सिंगूर के साये से निकलकर क्या बंगाल बन रहा है भारत का नया आर्थिक गेटवे?

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West Bengal CM Suvendu Adhikari

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एक समय टाटा नैनो की फैक्ट्री के बंगाल से गुजरात जाने को राज्य की औद्योगिक छवि पर बड़ा धक्का माना गया था. लेकिन आज उसी बंगाल में कहानी कुछ बदलती हुई दिखाई दे रही है. खाड़ी देशों की पूंजी, समुद्र के भीतर बिछती हजारों करोड़ की केबल, प्रस्तावित डीप-सी पोर्ट और हुगली किनारे बनते आधुनिक युद्धपोत- क्या ये सब मिलकर बंगाल की एक नई आर्थिक कहानी लिख रहे हैं?

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जिस बंगाल को लंबे समय तक औद्योगिक पलायन, राजनीतिक अस्थिरता और सिंगूर के विवाद के चश्मे से देखा गया, पर क्या वह अब धीरे-धीरे ईस्टर्न इंडिया का नया आर्थिक गेटवे बनने की दिशा में बढ़ रहा है?

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निवेश की संभावनाएं हैं, लेकिन कई परियोजनाएं वर्षों से अटकी हुई हैं.

आधुनिक उद्योग मौजूद हैं, लेकिन रोजगार के लिए बड़ी संख्या में लोग राज्य से बाहर जाते हैं. जमीन और बुनियादी ढांचे की क्षमता है, लेकिन निवेशकों के लिए गति और नीति की निश्चितता भी उतनी ही जरूरी है.

तो आखिर बंगाल में ऐसा क्या बदल रहा है कि खाड़ी के निवेशकों से लेकर वैश्विक लॉजिस्टिक्स और टेक कंपनियों तक की नजर इस राज्य पर पड़ रही है?

खाड़ी देशों को बंगाल में क्या चाहिए?

इस कहानी को समझने के लिए सबसे पहले West Asia की तरफ देखना होगा.

UAE, Qatar और Saudi Arab जैसे देश आर्थिक रूप से बेहद समृद्ध हैं, लेकिन उनकी एक बुनियादी कमजोरी है- खाद्य सुरक्षा.

रेगिस्तानी भूगोल के कारण इन देशों को अपनी खाद्य जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करना पड़ता है. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक खाद्य और गेहूं की कीमतों में आई उथल-पुथल ने खाड़ी देशों को यह समझाया कि खाद्य आपूर्ति सिर्फ व्यापार का विषय नहीं, बल्कि रणनीतिक सुरक्षा का मामला भी है.

Middle East Map
Middle East Map

अब इसके सामने पश्चिम बंगाल को रखिए.

Ganga-Brahmaputra Delta का उपजाऊ इलाका, विशाल कृषि उत्पादन, सब्जियों और खाद्य उत्पादों की उपलब्धता और पूर्वी भारत की भौगोलिक स्थिति- ये सब बंगाल को एक संभावित फूड सप्लाई हब बनाते हैं.

यही वजह है कि खाड़ी क्षेत्र की कंपनियां सिर्फ उत्पाद खरीदने की नहीं, बल्कि पूरी सप्लाई चेन में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं.

यूएई का लुलु ग्रुप हो या डीपी वर्ल्ड जैसी लॉजिस्टिक्स कंपनियां- इनकी दिलचस्पी को सिर्फ निवेश के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। असल कहानी है:

खेत → प्रोसेसिंग → लॉजिस्टिक्स → पोर्ट → निर्यात → खाड़ी का बाजार

अगर यह चक्र मजबूत होता है तो बंगाल सिर्फ अपने लिए उत्पादन करने वाला राज्य नहीं रहेगा. वह पूर्वी भारत को वैश्विक बाजार से जोड़ने वाली कड़ी बन सकता है.

समुद्र के नीचे बिछ रही है नई डिजिटल सड़क

लेकिन बंगाल की नई कहानी सिर्फ खेती और बंदरगाह तक सीमित नहीं है.

Digha को आम तौर पर समुद्र तट और पर्यटन के लिए जाना जाता है. लेकिन समुद्र के नीचे बिछने वाली केबलों की वजह से इसका महत्व आने वाले वर्षों में काफी अलग हो सकता है.

दिघा में करीब 1,600 करोड़ रुपये की लागत से सबमरीन केबल लैंडिंग स्टेशन की योजना है. इसका उद्देश्य पूर्वी भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया के डिजिटल नेटवर्क से बेहतर तरीके से जोड़ना है.

इंटरनेट की दुनिया में ये केबल उतनी ही महत्वपूर्ण हैं, जितनी किसी शहर के लिए सड़कें और रेल लाइनें.

आज वैश्विक डेटा का बड़ा हिस्सा समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबलों से गुजरता है. इसलिए किसी इलाके में बेहतर केबल कनेक्टिविटी का मतलब सिर्फ तेज इंटरनेट नहीं है. इसका संबंध डेटा सेंटर, क्लाउड कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल सेवाओं से भी है.

कोलकाता के New Town में प्रस्तावित और विकसित हो रहा बंगाल सिलिकॉन वैली क्षेत्र इसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है.

फोटोे- एआई जेनेरेटेड.
फोटोे- एआई जेनेरेटेड.

अगर सबमरीन केबल, डेटा सेंटर और टेक कंपनियां एक साथ विकसित होती हैं तो पूर्वी भारत के लिए एक नया डिजिटल इकोसिस्टम तैयार हो सकता है.

इसे इस तरह समझिए—21वीं सदी में डेटा वही रणनीतिक संसाधन बनता जा रहा है, जो पिछली सदी में तेल था.

और बंगाल अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण उस डिजिटल नेटवर्क का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन सकता है.

लेकिन असली अड़चन समुद्र में है

यहीं से बंगाल की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है.

बंगाल के पास समुद्र है. कोलकाता एक ऐतिहासिक बंदरगाह शहर है. पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत का विशाल बाजार उसके आसपास है. लेकिन कोलकाता पोर्ट की भौगोलिक सीमाएं भी हैं.

हुगली नदी के चैनल की गहराई और सिल्टेशन के कारण बड़े कंटेनर जहाजों के लिए सीधे कोलकाता तक पहुंचना हमेशा आसान नहीं रहा है.

नतीजा यह होता है कि माल को छोटे जहाजों से दूसरे बड़े ट्रांसशिपमेंट पोर्ट तक ले जाना पड़ता है. इससे समय और लागत दोनों बढ़ते हैं.

यही वजह है कि ताजपुर डीप-सी पोर्ट की अवधारणा महत्वपूर्ण मानी गई.

पूर्वी मेदिनीपुर के तट पर प्रस्तावित यह ग्रीनफील्ड पोर्ट लगभग 18 मीटर के प्राकृतिक ड्राफ्ट की क्षमता के साथ बड़े जहाजों को आकर्षित करने की संभावना रखता है.

परियोजना का आकार भी बड़ा है- करीब 25,000 करोड़ रुपये के निवेश और हजारों प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार की संभावनाएं इससे जोड़ी गई हैं.

अगर यह परियोजना जमीन पर उतरती है तो इसका असर सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा.

बिहार, झारखंड, उत्तर-पूर्व और यहां तक कि नेपाल-भूटान के व्यापार के लिए भी बंगाल एक महत्वपूर्ण समुद्री प्रवेशद्वार बन सकता है.

लेकिन यही वह जगह है जहां बंगाल की सबसे बड़ी समस्या सामने आती है- परियोजना की घोषणा और परियोजना के जमीन पर उतरने के बीच का लंबा अंतराल.

Photo: AI Generated
Photo: AI Generated

ताजपुर पोर्ट की योजना वर्षों पुरानी है. टेंडर, बोली और परियोजना की प्रगति कई चरणों से गुजर चुकी है, लेकिन जमीन पर निर्माण की रफ्तार उम्मीद के मुताबिक नहीं रही.

यही देरी निवेशकों को सबसे ज्यादा परेशान कर सकती है.

बंगाल में उद्योग खत्म हुआ या बदल गया?

बंगाल की औद्योगिक कहानी को सिर्फ बंद कारखानों और पलायन से समझना भी अधूरा होगा.

हुगली के किनारे स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स यानी GRSE इसका एक बड़ा उदाहरण है.

कोलकाता स्थित यह कंपनी भारतीय नौसेना के आधुनिक युद्धपोतों, एंटी-सबमरीन वारफेयर जहाजों और अन्य पोतों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है.

यानी एक तरफ बंगाल से उद्योगों के पलायन की कहानी है, दूसरी तरफ उसी राज्य में भारत के सामरिक समुद्री ढांचे के लिए महत्वपूर्ण जहाज बनाए जा रहे हैं.

यह सिर्फ रोजगार का मामला नहीं है. यह रक्षा आत्मनिर्भरता और रणनीतिक क्षमता से भी जुड़ा हुआ है.

भारत जब समुद्री सुरक्षा पर अपना फोकस बढ़ा रहा है, हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा दे रहा है, तब कोलकाता की शिपबिल्डिंग क्षमता का महत्व और बढ़ सकता है.

इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि बंगाल में उद्योग हैं या नहीं.

सवाल यह है कि बंगाल के पास मौजूद औद्योगिक क्षमता को क्या वह नए दौर की अर्थव्यवस्था से जोड़ पा रहा है?

सबसे बड़ा विरोधाभास: उद्योग बनाम रोजगार

और फिर आता है बंगाल का सबसे कठिन सवाल.

अगर राज्य के पास कृषि है, बंदरगाह हैं, टेक क्षमता है और रक्षा उत्पादन की मजबूत परंपरा है, तो फिर बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए बाहर क्यों जाते हैं?

मुंबई, दिल्ली, गुजरात, केरल और दूसरे राज्यों में काम करने वाले बंगाल के प्रवासी मजदूर इस विरोधाभास की तस्वीर पेश करते हैं.

एक तरफ बंगाल वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी जगह तलाश रहा है, दूसरी तरफ उसके अपने श्रमिक बेहतर रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख कर रहे हैं.

यही वह बिंदु है जहां बंगाल की तुलना कतर या खाड़ी के दूसरे देशों से करना दिलचस्प हो जाती है.

कतर ने अपनी विशाल संपत्ति से आधुनिक बुनियादी ढांचा खड़ा किया और उसके निर्माण में बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिकों ने भूमिका निभाई.

बंगाल के सामने चुनौती अलग है.

यहां संसाधन और मानव पूंजी दोनों हैं, लेकिन चुनौती यह है कि क्या राज्य अपने लोगों के लिए पर्याप्त उत्पादक रोजगार पैदा कर सकता है?

क्योंकि किसी भी आर्थिक मॉडल की अंतिम सफलता सिर्फ निवेश से नहीं मापी जाती.

वह इस बात से मापी जाती है कि उस निवेश से स्थानीय लोगों की आय और अवसर कितने बढ़े.

सिंगूर का भूत अभी पूरी तरह गया नहीं है

बंगाल की औद्योगिक कहानी में सिंगूर का अध्याय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि टाटा नैनो परियोजना का राज्य से गुजरात जाना निवेशकों के लिए एक बड़ा प्रतीक बन गया.

उस घटना ने यह धारणा मजबूत की कि बंगाल में जमीन अधिग्रहण, राजनीतिक विरोध और औद्योगिक परियोजनाओं को लेकर जोखिम अधिक है.

आज भी जब कोई बड़ी कंपनी किसी राज्य में निवेश का फैसला करती है तो वह केवल जमीन और श्रम की लागत नहीं देखती.

वह देखती है-

नीति कितनी स्थिर है? परियोजना कितनी तेजी से आगे बढ़ेगी? अनुमतियां कितनी जल्दी मिलेंगी? स्थानीय प्रशासन कितना सहयोग करेगा? और सबसे महत्वपूर्ण- क्या निवेश लंबे समय तक सुरक्षित रहेगा?

यही कारण है कि बंगाल के सामने केवल नई घोषणाएं करने की चुनौती नहीं है.

उसे निवेशकों को यह भरोसा भी देना होगा कि सिंगूर जैसी कहानी दोबारा नहीं दोहराई जाएगी.

दिघा की केबल, ताजपुर का पोर्ट, न्यू टाउन का डेटा इकोसिस्टम और हुगली के युद्धपोत उसे एक नया अवसर दे रहे हैं.

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अब फैसला इस बात से होगा कि बंगाल इन अवसरों को कितनी तेजी से पकड़ता है.

क्योंकि वैश्विक पूंजी इंतजार नहीं करती.

वह वहां जाती है जहां उसे बाजार, बुनियादी ढांचा और सबसे बढ़कर—गति और भरोसा—मिलता है.

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