BSP का राष्ट्रीय दर्जा संकट में! विधानसभा के बाद संसद में भी शून्य होगी मायावती की पार्टी, यूपी चुनाव 2027 से पहले क्या होगी चुनौती?
विधानसभा में 206 सीटों से शून्य तक पहुंची बीएसपी
UP Politics: बहुजन समाज पार्टी (BSP) राजनीतिक संकट से जूझ रही है. संसद और विधानसभा में शून्य प्रतिनिधित्व के साथ राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी दांव पर लगा है. 2027 चुनाव से पहले पार्टी के सामने अस्तित्व की लड़ाई है.
UP Politics: बहुजन समाज पार्टी (BSP) के लिए सियासी संकट गहराता जा रहा है. लोकसभा में पार्टी पहले ही शून्य पर है और 25 नवंबर के बाद राज्यसभा में भी उसका कोई सांसद नहीं रहेगा. BSP के इकलौते राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल 25 नवंबर को खत्म हो रहा है. इसके बाद 1989 में संसद पहुंचने के बाद यह पहली बार होगा, जब BSP दोनों सदनों में पूरी तरह गैर-मौजूद होगी.
यूपी विधानसभा में भी नहीं बचा कोई विधायक
BSP की मुश्किलें संसद से आगे भी बढ़ चुकी हैं. 403 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा में अब पार्टी का एक भी विधायक नहीं है. अगस्त में बलिया की रसड़ा सीट से तीन बार के विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद विधानसभा में BSP का प्रतिनिधित्व पूरी तरह खत्म हो गया. ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मायावती के सामने पार्टी के राजनीतिक आधार को बचाने की बड़ी चुनौती है.
206 सीटों से शून्य तक पहुंची पार्टी
कभी उत्तर प्रदेश की सत्ता पर मजबूत पकड़ रखने वाली BSP के पतन का बड़ा दौर 2012 के विधानसभा चुनाव से शुरू माना जाता है. 2007 में पार्टी ने 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था और मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बनी थीं. लेकिन 2012 में BSP की सीटें घटकर 80 रह गईं और सत्ता हाथ से निकल गई. इसके बाद विधानसभा में पार्टी का प्रभाव लगातार कमजोर होता गया.
2014 के बाद लोकसभा में भी लगा बड़ा झटका
राष्ट्रीय स्तर पर BSP की स्थिति 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद और कमजोर हुई. 2009 में पार्टी ने 21 लोकसभा सीटें जीती थीं और उसे 6.17 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन 2014 में वह एक भी सीट नहीं जीत सकी. 2019 में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के साथ गठबंधन कर BSP ने 10 सीटें जीतीं, लेकिन 2024 में NDA और INDIA दोनों से अलग रहकर चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी का खाता नहीं खुला और वोट शेयर घटकर 2.06 फीसदी रह गया.
कोर वोट बैंक पर भी बढ़ी चुनौती
लगातार चुनावी गिरावट के बीच BSP के पारंपरिक दलित वोट बैंक को लेकर भी चर्चा तेज है. उत्तर प्रदेश में SC आबादी करीब 21 फीसदी मानी जाती है, जिसमें जाटव समुदाय की हिस्सेदारी 54 फीसदी से अधिक होने का अनुमान है. 2027 से पहले बीजेपी, समाजवादी पार्टी और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) की नजर दलित वोटों पर है. खासकर गैर-जाटव दलितों को जोड़ने की कोशिशों के बीच BSP के सामने अपना पारंपरिक आधार बनाए रखने की चुनौती है.
अब राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बचाने की भी चुनौती
BSP के सामने संसद और विधानसभा में वापसी के साथ राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बचाए रखने का सवाल भी है. चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए निर्धारित मानदंडों में से कम से कम एक पूरा करना जरूरी है. इनमें चार या अधिक राज्यों में 6 फीसदी वोट और कम से कम चार सांसद, लोकसभा की कम से कम 2 फीसदी सीटें तीन राज्यों से जीतना या कम से कम चार राज्यों में राज्य पार्टी की मान्यता हासिल करना शामिल है. ऐसे में 2027 का यूपी चुनाव BSP के लिए सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक अस्तित्व और राष्ट्रीय पहचान को बनाए रखने की भी बड़ी परीक्षा होगा. यह भी देखें: UP Election 2027: बसपा ने सुल्तानपुर में खोला पत्ता, अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति के बीच किसे बनाया प्रत्याशी, ऐलान से बढ़ी सियासी हलचल
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