली फेरी लगा रहा है.पुलिस का पूर्व जवान और आज के इस फेरीवाले का नाम सिराजुल इस्लाम है. सिराजुल चाहते हैं कि उसकी खोयी नौकरी उन्हें वापस मिले और वह मुख्यमंत्री की सुरक्षा में मुस्तैदी से तैनात रहें. हालांकि उनकी यह गुहार अभी तक सुनी नहीं गयी है.
अलबत्ता केंद्रीय शहरी विकास मंत्री फिरहाद हकीम ने उन्हें भरोसा दिया है कि वह आवश्यक कागजात लेकर सोमवार को उनके दफ्तर में मिलें. उनसे जो बन पड़ेगा, वह करेंगे. परिवार पालने के लिए वह साइकिल से किराने का सामान लेकर फेरी करते हैं. इस बीच, लोगों के कहने पर वह कालीघाट स्थित ममता बनर्जी के घर मिलने गये थे. लेकिन उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री से नहीं हो पायी.
अलबत्ता पुलिस के अधिकारियों की मदद से वह फिरहाद हकीम से मिले और अपनी आर्थिक हालत का ब्योरा देते हुए फिर से नौकरी वापस देने की गुहार लगायी. सिराजुल के परिवार में फिलाहल अपने मां-बाप, भाई और बहन के साथ मुश्किल से जीवन गुजार रहे हैं. उत्तर 24 परगना के इच्छापुर के इस पूर्व कांस्टेबल की इच्छा है कि वह फिर से नौकरी पर तैनात हों और मुख्यमंत्री की सुरक्षा में अपनी बाकी की जिंदगी गुजारे.
लाठीचार्ज का आदेश देनेवाले अधिकारी पर तान दी थी बंदूक
घटना की शुरुआत आज से 25 साल पहले उस वक्त हुई, जब ममता बनर्जी ने युवा कांग्रेस के परचम तले राइर्ट्स अभियान शुरू किया था. 21 जुलाई 1993 को सिराजुल इस्लाम ब्रेबोर्न रोड पर तैनात थे. 19 जनवरी 1993 को उन्हें पुलिस की नौकरी मिली थी. युवा कांग्रेस का जुलूस उस वक्त जा रहा था. पुलिस ने जुलूस को रोक दिया था. इस बात को लेकर आंदोलनकारियों के साथ पुलिस का वाद-विवाद शुरू हो गया था. पुलिस ने उस वक्त लाठी बरसानी शुरू कर दी थी. उस दौरान ममता बनर्जी का सिर फट गया था.
खून भी बहने लगा था. इसे देखकर वहां तैनात पुलिस के जवान विरोध करने लगे थे. इसका विरोध उस वक्त स्पेशल ब्रांच के एसआइ निर्मल विश्वास, सर्जेंट प्रदीप सरकार व कांस्टेबल सिराजुल इस्लाम ने किया था. ममता को बचाने के लिए उस वक्त लाठीचार्ज का आदेश देनेवाले अधिकारी पर सिराजुल ने बंदूक तान दी थी. ममता को बचाने के लिए पुलिस के तीनों जवानों को बर्खास्त कर दिया गया था. बर्खास्त करने के पहले तीनों को मानसिक रूप से काफी प्रताड़ित किया गया था.
18 साल की कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद निर्मल विश्वास को उनकी नौकरी मिली. वहीं, सर्जेंट प्रदीप सरकार को बिना पदोन्नति के ही अवकाश लेना पड़ा. लेकिन सिराजुल इस्लाम का मामला हाइकोर्ट में था जिसे वह पैसों के अभाव में नहीं लड़ पाये और आज फेरी करके जीवन गुजार रहे हैं. सिराजुल शुरू से ही माकपा विरोधी थे. इसलिए ममता बनर्जी के प्रति उनका लगाव था, जो 21 जुलाई के दिन उन पर हुए हमले के समय खुलकर सामने आ गया. जिसकी वजह से नौकरी में लापरवाही बरतने और अधिकारी के साथ बदसलूकी करने के जुर्म में उन्हें अपनी नौकरी गंवानी पड़ी.
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