वाराणसी का ज्ञानवापी परिसर मंदिर है या मस्जिद? चौंकाने वाली है BHU के प्रोफेसर की रिसर्च, पढ़ें रिपोर्ट
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 11 May 2022 2:28 PM
कई इतिहासकारों ने काशी विश्वनाथ मंदिर के आक्रमण और मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाए जाने का जिक्र अपनी किताबों में किया है, जिसको लेकर हमने इतिहास विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर राजीव श्रीवास्तव से बातचीत की. बीएचयू इतिहास विभाग के प्रोफेसर राजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि...
Varanasi News: वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद परिसर को लेकर लंबे समय से प्रश्न उठ रहा है कि यह मंदिर है या मस्जिद. दरअसल हिंदू पक्ष के वकील का दावा है कि मस्जिद परिसर में हिंदू देवी-देवताओं के प्रतीक चिह्न मिले हैं, और इससे संबंधित क़ई साक्ष्य और अभिलेख भी कोर्ट में उपलब्ध कराए गए हैं, लेकिन अभी तक फैसला नहीं हो सका है.
कई इतिहासकारों ने काशी विश्वनाथ मंदिर के आक्रमण और मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाए जाने का जिक्र अपनी किताबों में किया है, जिसको लेकर हमने इतिहास विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर राजीव श्रीवास्तव से बातचीत की. बीएचयू इतिहास विभाग के प्रोफेसर राजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि पहली बात तो वह मस्जिद है ही नहीं क्योंकि दुनिया में किसी भी मस्जिद का नाम ज्ञानवापी नहीं हो सकता. इसके पीछे का कारण है कि ज्ञानवापी संस्कृत का शब्द है, और मस्जिद का नाम संस्कृत में भला कैसे हो सकता है. ज्ञान का अर्थ है ‘ज्ञान’ वापी का अर्थ है ‘कुंवाट. काशी विश्वनाथ का मंदिर ज्ञान का कुंआ है.
इसलिए उस स्थान का नाम ज्ञानवापी पड़ा है, क्योंकि वहां पर वैदिक शिक्षा लेने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे. हजारों साल पहले वहां पर काशी विश्वनाथ मन्दिर स्थापित था. यहां 3 से 4 बार आक्रमण हो चुका है. पहली बार 1194 में मोहम्मद गोरी ने इस मंदिर पर आक्रमण कर तोड़ दिया. बाद में काशीवासियों ने इसे निर्मित कराया. इसके बाद जौनपुर के शासक महमूद शाह ने इसे तोड़ दिया. उसको भी बाद में बनवा लिया गया. इसके बाद सबसे ज्यादा बुरी तरह से औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़ा और 1669 में यहां मस्जिद बनवा दी, मगर मन्दिर को वह पूरी तरह से नहीं तोड़ पाया.
कारण ये था कि यहां पर जो तहखाना स्थित है, जिसे मस्जिद में अब होने की बात की जा रही है. वहां सैकड़ों शिवलिंग स्थित थे. इसके पीछे का कारण ये था कि जितने भी राजा-महाराजा आते थे. उनकी मन्नत पूरी होती थी तो वो वहां शिवलिंग स्थापित करके जाते थे. इस प्रकार वहां सैकड़ों शिवलिंग स्थापित हो चुके थे. ध्यान देने वाली बात ये है कि नन्दी का मुख जिधर होगा उधर ही शिवलिंग होगा. नन्दी जितने बडे होंगे उससे एक या दो फुट की ऊंचाई पर शिवलिंग होगा. नन्दी इस वक्त 4 से 5 फुट के हैं, तो निश्चित तौर पर शिवलिंग 6 से 7 फुट का होगा, और वो शिवलिंग आज भी गर्भगृह में मौजूद है.
वरिष्ठ प्रोफेसर राजीव श्रीवास्तव से ने कहा कि, कुरान में स्पष्ट लिखा है कि जहां पर विवाद है वहां पर नमाज नहीं पढ़ सकते. दूसरी बात जहां मूर्ति पूजा होती हैं, वहां नमाज नहीं पढ़ना चाहिए. मुसलमान सिर्फ़ जिद में आकर हिंदुओं के सबसे पवित्र स्थान पर कब्जा करने के लिए नमाज पढ़ कर पाप कर रहे हैं. मस्जिद में कलाकृतियां नहीं बन सकती, क्योंकि मस्जिद में किसी भी प्रकार का चित्र जायज नहीं है.
साकीद मुस्तयिक खां औरंगजेब के समय का इतिहासकार है. उसने सब कुछ अपनी आंखों से देखा था. उसने एक किताब लिखी ‘मसीरे आलमगीरी’ इसमे स्पष्ट रूप से लिखा है कि औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण करा दिया है. उस समय इतिहासकार ये किताब इसलिए लिखते थे कि लोग जाने की औरंगजेब कितना बहादुर और इस्लाम का कट्टर शासक था, और हिंदुओं के पवित्र स्थान को तोड़कर उसने इस्लाम की विजय पताका फहरा दी.
यह किताब अभी भी कोलकाता संग्रहालय में सुरक्षित रखी हुई है. शाहजहां ने जब काशी विश्वनाथ मंदिर पर आक्रमण किया तो उस वक्त काशीवासियों से भयंकर युद्ध हुआ था. हाथियों के द्वारा शाहजहां ने मन्दिर के ऊपरी भाग को तोड़ा और ऊपर मस्जिद का गुम्बद बना दिया. उस वक्त काशी का नाम परिवर्तित कर औरंगजेब ने औरंगाबाद कर दिया.
रिपोर्ट- विपिन सिंह
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar News Desk
यह प्रभात खबर का न्यूज डेस्क है। इसमें बिहार-झारखंड-ओडिशा-दिल्ली समेत प्रभात खबर के विशाल ग्राउंड नेटवर्क के रिपोर्ट्स के जरिए भेजी खबरों का प्रकाशन होता है।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए










