Azadi ka Amrit Mahotsav: प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के गवाह बूढ़ा बरगद पर 133 क्रांतिकारियों को हुई थी फांसी

बूढ़ा बरगद का पेड़ गवाह है 1857 की उस क्रांति का जो कानपुर में ज्वालामुखी बनकर भड़की थी. कैसे भारत माता के वीर सपूतों का खून खौला था. यह सिर्फ प्रत्यक्षदर्शी ही नहीं, भुक्तभोगी भी है. इस बूढ़े बरगद के पेड़ की मजबूत टहनियों पर 4 जून, 1857 को एक साथ 133 क्रांतिकारियों को फांसी पर लटका दिया गया था.
Azadi ka Amrit Mahotsav In Kanpur: यह कानपुर का बूढ़ा बरगद है. इसकी जड़ों में पानी नहीं आजादी के मतवालों का खून है. आंसू हैं. टहनियां बेशक सूख चुकी हैं लेकिन जख्म अब तक हरे हैं. दरअसल, यह बरगद का पेड़ गवाह है 1857 की उस क्रांति का जो क्रांति भूमि कानपुर में ज्वालामुखी बनकर भड़की थी. कैसे भारत माता के वीर सपूतों का खून खौला था. यह सिर्फ प्रत्यक्षदर्शी ही नहीं, भुक्तभोगी भी है अंग्रेजी हुकूमत के आतंक का. इस बूढ़े बरगद के पेड़ की मजबूत टहनियों पर 4 जून, 1857 को एक साथ 133 क्रांतिकारियों को फांसी पर लटका दिया गया था.
सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन का गवाह यह बूढ़ा बरगद आज भी नानाराव पार्क में है. बूढ़े बरगद को लेकर इतिहासकार बताते हैं कि वर्ष 1857 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ 1857 विद्रोह की ज्वाला भड़की, जो कानपुर तक पहुंच गई. कानपुर के क्रांतिकारी देश को आजाद कराने का संकल्प ले चुके थे. उनसे घबराकर अंग्रेजों ने कानपुर छोड़ने का फैसला किया था. 27 जून, 1857 को सैकड़ों अंग्रेज अपने परिवार के साथ समझौते के लिए सत्तीचौरा घाट से नावों में सवार होकर इलाहाबाद के लिए रवाना हो रहे थे तभी तात्या टोपे, बाजीराव पेशवा और अजीमुल्ला खां भी वहां पर मौजूद थे. नानाराव पेशवा करीब दो किलोमीटर दूर थे. उसी दौरान गलतफहमी में कुछ अंग्रेजी अफसरों ने गोलियां चला दीं, जो कई क्रांतिकारियों को लग गईं. इसके जवाब में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों पर हमला बोल दिया था. इसमें करीब 250 से अधिक अंग्रेज मारे गए थे.
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क्रांतिकारी अंग्रेज अफसर और सैनिकों को मौत के घाट उतारने के बाद महिलाओं की तरफ बढ़े तो नानाराव पेशवा ने उन्हें रोक कर अंग्रेज महिला-बच्चों को बंदी बनाकर सुरक्षित बीबीघर (वर्तमान में नानाराव पार्क और तत्कालीन कंपनी बाग) भेज दिया था. बीबीघर एक अंग्रेजी अफसर का बंगला था. यहां बंदी अंग्रेज महिला-बच्चों की जिम्मेदारी हुसैनी खानम नाम की महिला को दी गई. इतिहासकार बताते हैं कि जुलाई में अंग्रेजी सेना फिर कानपुर में प्रवेश कर गई और क्रांतिकारियों को मारना शुरू कर दिया. कहा जाता है कि हुसैनी खानम ने 16-17 जुलाई की आधी रात को गंगू, इतवरिया और एक जल्लाद को बुलाकर लगभग 125 बंदी महिला-बच्चों की हत्या करवा दी और लाशें पास के कुएं में फेंकवा दीं. उस कुएं को पाट दिया गया.
सत्तीचौरा और बीबीघर कांड की गूंज इंग्लैंड तक गूंज गई. इलाहाबाद छावनी से अंग्रेजों की और सेना भेजी गई और क्रांतिकारियों की धरपकड़ शुरू कर दी गई. आम लोगों को भी सताया जाने लगा. हत्याएं की जाने लगीं. तमाम बागियों को फांसी पर लटकाया गया. विद्रोह को दबाने और कानपुर पर फिर से कब्जा करने के लिए कई दिनों तक ये सिलसिला चलता रहा था.
Also Read: Azadi ka Amrit Mahotsav: अमृत महोत्सव में कानपुर के 75 गांव में लगेगा शिविर, 1 लाख लोगों का होगा चेकअपसत्तीचौरा और बीबीघर कांड के बाद अंग्रेज बुरी तरह बौखला गए थे. भारतीयों पर जुल्म बढ़ा दिए गए और क्रांतिकारियों की धरपकड़ की जाने लगी. इस दौरान अंग्रेजों ने कई क्रांतिकारियों को पकड़ा और उन्हें फांसी की सजा दी गई. किसी को गोली मार दी गई थी. इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि 133 क्रांतिकारी ऐसे रहे, जिन्हें बरगद के पेड़ पर एक साथ लटकाकर फांसी दी गई.
रिपोर्ट : आयुष तिवारी
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By Prabhat Khabar News Desk
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