‘जगन्नाथो लोकनाथो नीलाद्रीश: परो हरि: ...’

Updated at : 21 Jun 2017 4:44 AM (IST)
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‘जगन्नाथो लोकनाथो नीलाद्रीश: परो हरि: ...’

दो दिनों में सफर तय कर मौसीबाड़ी पहुंचेंगे प्रभु जगन्नाथ ओड़िशा के ढेंकानाल से सरायकेला आयी थी प्रभु की प्रतिमा सरायकेला/खरसावां : सरायकेला में रथ यात्रा की तैयारियां शुरू हो गयी हैं. याद रहे कि यहां करीब साढ़े तीन सौ साल से रथ यात्रा का आयोजन होता आ रहा है. सरायकेला में प्रभु जगन्नाथ मंदिर […]

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दो दिनों में सफर तय कर मौसीबाड़ी पहुंचेंगे प्रभु जगन्नाथ

ओड़िशा के ढेंकानाल से सरायकेला आयी थी प्रभु की प्रतिमा
सरायकेला/खरसावां : सरायकेला में रथ यात्रा की तैयारियां शुरू हो गयी हैं. याद रहे कि यहां करीब साढ़े तीन सौ साल से रथ यात्रा का आयोजन होता आ रहा है. सरायकेला में प्रभु जगन्नाथ मंदिर की स्थापना के संबंध में कहा जाता है कि महापात्र परिवार ने ओड़िशा के ढेंकानाल से प्रभु जगन्नाथ की प्रतिमा ला कर यहां स्थापित किया था. तभी से यहां रथ यात्रा आयोजित होती आ रही है. सरायकेला में जगन्नाथ मंदिर की स्थापना के संबंध में कहा जाता है कि सरायकेला के राजा उदित नारायण सिंहदेव ने अपने शासन काल में यहां भव्य मंदिर का निर्माण कराया तथा रथ यात्र उत्सव को क्षेत्र में एक अलग दिलायी.
यहां मंदिर की दीवारों में बनीं भगवान विष्णु के दशावतार की मूर्तियां किसी को भी आकर्षित कर लेने में सक्षम हैं.मौसीबाड़ी में दिखेंगे प्रभु जगन्नाथ के कई रूप : मौसीबाड़ी में प्रवास के दौरान प्रभु जगन्नाथ के कई रूप देखने को मिलेंगे. मौसीबाड़ी में प्रभु जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा अलग रूपों (वेशों) में नजर आयेंगे. सरायकेला की रथ यात्रा की यही विशेषता भी है.मौसीबाड़ी में प्रवास के दौरान प्रभु जगन्नाथ की राम-बलराम, राम-परशुराम, मत्स्य-कच्छप आदि रूपों में साज-सज्जा की जाती है जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में बाहर से भी लोग सरायकेला पहुंचते हैं. सरायकेला को छोड़ सिंहभूम के किसी भी जगन्नाथ मंदिर में ऐसी साज-सज्जा नहीं होती है.
मौसीबाड़ी पहुंचने में लगेंगे दो दिन : सरायकेला में रथ यात्रा के दौरान प्रभु जगन्नाथ को श्रीमंदिर से मौसीबाड़ी तथा वापसी रथ यात्रा के दौरान मौसी बाड़ी से श्रीमंदिर लौटने में दो दिनों का समय लगता है. मौसीबाड़ी जाने व मौसीबाड़ी से लौटने के दौरान महाप्रभु एक रात अपने रथ पर रास्ते में विश्राम करते हैं.
छेरा-पहरा के बाद निकलती है रथ यात्रा: सरायकेला के राजा द्वारा छेरा-पहरा नामक रस्म अदा किये जाने के बाद ही यहां प्रभु जगन्नाथ का रथ मौसीबाड़ी के लिए निकलता है. राजा सडक पर चंदन छिड़क कर झाडू लगाते हैं. इसके बाद ही प्रभु जगन्नाथ, भाई बलभद्र व देवी सुभद्रा की प्रतिमाएं मंदिर से बाहर सड़क पर निकलती हैं. तीनों प्रतिमाओं की बीच सडक में रख कर पूजा अर्चना की जाती है, उसके बाद उन्हें रथ पर चढ़ाकर मौसीबाड़ी ले जाया जाता है. होगा मेले का आयोजन : 25 जून से शुरू हो रहे रथ यात्रा उत्सव के मौके पर सरायकेला में भव्य मेले का भी आयोजन होगा. नौ दिन चलने वाले उत्सव में हर वर्ग के लोगों के मनोरंजन की व्यवस्था रहेगी.
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